मुर्गा जिसकी काली रंगत ने उसके जीने पर पाबंदी लगा दी, पैसे कमाने के लिए सज रही मंडियां

पैसे कमाने के चक्कर में लोगों ने कड़कनाथ मुर्गे की प्रजाति दांव पर लगा दी।
मुर्गा जिसकी काली रंगत ने उसके जीने पर पाबंदी लगा दी, पैसे कमाने के लिए सज रही मंडियां
Species of Kadaknath chicken is in dangerUday Bulletin

हालात यह है कि कड़कनाथ मुर्गा के पालन की होड़ लगी है। एक तरफ जहां सरकार इस मुर्गे की प्रजाति को संरक्षित करने में जुटी है लेकिन असलियत में इस मुर्गे की प्रजाति लुप्त होने की कगार पर है। कहने के लिए तो लोग इसके पालन की बात कह रहे है लेकिन इस मामले में प्रजाति के संरक्षण की बात यह नहीं है बल्कि पालन केवल पैसे और स्वाद के लिए किया जा रहा है। कड़कनाथ की प्रशिद्धि का आलम यह है कि भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी भी इसके पालन का विचार कर रहे है हाल में ही महेंद्र सिंह धोनी ने 2 हजार चूजों का ऑर्डर दिया है।

कड़कनाथ का काला रंग बना अस्तित्व पर खतरा:

हालांकि खान पान बेहद निजीपन वाला मामला है कोई क्या खाता है कैसे खाता है ये उसका बेहद निजी अधिकार है लेकिन अगर खान पान और स्वाद के चलते कोई एक प्रजाति संकट में पड़ जाए तो ये बेहद चिंता का विषय है।

दरअसल हम बात कर रहे है देश दुनिया मे चर्चित काले रंग के मुर्गे कड़कनाथ की जिसके बारे में जियो टैग देने दिलाने की काफी जद्दोजहद हुई और आखिरकार मध्यप्रदेश ने यह लड़ाई जीत ली और कड़कनाथ मुर्गा उनका हुआ हालांकि कड़कनाथ मुर्गे की शुरुआती नस्ल के बारे में कोई जानकारी ऐसी नहीं है जिससे यह प्रमाण मिलता हो कि कड़कनाथ मुर्गा लोगों के बीच मे कब आया लेकिन झाबुआ मध्यप्रदेश के जनजाति भील इत्यादि के दड़बे में लम्बे वक्त से इस मुर्गे का पालन किया जाता रहा है। इंडोनेशिया में भी कड़कनाथ की प्रजाति से मिलती जुलती मुर्गे की प्रजाति पाई जाती है लेकिन कड़कनाथ मुर्गे जितना प्रभाव नजर नहीं आता।

क्यों है खास:

अगर वर्णात्मक तरीके से देखे तो कड़कनाथ मुर्गे की प्रजाति अन्य मुर्गों से अलग इसलिए होती क्योंकि कड़कनाथ का सुर्ख चमकीला काला रंग उसे अन्य मुर्गों से अलग बनाता है। कड़कनाथ का काला रंग केवल बाहरी त्वचा और पंखों तक सीमित नहीं है बल्कि इस रंग की रंगत कड़कनाथ के अंदर तक पैवस्त मिलती है।

कड़कनाथ मुर्गे के शरीर के अंदर बाहर सब कुछ काला ही नज़र आता है फिर चाहे वह बाहरी कलगी, पंख, पैर हो या शरीर के अंदर बहता काला खून, काली हड्डियां और काला मांस कहने का मतलब कड़कनाथ पूरा का पूरा काला नज़र आता है। अगर खाने की बात करे तो कड़कनाथ अपने पोषक तत्वों की वजह से लोगों के बीच मे ज्यादा प्रसिद्ध है।

कड़कनाथ में मांस में अन्य मुर्गों की प्रजाति से ज्यादा प्रोटीन पाया जाता है जबकि फैट का स्तर अन्य मुर्गों की तुलना में न के बराबर होता है और वसा के स्तर बेहद कम होने के कारण मांस में कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी बेहद निम्न होता है साथ ही कड़कनाथ अपने मांस में तमाम तरह के एमिनो एसिड को लिए हुए होता है। इसके बावजूद विटामिन के तमाम प्रकार जैसे विटामिन बी1, विटामिन बी 6, विटामिन बी 12 के साथ-साथ विटामिन सी और ई इत्यादि को लिए रहता है।

संरक्षण के नाम पर समूल विनाश:

अगर सरकारी तर्कों की बात करे तो यह कड़कनाथ मुर्गा झाबुआ के आदिवासी भीलों के पास था। वो इसका पालन करते और अपने खान पान में उपयोग लाते थे। कृषि वैज्ञानिकों ने इस नस्ल के बारे में पड़ताल की और पाया कि यह मुर्गा बेहद अद्भुद पक्षी है और इसे संरक्षित करने के नाम पर इस मुर्गे के बारे में देश दुनिया को जानकारी मिली और फिर शुरू हुआ बाज़ारीकरण, कड़कनाथ की खूबियां उसी की प्रजाति पर संकट बनती जा रही है। एक कड़कनाथ जो आदिवासी दड़बे में भले ही कम था लेकिन सुरक्षित था मगर अब मुर्गे के बारे में जानकारी होने पर बाजार का स्तर इतना बढ़ गया है कि कड़कनाथ मुर्गी के अंडे की कीमत 30 रुपये से लेकर 50 और मांग पर बढ़कर 80 रुपये प्रति अंडे तक पहुँच जाती है वही इस इसके मांस की कीमत बाजार के रुख पर 500 रुपये प्रति किलो से लेकर कभी कभार यह 1000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है

मुनाफा कमाने के चक्कर मे अब कड़कनाथ प्रजाति में भी इंजेक्शनों का प्रयोग भरपूर हो रहा है साथ ही अंधाधुंध तरीके से मुर्गे मारे काटे जा रहे है।

मुनाफे का कारण ही है कि भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान झारखंड में इसके पालन का विचार बना रहे है इसके लिए उन्होंने बाक़ायदा झाबुआ से चूजों को मंगाया भी है।

पेड़ों, जानवरों और पशु पक्षियों के लिए काम करने वाले एक्टिविस्ट नंद किशोर प्रजापति कानवन ने इस बारे में चिंता जाहिर की है। नंदकिशोर ने बताया कि सरकारे भले ही कैसे भी दावे करते रहे लेकिन इस मुर्गे की प्रसिद्धि इसके मांस और इसके अंडों तक ही सीमित है लोग स्वाद के चक्कर मे एक नस्ल को खतरे पर डाल रहे है। इनकी संख्या लगातार घट रही है और जैव विविधता को भीषण खतरा उत्पन्न हो रहा है।

नंदकिशोर प्रजापति कानवन फेसबुक लिंक।

सोमवती अमावस्या पर पांच पीपल के पौधों का रोपण सुरक्षा के साथ किया गया...।। यह पूण्य लाभ आप श्री ने प्राप्त किया..।। 1...

Posted by नंदकिशोर प्रजापति कानवन on Sunday, December 13, 2020

नंद किशोर प्रजापति कानवन प्रकृति प्रेमी है और वनों पौधों के लिए पूरी तरह समर्पित है। समय समय पर पर्यावरण के लिए सार्थक कदम उठाते रहते है।

⚡️ उदय बुलेटिन को गूगल न्यूज़, फेसबुक और ट्विटर पर फॉलो करें। आपको यह न्यूज़ कैसी लगी कमेंट बॉक्स में अपनी राय दें।

Related Stories

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com