क्या राकेश टिकैत का नेतृत्व अब आंसुओ के भरोसे है?

देश की राजधानी में किसानों का आंदोलन अब अलग-थलग पड़ता दिखाई दे रहा है, किसानों के नेता राकेश टिकैत अब आंदोलन कम राजनीति ज्यादा करते नजर आ रहे हैं
क्या राकेश टिकैत का नेतृत्व अब आंसुओ के भरोसे है?
किसानों के नेता राकेश टिकैत अब आंदोलन कम राजनीति ज्यादा करते नजर आ रहे हैं Google Image

दिल्ली को उत्तर प्रदेश से जोड़ने वाला गाजीपुर बॉर्डर जहाँ पर पिछले करीब दो महीने से लगातार किसानों का जमावड़ा शुरू था अब वहां किसानों के बीच खुसुरपुसुर की शुरुआत हो चुकी है। किसान अपने आंदोलन के भविष्य और सरकारों के अगले कदम को लेकर चिंतित हो रहे है लेकिन इस दौरान एक और बेहद रोचक और चौंकाने वाली बात हुई है। बीते दो-तीन दिन में जिन किसानों के ऊपर लानत सोशल मीडिया के माध्यम से भेजी जा रही थी अब उन हैशटैग की बजाय किसान नेता टिकैत को लेकर हैशटैग चलाये जा रहे है लेकिन यह भी सच है कि यह सब उतना आसान नही है। दरअसल खोई हुई प्रतिष्ठा पाने में लंबा अर्शा लग जाता है।

क्या रोने से ब्लैकमेल होंगे किसान?

हमारी बातों की शुरुआत बुंदेलखंड के किसानों से होगी, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश का वह भूभाग जहां खेती के लिए जमीनों की भरमार तो है लेकिन पानी जैसे मुद्दे पर यहां का किसान पूरी दुनिया से पिछड़ जाता है। बुंदलेखंड के क्षेत्र में अक्सर किसानों को यह कहते हुए सुना जाता है कि "अगर हमारी खेती में खड़ी फसलों को पीने के लिए पानी मिल जाये तो हम पंजाब और हरियाणा को एक झटके में पीछे कर सकते है" और किसानों की यह बात काफी हद तक सही भी है, आज भी बुंदेलखंड के किसान उर्वरकों के नाम पर बेहद कम कृत्रिम रासायनिक खादों का प्रयोग करता है और खेती पूरी तरह प्रकृति पर आधारित रहती है। लेकिन अगर सरकार के कृषि कानूनों की बात यहाँ के किसानों से की जाए तो वो बेहद अनिभिज्ञता के साथ सर हिलाते हुए नजर आते है। मसलन पहले तो ज्यादातर किसान अनपढ़ होने की वजह से किसानी झमेले को नही समझ सकते और दूसरे पढ़े लिखे किसान भी इस मामले में में खुद को शामिल करना नही चाहते। लोगों को न तो सरकार की बातों से कोई सरोकार है ना ही किसान नेताओं जैसे (टिकैत) की बातों में सच्चाई नजर आती है। लोगों का अनुमान है कि ये कोई कृषि सुधार आंदोलन ने होकर महज एक नए राजनीतिक विकल्प को तैयार करने की बात कही जा रही है, जो भारत मे इससे पहले भी हो चुका है, जिसका खामियाजा भी लोगों ने भुगता है।

अब आते है कृषि नेता राकेश टिकैत के रोने पर, अगर परिदृश्य को हल्के तरीके से ही देखे तो राकेश टिकैत की स्थिति हर पल हर क्षण बदलती नजर आती है। कभी वो किसानों के ट्रेक्टर ट्राली हुडदंग को सरकारी तंत्र का फेल्योर मानते है तो कभी बाहरी तत्वों का किया कराया काम बताते है, तो कभी इस मामले पर अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते है और उसके बाद अगले ही बयान में इस सारे झमेले से खुद को बेहद दूर बताने का प्रयास करते है।

हालांकि इन बयानों से टिकैत की साफ साफ अस्थिरता नजर आ जाती है। पहले तो दिल्ली में हुए किसानी करतब के बाद लोगों का समर्थन किसानों के प्रति एक झटके से कम हुआ है उसके बाद राकेश टिकैत खुद कई मौकों पर कहते हुए नजर आए थे लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश सरकार के साथ केंद्र और दिल्ली की सुरक्षा एजेंसियों ने किसान नेताओं पर अपनी पकड़ बनानी मजबूत कर दी जिसकी वजह से किसान नेता राकेश टिकैत ने रोने का पांसा फेंककर कुछ हद तक स्थिति को सम्भालने का प्रयास किया, यही नही उत्तर प्रदेश में ही राकेश ने महापंचायत जैसे बड़े आयोजन को आयोजित किया, राकेश का अनुमान है कि इस पंचायत से लोगों की सहानुभूति उनके साथ होगी। लेकिन किसी पंचायत से सहानुभूति हासिल नही होती। दरअसल प्रतिष्ठा बनाने में सदियां बीत जाती है लेकिन एक गलती आपके सभी करे कराए पर पानी फेर देती है।

किसान संगठनों और अन्य ग्रामीणों के बीच मतभेद खड़े हुए:

कहते है कोई आंदोलन तभी सफल माना जाता है जिसमें जनसमूह और जनसमुदाय की सहमति हो। क्योंकि आपको आजाद भारत मे आवाज उठाने का अवसर तो भारत का संविधान देता है लेकिन इसका मतलब यह नही की आप एक शांतिपूर्ण रैली करें जिसमें यह मांग रखी जाए कि हम सभी लोगों के शिक्षण पाठ्यक्रम में बम बनाने की विधि शामिल की जाए। हालांकि कानूनी तरीके से यह मांग का आंदोलन भी गलत नही होगा लेकिन चूंकि इस मांग और आंदोलन में लोग अपनी सहमति नही दर्ज करा पायेंगे।

चूंकि किसानों का आंदोलन बेहद जायज मांगो के साथ शुरू हुआ था, उसमे किसी भी प्रकार की हिंसा की गुंजाइश नही थी। लोग देश दुनिया से इस आंदोलन को अपना समर्थन दे रहे थे। लेकिन ट्रैक्टर रैली के दौरान अहिंसा के नाम पर जो उत्पात मचाया गया उसके बाद कुछ किसान संगठनों ने इस पर से पल्ला झाड़ते हुए खुद को इस मामले से ऐन मौके से अलग करते हुए अपने आंदोलन के समाप्त होने की घोषणा की, यही नही, आंदोलन स्थल के आस पास के करीब 40 से ज्यादा गाँव जो अब तक आंदोलन में तकलीफ सहकर आंदोलन को समर्थन दे रहे थे उन्होंने अब आंदोलनकारियों को साफ-साफ शब्दों मे इस मामले पर अल्टीमेटम दे दिया है, कुछ जगहों पर आंदोलनकारियों और ग्रामीणों के बीच टकराव की खबरें भी आई है। जिसके बाद किसी प्रकार से सुरक्षा बलों ने स्थिति संभाली है।

इस मामले पर राजनीतिक दलों (विपक्षी) की भी बेहद सधी हुई प्रतिक्रियाएं आयी है। हालाँकि उनका झुकाव राजनीतिक विवशतावश किसानों की तरफ ज्यादा नजर आ रहा है। देखना यह है कि इस आंदोलन का रुख आने वाले वक्त में किस तरफ जाता है।

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उदय बुलेटिन
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