सवाल वाजिब है! सरकारी पैसे पर धार्मिक शिक्षा क्यों?

पिछले 2 दशक में पूरी दुनिया में आतंकी हमलों के बाद मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा पर सवाल खड़े होने लगे, लेकिन इसे पूरी तरह से रोकने या बंद करने की हिम्मत किसी की नहीं हुई
सवाल वाजिब है! सरकारी पैसे पर धार्मिक शिक्षा क्यों?
government madrasa in assamGoogle Image

असम में बीते दिनों से सरकारी खर्चे पर मदरसा चलाने से सरकार का मोह भंग हो गया है , सरकार ने कहा है कि सरकार क्या सिर्फ कुरान पढ़ाने के लिए है? सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए बताया है कि अगर सरकारी पैसे से कुरान पढ़ाई जा सकती है तो गीता और बाइबिल क्यों नही?

असम में सरकारी पैसे से धार्मिक शिक्षा बंद:

दरअसल बीते दिनों से चल रही उठापटक के बाद असम के शिक्षा मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने घोषणा की है कि सरकारी खर्चे पर बड़े पैमाने पर चलने वाले मदरसों को आम स्कूल की तरह चलाया जाएगा, यही नही सरमा ने यह भी बताया कि इसी तर्ज पर चल रहे संस्कृत स्कूलों को भी आम स्कूलों की तरह चलाया जाएगा जो सरकार द्वारा वित्त पोषित है, हालांकि आपको बताते चले कि संस्कृत के माध्यम से धार्मिक शिक्षा वाले विद्यालयों की संख्या न के बराबर है। असम में उर्दू माध्यम से धार्मिक शिक्षा देने वाले मदरसों की भरमार है, लेकिन शिक्षा मंत्री के इस बयान से चारों तरफ से विरोध के स्वर उभरने लगे हैं।

इस मामले को लेकर केवल असम ही नहीं बल्कि पूरा देश दो धड़ों में बट गया है जिसके तहत एक पक्ष के लोगों द्वारा सरकार पर असहिष्णु होने और मुस्लिमों के साथ अन्याय होना बताया जा रहा है जबकि दूसरा पक्ष यह कह रहा है कि धार्मिक शिक्षा बेहद निजी मामला है अगर किसी व्यक्ति को धार्मिक शिक्षा लेनी है तो वह इसे निजी रूप से संचालित कराए, इसमें सरकार का अनुदान क्यों?

मुस्लिम समुदाय द्वारा असम सरकार के इस आदेश का विरोध यह कहकर किया जा रहा है कि मदरसा देश की पहचान है

क्या कहता है धार्मिकता शिक्षा आंकड़ा:

अगर आंकड़ों की बात करें तो देश के चार राज्यों में करीब 10 हजार से ज्यादा मदरसे संचालित किए जा रहे है और इन मदरसों में करीब 20 लाख से ज्यादा छात्र पढ़ते है, यहां आपको बताते चले कि मदरसों में 98 प्रतिशत से भी ज्यादा छात्र केवल एक समुदाय से है और इसका मुख्य कारण है धार्मिक शिक्षा को आधार बनाकर शिक्षा प्रदान करना।

लोगों के अनुसार अगर गैर मुस्लिम बच्चा मदरसे में पढ़ने जाता है तो उसे अनिवार्य रूप से कुरान को पढ़ना पड़ता है, जो कि जायज नहीं है,

वहीँ अगर उत्तर प्रदेश की बात करे तो यहां पर सरकारी अनुदान से चलने वाले मदरसों की संख्या करीब 8000 से भी ज्यादा है और इन मदरसों में करीब 18 लाख से भी ज्यादा छात्र धार्मिक शिक्षा लेने के लिए आते है। लेकिन इसके पीछे कुछ स्याह आंकड़े भी छुपे हुए है, दरअसल उत्तर प्रदेश के मदरसों में शिक्षा लेने वाले छात्र दलितों के अनुपात को भी नही पा पाते उनकी शिक्षा दर दलितों से भी नीचे नजर आती है।

आंकड़ों के अनुसार केवल 48 प्रतिशत मुस्लिम छात्र ही 12वीं पास करते है, जो कि चिंता का विषय है। वहीँ केवल 12 प्रतिशत छात्र ही 12 से आगे की पढ़ाई जारी रखते है, सभी आंकड़े शिक्षा मंत्रालय के द्वारा उजागर किये गए है।

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उदय बुलेटिन
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