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मप्र में हो सकता है बड़ा उलटफेर, सिंधिया समर्थक विधयाकों सहित हो सकते हैं भाजपा में शामिल।

कर्नाटक, महराष्ट्र के बाद मध्य प्रदेश की बारी, अमित शाह की चाल सब पर भारी।

Abhishek

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महाराष्ट्र में जारी राजनीतिक घटनाक्रम के बीच भाजपा ने अब कांग्रेस को मध्य प्रदेश में बड़ा झटका देने की रणनीति पर काम तेज कर दिया है। भाजपा ने कांग्रेस में असंतुष्ट चल रहे पार्टी महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से संपर्क बढ़ा लिया है। साथ ही सिंधिया समर्थक विधायकों की लामबंदी के प्रयास तेज कर दिए हैं। इसमें केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर अहम् भूमिका निभा रहे हैं।

भाजपा सूत्रों के अनुसार, राज्य के भाजपा नेता अरसे से सरकार गिराने के पक्ष में रहे हैं, मगर केंद्रीय नेतृत्व की इसके लिए हरी झंडी नहीं मिल रही थी। लेकिन महाराष्ट्र के घटनाक्रम के बाद अब केंद्रीय नेतृत्व भी कांग्रेस को उलझाने के लिए तैयार हो गया हैं और उसने कांग्रेस में सेंधमारी की तैयारी कर ली है। भाजपा के सूत्र ने यह भी कहा कि इस बारे में कई नेताओं के साथ बैठकें भी हो चुकी हैं। इतना ही नहीं सिंधिया की भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पिछले दो-तीन दिन पहले नई दिल्ली में मुलाकात हो चुकी है।

इस बीच, सिंधिया के ट्विटर स्टेटस में बदलाव से भी इस खबर को बल मिलता है। सिंधिया ने अपने ट्विटर स्टेटस में बदलाव कर वहां अपने परिचय में 'जनसेवक और क्रिकेट प्रेमी' लिख दिया है। इससे पहले सिंधिया के प्रोफाइल में 'पूर्व लोकसभा सदस्य गुना (2000-2019), पूर्व मंत्री (ऊर्जा) स्वतंत्र प्रभार और पूर्व मंत्री वाणिज्य व उद्योग दर्ज था। सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस के सबसे ज्यादा विधायक ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से जीतकर आए हैं और इनमें से अधिकांश सिंधिया समर्थक हैं। लिहाजा भाजपा ने सिंधिया से संपर्क रखने की जिम्मेदारी केंद्रीय मंत्री तोमर को सौंपी है। तोमर पिछले दिनों कांग्रेस के तीन विधायकों से मुलाकात कर चुके हैं, जिसमें से एक मंत्री भी है। सूत्रों ने बताया कि मुलाकात के दौरान इस बात पर भी सहमति बन चुकी है कि सिंधिया को अगर प्रदेश की कमान सौंपी जाती है तो कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा पार्टी से अलग हो सकता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े एक नेता का कहना है, "सिंधिया अगर कांग्रेस से अलग होकर भाजपा में आते हैं या कोई नया समूह बनाते हैं तो भाजपा को उनका साथ देने में कोई दिक्कत नहीं हैं, क्योंकि भाजपा और संघ ने सिंधिया को अपने से अलग माना ही नहीं। उनकी संघ के साथ भाजपा में भी स्वीकार्यता बनी हुई है। सिंधिया राजघराने का संघ और भाजपा से पुराना नाता है। उनकी दो बुआ यशोधरा राजे और बसुंधरा राजे सिंधिया भाजपा में ही हैं।" उल्लेखनीय है कि कांग्रेस महासचिव सिंधिया लंबे अरसे से पार्टी की कार्यशैली से खुश नहीं हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होने के बावजूद उन्हें और उनके समर्थकों को वह समर्थन नहीं मिल रहा है, जो वे चाहते हैं। इसे लेकर सिंधिया गाहे बगाहे अपनी नाराजगी भी जाहिर करते रहे हैं। सिंधिया समर्थक राज्य सरकार में मंत्री इमरती देवी, प्रद्युम्न सिंह तोमर आदि खुले तौर पर सिंधिया को कांग्रेस का प्रदेशाध्यक्ष बनाने की पैरवी कर चुके हैं। सिंधिया ने कई बार समस्याओं को लेकर मुख्यमंत्री कमलनाथ को पत्र भी लिखा है। इनमें से कई समस्याओं का समाधान नहीं हुआ और सरकार की तरफ से सकारात्मक रुख नहीं अपनाया गया। कांग्रेस की राज्य सरकार वैसे भी मजबूत स्थिति में नहीं है। 230 सदस्यीय विधानसभा में उसके पास 115 विधायक हैं और सरकार बाहरी समर्थन से चल रही है। भाजपा के 106 विधायक हैं, एक सदस्य की सदस्यता का मामला अधर में लटका हुआ है। वहीं बसपा के दो, सपा का एक और चार निर्दलीय विधायकों का सरकार को समर्थन हासिल है। सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले कई विधायक भी समय-समय पर आंखें तरेरते रहते हैं। बीते 11 माह के राजनीतिक घटनाक्रम पर नजर दौड़ाई जाए तो एक बात तो साफ हो जाती है कि भाजपा कमलनाथ सरकार को लगातार अस्थिर करने की कोशिश में रही है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव हों या महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, वे यह बात कई बार कह चुके हैं कि यह सरकार हाईकमान के निर्देश पर कभी भी गिराई जा सकती है।

राजनीतिक विश्लेषक और पत्रकार शिव अनुराग पटेरिया का कहना है, "आने वाले दिन राज्य की सियासत के लिए काफी अहम होंगे, क्योंकि भाजपा ने सिंधिया को अपने साथ जोड़ने की पटकथा लिख ली है। सिंधिया को स्वीकारने में भाजपा को भी कोई परेशानी नहीं है, क्योंकि सिंधिया की दादी विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ और भाजपा को खड़ा करने में हर तरह की मदद की थी।"