जज बनने के लिए कम से कम तीन साल बतौर वकील होने का अनुभव अनिवार्य, नियम के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार को दिया नोटिस

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने जज बनने के लिए कम से कम तीन साल की वकालत को अनिवार्य करने की मांग की
जज बनने के लिए कम से कम तीन साल बतौर वकील होने का अनुभव अनिवार्य, नियम के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार को  दिया नोटिस
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जज, न्यायाधीश, न्यायमूर्ति, पता नहीं कितने कितने नामों से जाना जाता है यह पद और काम होता है दो पक्षों के दावों, बातों और तर्कों को सुनकर फैसला सुनाने का। इस पद के लिए न्यूनतम अहर्ता होती है कि परीक्षा में बैठने वाले प्रतिभागी के पास कानून में बैचलर की वैध डिग्री होनी चाहिए। लेकिन आंध्र प्रदेश सरकार ने अपने राज्य में जज के पद पर भर्ती के नोटिफिकेशन में तीन साल की वकालत का अनुभव मांग लिया है जिसको लेकर अभ्यर्थियों में हड़कंप मचा हुआ है।

क्या है बवाल:

बवाल की शुरुआत आंध्र प्रदेश सरकार (स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश) की न्यायिक व्यवस्था में जजों के पद को भरने के लिए जारी नोटिफिकेशन के माध्यम से हुई। दरअसल सरकार ने पद की मुख्य अहर्ता में एलएलबी की डिग्री के साथ तीन साल की वकालत का अनुभव मांग दिया है। अब इस चक्कर मे जो अभ्यर्थी लंबे वक्त से समय को नष्ट करके कानून की किताबों में अपना दिमाग खपाये बैठे थे उनके लिए यह एक टाइप का सरदर्द से हो गया है। क्योंकि अगर अब उन्हें यह नही अहर्ता हासिल करनी है तो उसके लिए सबसे पहले उन्हें तीन साल का वक्त वकालत में देना होगा और उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम होगा बार काउंसिल ऑफ इंडिया में खुद को रजिस्टर करना। उसके बाद वकालत की अनुमति मिल सकेगी, इस पर इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश को दूसरा पक्ष बनाया गया है।

बार काउंसिल ने अलापा अपना राग:क्या है सम्भावना:

इस मामले पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र लिखकर आंध्र प्रदेश सरकार की बात का समर्थन किया है। बार काउंसिल ने अपने पत्र में इस बात का तर्क रखा है कि केवल डिग्री धारक छात्र न सिर्फ अपरिपक्व होते है बल्कि उन्हें मामले को किस तरह से देखना है इसका ज्ञान नही होता और कई बार वे वकीलों के साथ सहज नही हो पाते इसलिए उनका सीधा जज बनना उचित नही है। केवल डिग्री धारक जज न सिर्फ अशिष्ट होते है बल्कि उनका रवैया/बर्ताव अव्यवहारिक पाया जाता है।

हालाँकि इस बयान पर जजों द्वारा कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की गई है वही बार के इस तर्क पर अन्य प्रतिभागियों द्वारा कड़ा विरोध दर्ज कराया गया है। लोगों के आरोप है कि अगर बार काउंसिल यह दावा कर रहा है कि वकालत के साथ लोगों के व्यवहार में परिवर्तन आता है तो बार यह बताये की क्या उसके द्वारा रजिस्ट्रेशन किये जाने के बाद कोई ट्रेनिंग कराई जाती है, या कोई सेशन लिए जाते है, कहने का तात्पर्य यह है कि बार की जिम्मेदारी केवल रजिस्ट्रेशन की भारी भरकम फीस लेकर खत्म हो जाती है, वकील अपने अनुभव से कुछ सीखे अथवा नही

क्या है सम्भावना?

संभावना बेहद साफ है सुप्रीम कोर्ट इस मामले को कुछ ही हियरिंग में काट पीट कर अलग करने वाला है। दरअसल यह पहला मामला नही है जब इस तरह की मांग उठी है, इससे पहले भी एक कमेटी बनाकर राय हासिल की गई थी कि क्या किसी अभ्यर्थी को जज बनने के लिए वकालत का अनुभव होना अनिवार्य होना चाहिए जिसपर कमेटी ने इस तथ्य को सिरे से नकार दिया था।

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उदय बुलेटिन
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