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क्या लॉकडाउन खोलना सही होगा, सरकार के कदम कहीं गलत तो नहीं जा रहे?

मामला देश की भारी आबादी की जान को बचाने को लेकर है, जहाँ अमेरिका जैसे विकसित देश अब घुटनों पर चल रहा है इटली जैसा देश धड़ाम हो चुका है वहां भारत जैसे विकाशशील देश की क्या बिसात है।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

लॉक डाउन 5.0 है या अनलॉक 1.0?

देश मे इस वक्त जब कोरोना के मामले लगातार संख्यात्मक रूप से बढ़ते जा रहे है उस वक्त केंद्र सरकार द्वारा देश को सँभालने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकारों और उसके बाद प्रदेश सरकारों ने जिला लेवल पर जिलाधिकारियों के कंधों पर सौप दी है। अब जिलाधिकारी अपनी यथास्थिति के अनुसार जिले का प्रबंधन देखकर पाबंदी बढ़ाएं या घटाए। हालांकि ये निर्णय कमजोर नहीं है लेकिन इसके कई दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं और अगर संक्रमण की स्थिति बिगड़ी तो मामला हाँथ से निकल सकता है।

सरकार उपायों पर गौर ही नही कर रही:

देश दुनिया मे इस वक्त कोरोना की दवा, वैक्सीन, एंटीडोट इत्यादि पर युद्धस्तर पर काम चल रहा है लेकिन भारत मे इसके कोई खास परिणाम नजर नहीं आ रहे। अब तक भारत मे किस कंपनी और किस सरकारी संस्थान के द्वारा दवाओं के विकाश पर काम चल रहा है इसके बारे में न तो पब्लिक डोमेन में कोई जानकारी लायी जा रही है और न ही इसके बारे में कोई सकारात्मक खबर उपलब्ध कराई जा रही है।

हालांकि इस बीच मे कुछ चिकित्सकों ने इलाज की पुरानी और सर्व प्रचलित दवाओं के द्वारा इलाज के दावे की बात कही है, और इस बारे में पुख्ता सबूत दिए जा रहे है यहां तक कि भोपाल के एक चिकित्सक डाक्टर डी आर शर्मा द्वारा मुख्यमंत्री से लेकर केंद्र स्तर पर कोरोना के सफल इलाज के दावे के साथ इलाज करने की अनुमति मांगी जा रही लेकिन सरकारों द्वारा सिर्फ दवाओं के नाम जानने की जिज्ञासा देखी जा रही है। ज्ञातव्य हो कि भोपाल में निवास करने वाले चिकित्सक डी आर शर्मा की बेटी जो इस वक्त लंदन में रहकर होम्योपैथी की प्रैक्टिस कर रही है। उनके द्वारा पहले से ही प्रचलित होम्योपैथिक दवाओं के उपचार के द्वारा कोरोना जैसी महामारी पर काबू पाने का दावा किया जा रहा है लेकिन सरकार के नुमाइंदों द्वारा इसकी जांच पड़ताल करने की जगह सिर्फ दवा के समिश्रण की जानकारी मांगी जा रही है।

घर लौटे लोगों से ही सबसे ज्यादा संकट है:

अब इसे देश मे तमाम प्रदेशों की सरकारों की नाकामी कहे या कुछ और प्रदेश से बाहर जाकर नौकरी करके वापस आने वाले लोगों का सिलसिला एक बार शुरू हुआ जो अभी भी लगातार चल रहा है। इसी तर्ज पर उत्तर प्रदेश सरकार क्वारण्टाइन के नाम पर एक हजार रुपये देकर अपना पल्ला झाड़ रही है। क्योंकि इन लोगों को अपने घर में रुकना गवारा नहीं है नतीजन बाहर निकलने की वजह से संक्रमण का खतरा दिनो दिन लगातार बढ़ता जा रहा है। हालांकि पुलिसिंग के नाम पर विभागीय आंकड़े भी है लेकिन हालात वैसे नहीं है जिनके द्वारा कोरोना प्रीवेंशन किया जा सके।

क्या होंगी संभावनाएं ?

अगर बुद्धिजीवियों की माने तो जून से लेकर जुलाई के आखिरी तक का समय भारत के लिए किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं है। चूंकि यही वक्त है जिसके लिए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत मे कोरोना अपने चरम पर जा सकता है भले ही उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में एक लाख तक की संख्या तक के कोरोना बेड तैयार है लेकिन अगर उत्तर प्रदेश की जनसंख्या का आंकड़ा देखे तो ये सारी व्यवस्था नाकाफी मानी जायेगी। हालांकि यहां एक बात कहनी बेहद मुफीद रहेगी कि उत्तर प्रदेश जैसे भारी जनसंख्या वाले राज्य में वर्तमान सरकार ने कोविड 19 के लिए किए जाने वाले कार्यो में तेजी लाई है इसमें कोई शक नही है फिर भी अगर संक्रमण की दर और इसके फैलने का दायरा देखते है तो सारी व्यवस्थाएं शून्य हो जाती है।

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उदय बुलेटिन
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