Arnab Goswami on Sonia Gandhi
Arnab Goswami on Sonia Gandhi|Google Image
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अर्नब गोस्वामी ने जो कहा वो चलन बेहद नया नहीं है, देश के पीएम का मजाक बनाकर शुरुआत कांग्रेस ने ही की थी।

वीर सावरकर को माफी वीर कहने का चलन कांग्रेस में ही शुरू हुआ था, नतीजन  कांग्रेस को अब अपने ही चलन से तकलीफ हो रही है”

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

क्या है माजरा ?

माजरा सीधे-सीधे कांग्रेस और शिवसेना समेत राष्ट्रवादी कांग्रेस शासित प्रदेश महाराष्ट्र से जुड़ा हुआ है जहां के जिले पालघर के एक गांव में अफवाह के चलते करीब 200 से ज्यादा उन्मादी लोगों ने पुलिस अभिरक्षा में दो संतो समेत ड्राइवर की हत्या कर दी थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ये हत्या सरकार ने कराई थी।हाँ वो बात अलग है कि इस घटना में पुलिस की भूमिका और सरकार के एक्शन लेने की बात को लेकर तमामं सवाल उठ रहे है, क्योंकि देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी के द्वारा इस मामले पर न तो कोई बयान दिया गया और न ही अपनी सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाये गए।बस इसी मामले को लेकर रिपब्लिक भारत के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी ने सोनिया गांधी से सवाल पूंछ दिए।

मुद्दा इस तरफ गया:

मुद्दे का क्या है ये तो जाने के लिए ही होते है लोग अपनी सुविधा अनुसार उठा कर प्रयोग कर लेते है और अगर मामला उन्हें थोड़ा सा बूम कर सकता है लोग उसे भुनाते है फिर चाहे वह अखलाख हो या कोई और, अर्नब गोस्वामी ने भी मुद्दे को चुनने की बात पर जिरह की है। अर्नब के अनुसार जब कोई अल्पसंख्यक समुदाय के साथ इस तरह की घटना होती है तो लोगों द्वारा इस मामले को एक अलग तरीके से देखा जाता है लेकिन चूंकि अब मामला संतो का है तो इसे न सिर्फ बेहद हल्के तरीके से लिया गया बल्कि इसे कोई तवज्जो ही नहीं दी गयी। इसी बात को लेकर अर्नब कांग्रेस , सोनिया गांधी और वाड्रा परिवार पर भड़क उठे। हालांकि यहाँ अर्नब की भाषा असंयमित नजर आती है, लेकिन चूंकि अब राजनीति में भाषाओं का साफ सुथरा मिलना बेहद मुश्किल है तो केवल अर्नब को गलत कह देना नाइंसाफी होगी। हालांकि अर्नब की भाषा को सही कहना भी गलत ही होगा।

मुद्दों पर पकड़ :

अगर मुद्दों पर पकड़ की बात करे तो तमाम ऐसे उदाहरण है कि लोग लिंचिंग के मामले को लेकर यूएन तक पहुंचे, चिट्ठियां लिखी गयी, लेकिन संतो की हत्या और लिंचिंग पर महाराष्ट्र सरकार ने जो लचर उदाहरण प्रस्तुत किया है वो न सिर्फ निंदनीय है बल्कि समाज के लिए बेहद गंदा उदाहरण है। समाज मे इस घटना के बाद से सरकारों के प्रति मृतकों के प्रति उनकी जाति और समुदाय को देखकर संवेदना व्यक्त की जाएगी। इसमें मीडिया भी अपना अहम रोल अदा करती है। एक तरह की दो घटनाओं में दो मापदंड कैसे हो सकते हैं? मसलन "महाराष्ट्र में दलित युवक की निर्मम हत्या,

दूसरी

"गुजरात मे एक युवक की हत्या"

तीसरी

"समुदाय विशेष के एक युवक की चोरी के शक में हुई हत्या, बढ़ रही है असहिष्णुता,

इन तीनों मामलो में युवकों की हत्या होती है लेकिन जाति, समुदाय को देखकर मीडिया द्वारा हेडलाइन गढ़ी जाती है, जिनपर लगाम लगना बेहद जरूरी है।

भाषा और संयम :

दोनो आज के परिवेश में बिल्कुल नदारद है अगर आप पिछले कुछ वक्त को देखे तो इसमे तमाम ऐसे बयान मिल जायेंगे जिंनमे आपको कमी मिलेगी खुद कांग्रेस पार्टी जो आज सोनिया के पूर्व नाम एंटोनियो मायनो के नाम को लेकर चिढ़ रही है उसकी पार्टी के द्वारा भारत के प्रधानमंत्री को किन-किन नामो से पुकारा गया है इसमे पचास बार ये शब्द पढ़ सकते है।

क्या होना चाहिए:

अब जब नेताओं के द्वारा ही बड़बोलपन दिखाया जाता है तो इसमे कोई कानून बनने की संभावना नहीं के बराबर है लेकिन अगर ऐसा संभव है तो ऐसा कड़ा कानून बनाना चाहिए जिससे कोई दूसरे पर कोई बात कहने से पहले हजार बार सोचे।

डिस्क्लेमर : उक्त लेख में लेखक के निजी विचार है, हम अर्नब गोस्वामी के द्वारा दिखाए गए अनावश्यक गुस्से की भावनाओं को समझते हुए भी उनके निजी हमले की बात पर सहमति नही रखते है।

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उदय बुलेटिन
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