आपातकालीन स्थिति में कैसे बंद की जाती है इंटरनेट सेवा, क्या होते हैं इसके नियम ?

हम सोशल मीडिया के जमाने में जी रहे हैं जिसमें कई बार लाभ तो होते हैं लेकिन हानि भी उतनी ही होती है, दंगे की स्थिति अफवाहों की बौछार को देखते हुए सरकार ने इंटरनेट सेवा ही ठप्प कर दी।
आपातकालीन स्थिति में कैसे बंद की जाती है इंटरनेट सेवा, क्या होते हैं इसके नियम ?
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जब से देश में संशोधित नागरिकता कानून लागू हुआ है तब से कई राज्यों में इसका लगातार विरोध किया जा रहा है। कुछ जगहों पर लोग शांतिपूर्ण होकर इसका विरोध कर रहे हैं तो कहीं पर हिंसात्मक रवैया अपनाकर। लेकिन देखते ही देखते यह हिंसात्मक आंदोलन इतना बढ़ गया कि इसमें कई लोगों की जान भी चली गयी। कुछ एक दो राज्यों में इस आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया और सरकार को इसे रोकने के लिए कड़े कदम उठाने पड़े।

आप अगर इन खबरों से जुड़े होंगे तो आपको पता होगा कि इस उग्र आंदोलन की शुरुआत सबसे पहले दिल्ली स्थित जामिया यूनिवर्सिटी से हुई जिसके बाद यूपी, एमपी, कर्नाटक जैसे अन्य कई राज्यों में फैलते गयी। सरकार ने पहले तो इस आंदोलन को रोकने के लिए राज्यों में धारा 144 (ACT 144) लागू की लेकिन इसके बावजूद कुछ जगहों पर स्थिति आपे से बाहर होता देख सरकार ने और भी कड़ा रुख अपनाया। जिसमें इंटरनेट व वाईफाई सेवाओं पर रोक लगा दिया गया। इसके अलावा प्रशासन ने आम लोगों से आग्रह भी किया कि वो अफवाहों पर ध्यान न दे।

अब इन सबके बीच आज हम आपको एक विशेष जानकारी ये देने जा रहे हैं कि आखिर सरकार कैसे बंद करती है इंटरनेट सेवा ? इसके लिए क्या होती है प्रक्रिया या फिर क्या कहते हैं नियम कानून ? ये वही सवाल हैं जो आपके अपने क्षेत्र में इंटरनेट सेवा बंद होने के बाद आ रहे होंगे।

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इंटरनेट सेवा बंद करने की क्या होती है प्रक्रिया

इस बार हो रहे हिंसक हंगामे को लेकर सरकार ने यूपी के करीब 16 जिलों के साथ ही साथ अन्य कई इलाकों में भी इंटरनेट सेवा बंद की है लेकिन यह ऐसे ही नहीं किया जाता है बल्कि इसके लिए भी एक प्रक्रिया होती है।

जिस राज्य में इंटरनेट सेवा को सस्पेंड करना होता है, उस क्षेत्र के राज्य सचिव ही टेलीकॉम कंपनियों को आदेश देते हैं, जिसमें कहा जाता है कि इस निर्धारित क्षेत्र में आप अपनी इंटरनेट सर्विस को बंद कर दें। इसके बाद राज्य सचिव के इस आदेश को आकलन के लिए केंद्र या फिर राज्य सरकार के पास भेजा जाता है, जहां पर सरकार की ओर से नियुक्त किए गए मंत्रिमंडल सचिव, प्रशासनिक सचिव और दूरसंचार सचिव इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस आदेश का आकलन कर लगभग पांच दिनों के अंदर किसी भी निर्णय पर पहुंचते हैं।

लेकिन हां एक बात यह भी है कि कई बार स्थिति काफी गंभीर हो जाती है और इतना वक्त नहीं होता कि इस पूरी प्रक्रिया से गुजरा जाए जिसमें 5 दिन का समय लगता है तो ऐसी आपातकालीन स्थिति में केंद्र सरकार की ओर से गृह सचिव द्वारा नियुक्त किए गए संयुक्त सचिव इस महत्वपूर्ण निर्णय पर तत्कालीन फैसला लेते हैं।

इस जानकारी के बीच यह भी जान लेना जरूरी है कि आज से करीब 2 वर्ष पहले इस मामले में नियम व कानून कुछ और ही कहते थें, क्योंकि इस मामले में फैसला लेने का महत्वपूर्ण अधिकार जिला के जिलाधिकारी के पास होता था लेकिन साल 2017 में सरकार ने इस पर भी पाबंदी लगा दी और इसमें बदलाव कर दिया। सरकार ने Indian Telegraph Act 1885 के जरिए टेम्पररी सस्पेंशन ऑफ सर्विसेज रूल तैयार किया, जिसकी वजह से अब यह मामला भी सरकार के खाते में आ गया। यानि की अब यह निर्णय राज्य या फिर केंद्र के गृह सचिव द्वारा नियुक्त अधिकारी ही ले सकते हैं।

अब इस समय जो नागरिकता संशोधित कानून को लेकर जिस आंदोलन ने हिंसात्मक रूप धारण किया है उसकी वजह से विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ, संभल, सहारनपुर, वाराणसी, प्रयागराज जैसे क्षेत्रों में इंटरनेट सेवा सस्पेंड की गई थी।

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