भारतीय राजनीति और दोगली मीडिया की परतें खोलता बल्लभगढ़ का निकिता हत्याकांड

निकिता कांड पर आखिर क्यों बंद है विपक्ष की बोलती, अब क्यों नहीं जा रहे है भाई बहन पीड़िता के घर वालों से मिलने, मिलना तो दूर की बात है अभी तक मुँह से निकिता कांड पर दो शब्द भी नहीं बोले है।
भारतीय राजनीति और दोगली मीडिया की परतें खोलता बल्लभगढ़ का निकिता हत्याकांड
Nikita BallabgarhUday Bulletin

गिद्ध भोज से शायद आप परिचित नहीं होंगे, दरअसल गिद्ध भोज का आशय ऐसे अशिष्ट भोजन प्रणाली से लगाया जाता है। जहां पर बिना किसी नियम कायदे से सिर्फ अपने स्वार्थ को आगे रखकर लूट खसोट मचाई जाती है जैसा कि हाथरस कांड में सामने आया था।

दलित बेटी के साथ हुई दरिंदगी को लेकर मीडिया, नेता, एक्टविस्ट नौकरी पत्रकारिता छोड़कर गांव की मिट्टी छानने लगे थे। मामले पर तंज कसते हुए लोगो ने कहा कि की पीड़िता के गांव की आधी से ज्यादा मिट्टी तो दिल्ली जूतों में फसकर पहुँच चुकी है।

मीडिया कर्मियों द्वारा डीएम, एसडीएम को धमकाया जा रहा था। नेताओ द्वारा सैकड़ो किलोमीटर लंबी दूरी को पैदल पार करने की कोशिश की जा रही थी। एक्टविस्ट नौकरी को ताक पर रखकर पीड़ित घर मे भाभी बनकर मामले को रंग देने में जुटे थे। मीडिया हाउसेज ऊंची जाति, ठाकुर लड़को और दलित बच्ची लिखकर सम्पादकीय को चमका रहे थे लेकिन बल्लभगढ़ मामले में मामला झट से बदल गया।

घटना के चौबीस घंटे बीतने के बाद न तो पत्रकारों के मुंह से एक शब्द निकला। भाई बहन के मार्मिक शब्द ट्विटर पर भी नहीं झलके, समाचार पत्रों ने इसे एक लड़का और एक लड़की का मामला बताकर बेहद हल्के में समेट दिया।

नेता प्रतिपक्ष को मानो सांप सूंघ गया हो:

अगर हम बीते वक्त के कुछ मामलों पर नज़र डाले तो नेता विपक्ष समेत तमाम सारे नेताओं के द्वारा सिलेक्टिव मामलों पर अपनी सारी ऊर्जा उड़ेलते हुए नजर आएंगे फिर चाहे हाथरस के दलित बेटी से जुड़ा हुआ मामला हो या इससे मिलते जुलते मामले।

इन सभी मामलों में नेताओं के द्वारा बड़ी जोरों सोरों से अपनी मौजूदगी दर्ज कराई गई और सरकार की कार्यप्रणाली पर दबाव बनाया गया नतीजन सरकार को झुककर सीबीआई, एसआईटी जैसी जांचे शुरू करनी पड़ी लेकिन अगर निकिता के मामले पर नजर डाले तो ऐसा कुछ होता नजर नहीं आता।

जबकि हैरानी की बात यह है कि हरियाणा में भाजपा सरकार होने के बाद भी विपक्ष इस मामले पर सरकार की मजम्मत करने की कोशिश नहीं कर रहा। मामला साफ है कि अगर विपक्ष समेत अन्य दल इस मामले पर कोई उंगली उठाते है तो इसका सीधा असर समुदाय विशेष के लोगों के निशाने पर आना होगा।

दरसअल मुख्य आरोपी के परिवार का कांग्रेस से बहुत पुराना रिश्ता सांमने आया है। आरोपी के बाबा से लेकर चाचा ताया इत्यादि कांग्रेस सरकार में मंत्री मिनिस्टर रह चुके है तो इस मामले पर कांग्रेस का बोलना उड़ते तीर को लेने जैसा है।

कुल मिलाकर लोगों का कहना यह है कि अगर यहीं बच्ची मुस्लिम होती या दलित होती तो राजनेताओं का गिद्ध भोज शुरू हो जाता और देश के नेता अभी तक बल्लभगढ़ पहुँच जाते लेकिन मरने वाली लड़की तोमर है तो शायद उसकी हत्या उतनी मार्मिक नहीं जिससे तुष्टिकरण का काम हो सके।

मीडिया ने घाघगिरी दिखाई:

अगर आप गजनी प्रव्रत्ति के व्यक्ति नहीं है तो आपको हाथरस मामला याद रहना चाहिए। रेप के बाद हत्या के मामले में दलित बच्ची के साथ देश भर का मीडिया कोरोना को नकारते हुए हाथरस के खेतों में लेटा रहा कुछ किसानों ने तो बाकायदा आरोप लगाए की उनकी फसल पत्रकारों ने तबाह कर दी।

छोटे-मोटे युट्यूबीए पत्रकार दलित और नारीवाद का झंडा बुलंद करते हुए अपनी बात को वजन के साथ रखते रहे। लेकिन यहीं मीडिया निकिता के मामले पर गांधी जी के बंदरो का अनुसरण करता नजर आया।

यहीं नहीं इस मामले की दुर्गति तब हुई जब कुछ मीडिया संस्थानों ने इसे मात्र एक मामूली घटना के बराबर रख दिया और ऐसे रिपोर्ट्स बनाई मानो निकिता की हत्या नहीं बल्कि कोई समाजिक उत्सव हुआ हो।

आरोपी का नाम तक लिखने की जहमत नहीं उठायी सनद रहे ये वही मीडिया है जो हाथरस केस में गला फाड़ता हुआ चिल्ला रहा था कि आरोपी जाति के ठाकुर है ऊंची जाति के है, और बालिका दलित है

सर्वधर्म समभाव के पुरोधा मौन व्रत पर है:

सर्वधर्म समुदाय की भावना के झंडाबरदार इस मामले पर बेहद शांत नजर आरहे है, वैसे तो एक टीवी एडवरटाइजमेंट के विरोध पर जिनको एकत्वम के सिद्धांत का बिखराव नजर आया वही पुरोधा आज मुँह में गिलौरी खाये नजर आते है उन्हें इस घटना से कोई फर्क ही नही पड़ता क्योकि इस मामले में आरोपी उस समुदाय से है जिसे लोगों द्वारा शांतिप्रिय समुदाय कहा जाता है खासकर होली और गोदभराई जैसे कार्यक्रमों की रूप रेखा बनाने वाले प्रचार की छवि धूमिल होती है।

भीम आर्मी ,महिला ब्रिगेड इत्यादि को निकिता महिला ही नहीं लगी :

देश मे महिला पत्रकारिता करने और महिला हितो की बात करने वालो की संख्या बेहद ज्यादा है लेकिन इस मामले पर यही एक्टविस्ट और पत्रकार ऐसे गायब हुए मानो इनका दुनिया मे कोई अस्तित्व ही नही है शायद उनके पहले से सेट नैरेटिव में धक्का लगता होगा तभी उनकी तरफ से कोई बयान नहीं आया और इसका मुख्य कारण यह भी रहा होगा कि जो गोली तौफीक ने निकिता को मारी होगी उसने निकिता को बेहद आसान मौत ( बिना दर्द तकलीफ वाली) मुहैया कराई होगी। यह भी सम्भव है कि तोमर होने की वजह से निकिता को दर्द भी कम हुआ हो क्योंकि दलित होने की वजह से दर्द होने की तासीर बदल जाती हो।

समाज मे पहले से चल रही चर्चाओं को लेकर बाजार गर्म हो चुका है जो लव जेहाद टीवी डिबेट ओर सोशल मीडिया में चल रहा था वह अब जमीन पर दौड़ने लगा है। लोगों ने इस मामले पर आरोप लगाए की लव जेहाद में असफल रहने की स्थिति में मौत देने का विकल्प बचा हुआ है।

फिल्मी सितारों से लेकर तमामं लोग इस मुद्दे पर बेहद शालीन और सभ्य नजर आ रहे है।

डिस्क्लेमर: लेख में लिखे हुए सभी विचारों को लेखक ने अपनी अभिव्यक्ति की आजादी के आधार पर लिखा है। उदय बुलेटिन का हर वाक्य से सहमत होना आवश्यक नहीं है। फिर भी उदय बुलेटिन निकिता की हत्या के लिए सभी आरोपियों की कड़ी से कड़ी सजा की पैरवी करता है।

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उदय बुलेटिन
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