उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com
Homeless People
Homeless People|Image source: Contexts
टॉप न्यूज़

सर के ऊपर छत नहीं, रहने को घर नहीं।  

लाख दावों के बाद भी यह हालत  

Sneha Sinha

Sneha Sinha

ग्वालियर: आजादी के 70 साल होने के तद्पश्चात भी आज देश में लाखों लोग ऐसे है जिनके पास "रहने को घर नहीं और सर के ऊपर छत नहीं"।देश की ऐसी व्यवस्था होने के बावजूद अगर लोगों के पास घर नहीं है तो वह सरकार के लिए एक शर्मनाक बात है। लाख वादों के बाद भी अगर हमारे देश में ऐसे मुद्दे उठ रहे है तो यह कैसा विकास है। यूँ तो गले फाड- फाड़कर हर राजनेता देश में विकास लाने की बात करता है लेकिन अगर यही स्थिति बनी रही तो सामान्य जनता किसपर भरोसा कर पाएगी। देश का विकास हर एक नेता के कन्धों पर होता है लेकिन आये दिन हर एक रैली में एक पार्टी दूसरी पार्टी की आलोचना करती फिर रही है, अगर इन आलोचनाओं से हटकर हर एक पार्टी देश को मिलकर एवं इसके विकास का कार्य समानता से बाँट ले तो शायद लोगों को बेघर होने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ऐसे में जनता करे तो क्या करे ?

फिर एक बार होगा जन आंदोलन!

सरकार के अनेक वादों के बाद लाखों लोग ऐसे है जिनके पास घर नहीं है और इनलोगों को असहाय होकर अपना जीवन आसमान के नीचे बिताना पड़ रहा है। इस मुद्दे पर कोई निश्चित परिणाम पाने की आकांक्षा से देश की भूमिहीन जनता सड़क पर उतरने की तयारी में है और इसकी शुरुआत ग्वालियर से की जा रही है। जन आंदोलन 2018 की शुरआत ग्वालियर के एकता परिषद् और सामाजिक संगठनों द्वारा किया जा रहा है जिसके कारण सड़क जाम एवं यातायात में बाधा होने की संभावना जताई जा रही है। यह आंदोलन मुख्य रूप से आवासीय कृषि भूमि अधिकार कानून, महिला कृषक हक़दारी कानून और पांच मुद्दों को लेकर संचालित किया जायेगा। यह आंदोलन ग्वालियर के मेला मैदान में 2 और 3 अक्टूबर को किया जायेगा और अगर इसका कोई निदान नहीं मिल पाया तो आंदोलन समूह 4 अक्टूबर को दिल्ली रवाना होगी।

सूत्रों के हवाले से पता चला है की एकता परिषद के संस्थापक और इस आंदेालन के नेतृत्वकर्ता पी वी राजगोपाल ने कहा है कि,"देश को आजादी मिले हुए 70 वर्ष हो गए है लेकिन यहाँ की जनता आज भी अपने हक़ को पाने के लिए संघर्ष कर रही है।" उन्होंने 2007 में जनादेश और 2012 में जन सत्याग्रह का उल्लेख करते हुए बताया की इन दोनों आंदोलन के समय केंद्र सरकार ने लिखित समझौते किये थे लेकिन अभी तक उसका कोई सकरात्मक परिणाम नहीं आया ना ही इसके लिए कोई कानून बना।

इस पदयात्रा में 25000 से अधिक लोगो के होने की संभावना जताई जा रही है। इस आंदोलन में देश के हर हिस्से से लोग शामिल होने आ रहे है।