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दंगो से किसका भला हुआ है ? या ये सवाल ही गलत है

दंगा और दंगा अब दिल्ली इसी से पहचानी जाएगी।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

बात अगर सवालों की है, तो जवाब मिलना बेहद जरूरी है, लेकिन कभी-कभी सवालों में ही जवाब छुपे हुए होते है और कभी-कभी सवाल ही ऐसे होते है कि जवाब खोजने में पीढियां खप जाती है। कुछ ऐसा ही सवाल है कि दिल्ली की आगजनी और हत्याओं में किसके हिस्से क्या आया ?

मैं अपनी उम्र के अनुसार जब सोचता हूँ तो दंगो की इबारत केवल किताबो में पाता हूँ। शायद ये ठीक भी था, मेरठ, मुजफ्फरनगर के दंगे जितनी जल्दी हुए उतनी जल्दी शांत भी हुए लेकिन दिल्ली का दंगा इन सब से अलग था। हालाँकि ये मेरे निजी विचार हैं, मुझे लगता है कि यूपी के धार्मिक उन्माद के दंगे को रोकने के उपाय बेहद निचले स्तर पर भी किये गए लेकिन दिल्ली के दंगे ने सारे कीर्तिमान ध्वस्त करके अपने आपको सबसे ऊपर स्थापित किया जिसकी वजह से ये सबसे ऊपर आते हैं। क्योंकि यहां बड़े स्तर को तो छोड़िए छोटे स्तर पर भी दंगे की आग भड़काने के लिए जलती हुई आग में घी डाला गया जिसका नतीजा है कि लोगों को दंगे के बाद भाईचारा कायम करने की जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

जो हाकिम थे वही जल्लाद बन बैठे :

हकीमों की बात ही मत करिये, यहाँ लोग आग तापने के लिए जैसे बैठे नजर आते है। आप जामिया के बवाल के पहले से हिस्ट्री खंगालिए आपको सैकड़ो की संख्या में ऐसे बयान मिल जाएंगे जिनके जरिये इस दंगे की पटकथा लिख दी गयी। और नतीजा यह हुआ कि जो दिल्ली कल तक दिलवालों की जागीर समझी जाती थी आज उनके दिलो में पेट्रोल बम और तेजाब की थैलियां इकट्ठी हो गयी। फिर चाहे वह जामिया के विद्यार्थी हो या जेएनयू के सब ने अपनी अपनी योग्यता का परिचय दंगे के डायलॉग लिखने में दिखाए और क्लाइमेक्स कुछ हिंदुत्ववादी नेताओं ने सेट कर दिया और आखिर में हर हिंदी फिल्म से उलट इस फ़िल्म में हैप्पी इंडिंग न होकर चारो तरफ मातम पसर गया।

पहले भृम का माहौल कायम किया गया :

किसी भी दंगे में भय, भृम, और अफवाहों का तगड़ा हाँथ होता है। दिल्ली में यह काफी लंबे वक्त तक चला। शायद यही कारण था कि देश भर में सरकार द्वारा पारित कानून सीएए के बारे में देश की जनता को इस कदर भड़काया गया कि जनता जानकर भी अनजान बनती रही और शाहीन बाग के बाद जाफराबाद जैसे विरोध प्रदर्शनों को अंजाम दिया गया। देश भर में मुट्ठीभर बुद्धिजीवी लोगों ने इसे समुदाय विशेष के लोगों के दिमाग मे इस कदर से जहर भरा की लोगों को लगा कि उनका जीना दूभर हो जाएगा। और जानने योग्य बात यह रही कि उन बुद्धिजीवी लोगों ने अपनी बातों को जिस तरह से मोड़ा वह मुड़ते चले गए और बवाल बढ़ता गया।

सरकार और पुलिस अपनी जिम्मेदारी नही निभा पायी :

सरकार ने अपने द्वारा पारित कानून के बारे में फैले हुए भृम के बारे में जनता से बात करने की बात तो कही लेकिन उसका अमल कितना किया गया ये हम सबके सामने है। रही सही कसर दिल्ली पुलिस ने पूरी कर दी, हालांकि पुलिस का यह रवैया अपराधबोध के कारण भी हो सकता है क्योंकि जामिया विवि के बवाल के बाद दिल्ली पुलिस अपने कदम फूंक-फूंक कर रखती नजर आ रही थी। इसीलिए दंगाई दिल्ली पुलिस के सामने दंगाई पिस्टल दिखाकर जा रहे थे और पुलिस डिफेंसिव मोड़ में नजर आती दिखाई दी।

असल फायदा किसको हुआ ?

अब इसे राजनैतिक साजिस न कहें तो क्या कहें इस पूरे मामले पर राजनीती और धार्मिक मुद्दे साफ नजर आते है। कोई माने या माने इसके सीधे-सीधे तार धर्म के ठेकेदारों और राजनीतिक गुरुओं के पास जाते है। हालाँकि न्यायपालिका और पुलिस इस मामले पर पूरी नजर बनाए हुए है और संदिग्धों की धरपकड़ जारी है लेकिन इस मामले के असली खिलाड़ी कब तक पकड़ में आते है ये देखना पड़ेगा।

डिस्क्लेमर : इस लेख में लिखे गए सभी विचार लेखक के निजी विचार है, इस लेख में समय के साथ घटते हुए घटनाक्रम का विश्लेषण करने का प्रयास किया गया है।

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उदय बुलेटिन
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