दलितों के लिए जातिगत शब्द प्रयोग करना गलत है तो ब्राम्हणों को सुअर बताना किस अभिव्यक्ति की आजादी के तहत आता है।

उदित राज के संगठन के द्वारा ब्राम्हण समुदाय पर निशाना लगाते हुए ब्राम्हण समुदाय को सुअर के तौर पर दिखाया गया है
दलितों के लिए जातिगत शब्द प्रयोग करना गलत है तो ब्राम्हणों को सुअर बताना किस अभिव्यक्ति की आजादी के तहत आता है।
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देश इस समय लिबरल के शिकंजे में है वो जब चाहे अपनी गंदी जुबान से जाति और समुदाय पर अश्लील और घृणित कमेंट कर सकते है और डंडा पड़ने की स्थिति में शब्दों को वापस लेकर माफी भी मांग सकते हैं अगर इस बीच किसी ने कानूनी कार्यवाही करदी तो बेचारे होने का नाटक करके माफी भी मांग लेंगे लेकिन आखिर ये चलन कब तक चलेगा ?

कौन है आखिर उदित राज?

नाम के आगे डाक्टर लगाते है और कांग्रेस के प्रवक्ता है और मेम्बर ऑफ पार्लियामेंट भी है खुद को ट्विटर पर कांग्रेस के प्रवक्ता के तौर पर भी दर्शाया गया है। अब आते है इनके क्रिया कलापों पर, उदित राज कांग्रेस के उन नेताओं में शुमार है जो बिना सर पैर की बाते करते नहीं थकते है और दुनिया के सामने खुद को जातीय वर्ग के मसीहा के तौर पर खुद को दर्शाने का प्रयास करते हैं।

हालांकि देश भर में दूसरे समुदाय और जाति वर्ग पर उपेक्षा करने के आरोप लगाने के अलावा कोई कार्य नहीं है हर मामले में जातिगत समीकरण दिखाने और हर मुद्दे को जातिगत देखने के आदी हैं।

किस पर मचा है बवाल?

उदित राज का ही एक दूसरा उपक्रम है आल इंडिया परिसंघ (@aiparisangh ) जिसके हवाले के लगातार जहरीले ट्वीट किए जाते है इस बार उदित राज के संगठन के द्वारा ब्राम्हण समुदाय पर निशाना लगाते हुए ब्राम्हण समुदाय को सुअर के तौर पर दिखाया गया है जिसको लेकर खासा बवाल मचा हुआ है दरअसल उदित राज के संगठन ने कोलेजियम जज के चयन को लेकर अपने विचार साझा किए थे जिसका सार कुछ ऐसा था

"एक ब्राम्हण जज दूसरे ब्राम्हण को मुख्य जज बनाने की अपील तीसरे जज से करता है, तीसरा ब्राम्हण जज दूसरे ब्राम्हण जज की मेरिट देखकर और पहले ब्राम्हण जज की सिफारिश मानकर उस जज को मुख्य जज के तौर पर नियुक्त करता है फिर दूसरा ब्राम्हण जज तीसरे ब्राम्हण जज का स्थान ले लेता है"

सबसे ज्यादा विवाद तश्वीर को लेकर होना शुरू हुआ जिसमें सुअर को जनेऊ पहने हुए चंदन लगाए हुए दिखाया गया है, हालाँकि इससे पहले कि विवाद को लेकर कोई कानूनी प्रक्रिया अपनाये जाने की पहल होती इससे पहले ही परिसंघ ने अपने ट्वीट को हटाकर माफीनामा टाइप में कुछ मांगा हालाँकि माफीनामे की भाषा शैली किस प्रकार है उसपर भी नजर डाली जा सकती है:

हालांकि सोशल मीडिया यूज़र्स के पास एक स्क्रीनशॉट नाम का टूल होता है जिसका जमकर उपयोग होता है, इसी चक्कर मे लोगों ने परिसंघ और उदित राज को काफी सुनाया, लेकिन जानकारों की माने तो इससे भी चिकने घड़े पर कोई फर्क नहीं पड़ता।

लोगों का मानना है कि इस तरह की अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने वाले और मानसिक रूप से विकृत मानसिकता वाले नेताओं की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

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उदय बुलेटिन
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