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चीन ने कहीं तीसरे विश्व युद्ध की इबारत तो नहीं लिख दी? ये झड़प मामूली बिल्कुल नहीं है

भारत और चीन के बीच लद्दाख में जारी विवाद अब और भी गहरा गया है ताजा हालातों से लगता है कि चीन युद्ध के मूड में है।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

ये खबर भारत और चीन के सैन्यकर्मियों के मारे जाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे एक बड़े नजरिये से देखा जाना चाहिए। हालाँकि भारत हमेशा ही युद्ध से विरत रहने की नीति पर काम करता रहा है लेकिन अगर चीन की बात करें तो चीन का रवैया दुनिया भर को पता है। चीन उपनिवेशवाद की पुरानी इबारत पर लंबे समय से चल रहा है दूसरे के अधिकारों को कुचल कर कब्जा जताना चीन के पुराने शगल में शामिल है।

हालात चीन के विपक्ष में है:

अगर वैश्विक परिदृश्य पर नजर डाले तो चीन के हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। भले ही कोरोना महामारी को लेकर चीन ने लंबा नुकसान सहकर दुनियाभर में उत्पादों को पहुंचाकर माल पानी बटोरा हो लेकिन कोरोना महामारी को लेकर तमाम राज छुपाने को लेकर दुनिया मे यह संदेश गया कि चीन के द्वारा दुनियाभर में इस महामारी को जानबूझकर फैलाया गया। वहीँ कुछ देशों और समूहों ने तो इसे एक बायोलॉजिकल हथियार तक कह डाला। इसके फलस्वरूप नतीजा यह निकला कि अमेरिका, इटली, ब्रिटेन समेत दुनियाभर के देशों के निशाने पर चीन आ गया और इस वक्त भी चीन ने भारतीय जमीन पर अपना हक जताकर वह कर दिया जिसने दुनियाभर में भड़की आग में घी डालने का काम किया।

उत्पादक कितना भी बड़ा हो बाजार तो चाहिए:

हालांकि चीन केवल एक चीज पर दुनिया भर के सामने अपना डंका बजाता आ रहा है वह है उत्पादन, जिसके बल पर चीन दुनियाभर के देशों के सामने शेखी बघारने से नहीं चूकता लेकिन चीन शायद यह भूल रहा है कि उत्पादन भर से कुछ नहीं होता बल्कि किसी भी अर्थशास्त्र में उत्पादन के साथ वितरण और उपभोग भी जुड़ा होता है। अगर वितरण या उपभोग में समस्या आयी तो क्रम टूट सकता है जिसका खामियाजा चीन को भुगतना पड़ सकता है और भारत चीन के लिए ही नहीं बल्कि दुनियाभर के लिए बहुत बड़ा बाजार है अगर भारत चीनी उत्पादों के वितरण में बाधा डाल देता है तो इसका सीधा असर चीन की आर्थिक क्षमता पर पड़ेगा।

बड़े देशों में रूस का है साथ:

अगर सामरिक तरीकों से देखे तो चीन के साथ उसका सबसे बड़ा साथी रूस ही नजर आता है लेकिन इस संबंध में भारत के साथ किसी भी प्रकार की लड़ाई चीन के लिए सही साबित नहीं होगी भारत रूस का पहले से भी पुराना मित्र है। वहीँ मित्रता के साथ-साथ भारत रूस के रक्षा उत्पादों का सबसे बड़ा खरीददार है इसलिए रूस किसी भी प्रकार से चीन के साथ उस तरह खुलकर नहीं आ सकता क्योंकि बाजारवाद का सिद्धांत रूस के साथ भी लागू है। भले ही रूस और अमेरिका दोनों ही परस्पर प्रबल विरोधी है लेकिन अगर रूस को आर्थिक मजबूती की राह पर कोई कांटा नही चाहिए तो उसके लिए भारत से विरोध न करना ही सही रहेगा।

अगर ताजा समीकरणों को देखा जाए यो अमेरिका-चीन को लेकर काफी मुद्दों पर जला भुना बैठा है खासकर जब कोरोना दुनिया मे फैला तो चीन उसके बाद मलाई खाने को बैठ गया तो अमेरिका एक ओर जहां गर्त में पहुँच रहा था वहीँ चीन कई देशों का आरोपी होने के बावजूद आंखे तरेरता हुआ नजर आया।

युद्ध का कोई खास अनुभव नहीं:

एक कहावत है जंग कभी भी सेना और संसाधनों के भरोसे नहीं जीती जाती, जंग जीतने के लिए अनुभव की बेहद सख्त जरूरत होती है। खासकर उस जगह जहाँ आपने लंबे वक्त से कोई जंग न लड़ी हो और ये सब लक्षण चीन के साथ बेहद नकारात्मक तरीके से आगे आ रहे हैं। भारत-चीन सीमा पर मौजूद पहाड़ियां चीन के सैनिकों के लिए किसी रुकावट से कम नहीं है वहीँ भारत के लिए विश्व के सबसे ऊंचे बर्फीले युद्ध क्षेत्र पर भी लंबे वक्त तक लड़ाई लड़ने का खासा अनुभव है। खासकर भारत की भौगोलिक परिस्थितियां उसे इस काम मे और दक्ष बना देती है।

सैन्य बल और क्षमता:

अगर सैन्य बल और सैन्य संसाधनों की बात की जाए तो बेशक चीन भारत से कहीं आगे है चीन कि सेना करीब 2 मिलियन से भी ज्यादा बैठती है वहीँ भारत की युद्धक सेना करीब 1.3 के आस-पास है लेकिन अगर पैरामिलिट्री और रिजर्व सैनकों की बात करे तो यह भारत के पक्ष में जाता है बाकी अगर एयर फोर्स की बात करें तो चीन भले ही संख्यात्मक रूप से खुद को ज्यादा दिखाए लेकिन यहां एक खामी नजर आती है चीन के पास युद्धक विमान भले ही ज्यादा हो लेकिन विमान की तकनीकी और उनका चलन में होना भी बहुत मायने रखता है। कहने का तात्पर्य यह है कि चीन के वायुसेना के विमान काफी मात्रा में पुराने है।

झड़प में ताजा जानकारी और रुझान:

ताजा जानकारी के अनुसार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) और भारतीय सेना के बीच हिंसक झड़प में 20 भारतीय जवान शहीद हो गए हैं। वहीँ यह भी जानकारी मिली है कि चीन को भी खासा नुकसान हुआ है अप्राप्त सूचनाओं में यह दावा किया जा रहा है कि 43 चीनी जवानों की भी मौत हुयी है, मृतकों की संख्या बढ़ने के भी आसार जताए जा रहे हैं।

विदेशी मीडिया भी भारत और चीन के बीच में युद्ध थोपने में जुटी हुई है, एक्सप्रेस यूके की खबर पर नजर डाले:

हालाँकि इस बारे में यह बातें भी अपना रुख दर्शा रही है कि एक दूसरे को सही और गलत बताने के चक्कर मे युद्ध न थोप दिया जाए चूंकि विकसित देश जिनका रुतबा कम होने के आसार है वो इस मौके की ताक में ही रहते है कि अगर संभव हो तो इस बीच की लड़ाई का फॉयदा उठा लिया जाए। हालांकि अगर दोनों पक्षों के बुद्धिजीवियों की माने तो एशिया की दो महाशक्तियों के बीच उत्पन्न हुआ युद्ध लंबा खिंच सकता है और न चाहते हुए भी दुनिया के तमाम देशों को इसमे कूदना पड़ेगा। आशा और उम्मीद है कि चीन और भारत आपसी विवादों को मिटा कर इन मामलों में शांतिपूर्ण ढंग से कदम बढ़ाएंगे ताकि एशिया को समृद्ध बनाये रखा जा सके।

उदय बुलेटिन
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