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क्या है COVID-19 की वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया, आखिर कब तक आयगी इसकी दवा ?

दुनिया भर में तबाही मचाने वाले इस Covid 19 वायरस से अब हर कोई परेशान हो गया है इसलिए सभी के मन में ये सवाल बार बार आ रहा है कि आखिर इस बीमारी की वैक्सीन मार्केट में कब तक आएगी?

Puja Kumari

Puja Kumari

विश्वभर के वैज्ञानिक इन दिनों बस एक ही चीज के आविष्कार में जुटे हुए है और वो है कोरोना वायरस की दवा। जी हां, पूरी दुनिया में भयानक तरह से फैल चुके इस वायरस ने अभी तक लगभग सवा लाख लोगों की जान ले ली है।

दिन प्रतिदिन इस खतरनाक संक्रमण का दायरा बढ़ता ही जा रहा मगर सबसे ज्यादा चिंता की बात ये है कि करीब 4 महीने से ऊपर हो जाने के बाद भी चीन, ना जापान, ना इटली और ना ही अमेरिका जैसे विकसित देश इसकी कोई पुख्ता दवा नही बना पाए हैं। हालांकि दुनियाभर वैज्ञानिक COVID-19 की दवा बनाने में लगे हुए है, मगर उनका यह प्रयास कहाँ तक पहुंचा है आइए इसके बारे में जानते हैं।

क्या है COVID-19 वैक्सीन डेवलोपमेन्ट का प्रोसेस

सर्वप्रथम तो आप ये जान लीजिए कि WHO (वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन) लगातार कोरोना पर अपडेट दे रहा है। साथ ही इस बात की जानकारी भी दे रहा है कि इसके इम्यून के लिए किस तरह की दवा बनाई जा रही है तथा अभी और कितना वक्त लगेगा।

WHO के अनुसार बताया गया है कि COVID-19 की कई दवाएं अभी प्रक्रिया है में हैं जिनमे से कुछ क्लीनिकल तो कुछ प्री क्लीनिकल इवैल्यूएशन प्रक्रिया में है। अब ये क्लीनिकल और प्री क्लीनिकल इवैल्यूएशन क्या बला है तो इसे आप ऐसे समझ लीजिए कि यह दवा तैयार करने की एक प्रक्रिया है जिसमे कई स्टेज के तहत वैक्सीन तैयार की जा रही है।

फिलहाल 67 वैक्सीन कैंडिडेट प्री क्लीनिकल इवैल्यूएशन में है जबकि 3 वैक्सीन कैंडिडेट प्री क्लीनिकल इवैल्यूएशन में है।

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कोरोना वायरस की दवा तैयार करने के मुख्य चरण

1. एक्सप्लोरेटरी स्टेज

2. प्री क्लीनिकल स्टेज

3. क्लीनिकल ट्रायल या ह्यूमन ट्रायल

COVID-19 यानी कोरोना वायरस डिजीज- 2019 की वैक्सीन बनाने की सबसे पहले प्रक्रिया जिसे एक्सप्लोरेटरी स्टेज बताया गया है इसमें वैज्ञानिक प्रयोगशाला में भिन्न भिन्न तरह के एंटीजन जैसे वायरस का प्रोटीन या उसका पार्टिकल आदि जिसे 'वैक्सीन कैंडिडेट' भी कहते हैं उसका अध्ययन करते हैं और इस बात का पता लगाने का प्रयास किया जाता है कि इस बीमारी को रखने में इसकी कितनी क्षमता है।

इसके बाद दूसरी प्रक्रिया जिसे प्री क्लीनिकल स्टेज कहा जाता है उसमें वैज्ञानिकों द्वारा मनुष्य या फिर किसी जीव की कोशिकाओं में एंटीजन के प्रति प्रतिरोधी क्षमता पर रिसर्च किया जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान यदि कोशिकाओं को किसी तरह का नुकसान नही होता है और एंटीजेन के प्रति इम्यून रिस्पॉन्स प्रभावी होता है तो इनपर प्रयोग जारी रखते हुए जीवित जानवरों पर टेस्ट किया जाता है।

तीसरे चरण में यानी कि लाइव टेस्ट के दौरान प्रयोगशाला में बंदरों, चूहों, आदि पर प्रतिरक्षा का अध्ययन किया जाता है और इस बात पर निष्कर्ष निकाला जाता है कि क्या एंटीजन इस बीमारी के प्रति रोग प्रतिरोधी क्षमता पैदा कर पा रहा है या नही। इसी दौरान वैज्ञानिकों को उनके टेस्ट का तकरीबन 75 प्रतिशत से ज्यादा निष्कर्ष पता चल जाता है।

आमतौर अभी तक यह पाया गया है कि अधिकतर वैक्सीन प्री क्लीनिकल स्टेज में ही फेल हो जाते हैं और जो बचते हैं उन्हें प्रयोगशाला में या फिर इंसानी शरीर पर प्रयोग किया जाता है।

इन टेस्टों को इंसानी शरीर पर प्रयोग करने की कुछ नियम बनाये गए है जिन्हें कुछ फेज में बांटा गया है। जैसे फेज 1 में COVID-19 के लिए इजाद की गयी दवा का 20-80 स्वस्थ लोगों पर आजमाया जाता है और यह परखा जाता है कि यह उनके इम्यून सिस्टम पर किस हद तक असर डाल रहा है।

इसके बाद फेज 2 में यह क्लीनिकल ट्रायल 100 से अधिक की संख्या में उन लोगों पर किया जाता है जो पहले से बीमार है या जिनमे बीमार होने की संभावना होती है। इस दौरान व्यक्ति पर हर तरह का अध्ययन किया जाता है, की दवा की इम्युन सिस्टम को शुरू करने की क्षमता, कितनी मात्र में डोज देना है, आदि।

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आखिर में फेज 3 पर आते हैं जिस दौरान यह प्रयोग एक साथ कई हजार लोगों (एक से दस हजार तक) पर किया जाता है और तब वैज्ञानिक इन बातों पर बहुत ही बारीकी से अध्ययन करते हैं कि क्या इस दवा को देने से लोगों को हुआ संक्रमण कम हुआ ?

क्या बीमारी में कोई सुधार आया ? क्या इसकी वजह से लोगों का इम्यून सिस्टम पहले से बेहतर हुआ ? आदि तमाम बातों पर अच्छे से शोध करने के बाद ही वैज्ञानिक इस निर्णय पर पहुँचते हैं कि उनके द्वारा बनाई गयी वैक्सीन वाकई में कारगर है अन्यथा उसे असफल करार दे दिया जाता है।

कोरोना वैक्सीन बनाने में लग सकता है इतना वक़्त

सिर्फ इतना ही नहीं, अगर यहाँ तक वैज्ञानिकों को सफलता मिल भी जाती है तो आखिर में उसे फेज 4 से गुजरना पड़ता है। यह सबसे अहम दौर होता है क्योंकि इस दौरान दवा मरीजों पर किस तरह का असर कर रही है इसका बराबर ध्यान रखना बेहद आवश्यक हो जाता है।

आपको यह भी बताते चलें कि अभी तक पब्लिक हेल्थ के लिए जितनी भी दवाएं तैयार की गयी हैं उनके इस्तेमाल में आने तक में 10 से 20 वर्ष तक का समय लगा है।

फिलहाल तो वैज्ञानिकों के प्रयास को देखते हुए अनुमान यही लगाया जा रहा है कि कोरोना वायरस की दवा तैयार होने में 6 से 8 महीने का वक़्त लग सकता है। मगर यह कहना गलत नहीं होगा कि COVID-19 की दवा तैयार करने की रफ़्तार भले ही कितनी भी तेज क्यों ना हो मगर यह दुनियाभर के वैज्ञानिकों के सामने बहुत बड़ी चुनौती होगी।

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