उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com
Sign of civil war
Sign of civil war|Google
टॉप न्यूज़

दिल्ली में बढ़ता जनाक्रोश, कहीं सिविल वार की पटकथा तो नहीं लिखी जा रही। 

ऐसा तो नहीं कि प्रदर्शनों में लगते हुए नारे दूसरे लोगों को खुद पर निजी हमले साबित हो रहे हो, अगर ऐसा है तो दोनो पक्षों को सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि आग भड़कने में देर नही लगती। 

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

दिल्ली का राजनैतिक रण, वैसे दिल्ली सदियों से जंग के लिए महशूर रही है फिर चाहे वह महाभारत हो या दिल्ली के तख्तोताज के लिए लड़ी गयी असंख्य लड़ाइयां लेकिन पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में सरकार के एक कानून को लेकर बड़ा हो हल्ला मचा हुआ है, जिसके रिजल्ट भले ही न आये हो लेकिन उसके नुकसान जरूर झलकने लगे हैं, इसके ताजे नमूने पिछले दो दिन के घटनाक्रम में देखे जा सकते है।

आंदोलन यात्रा में गोली चली :

भले ही इस गोली ने किसी एक आदमी को हल्का नुकसान पहुँचाया हो लेकिन इस घटना से देश की आत्मा को चोट पहुँची है। एक आंदोलन मार्च के आगे आकर " मैं तुम्हे आजादी देता हूँ" ऐसा बोलकर आंदोलनकारियों की तरफ फायर झोंकना एक अलग तरह की विकृति को दर्शाता है। इसके तुरंत बाद ही उक्त आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया जहाँ उसने अपने मंसूबों को जाहिर किया। गोपाल नाम के व्यक्ति ने बताया कि वह किसी को जान से मारने की नीयत से नहीं आया था बल्कि बस लोगों को डराने का प्लान था ताकि ये झमेला जल्दी से जल्दी खत्म हो जाये, क्योंकि बहुत दिनों से आजादी - आजादी के नारे को सुनकर थक गया था।

अब शाहीन बाग में चली गोली :

जामा मस्जिद जाते हुए आंदोलन के बाद अब शाहीन बाग में खुले आम हवाई फायरिंग हुई जिसमें दिल्ली के दल्लूपुरा गांव के करीब बीस वर्षीय लड़के ने लगातार दो फायर देशी अवैध पिस्टल से किये, पुलिस ने इसे भी दबोच लिया, और पुलिस लड़के को अपनी गिरफ्त में लेकर पूंछताछ कर रही है।

मामला कहीं सिविल वॉर की तरफ तो नहीं जा रहा ?

आंदोलन का एक तरीका होता है जिसमें अपनी बात रखने का एक ढंग होता है लेकिन अगर जामिया और शाहीन बाग के आंदोलनों पर नजर डाले तो ये पूरी तरह से अपने अधिकारों की बात न कह कर "धार्मिक " होते जा रहे है।

किसी आंदोलन में " ला इलाहा इल्लिल्ला" और नारा ए तकबील जैसे नारों का घोष कहीं दूसरी तरफ तो नहीं पहुँच रहा? इसी बीच शाहीन बाग और जामिया से जुड़े हुए एक आंदोलनकारी शरजील इमाम ने तो इसे एक नई दिशा ही देदी, वो आंदोलन के माध्यम से लोगों को यह समाझने में जुटे है कि भारत को कैसे तोड़ा जाए।

अगर स्थितियां ऐसी ही बनती रही तो दूसरा पक्ष जो इस आंदोलन से इतर राय रखता है उसे अपने वजूद पर संकट समझ मे आने लगेगा, और इसके बाद से ही ऐसी स्थितियों का लगातार दोहराव होने लगेगा, हालांकि अभी इसकी विसंगतियो और संकटों का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, लेकिन भविष्य में होने वाले घटनाक्रम की धुंधली तस्वीर सबके सामने दिखाई देने लगी है।

क्या हो सकता है विकल्प :

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ सबको अपनी बात रखने का हक है, लेकिन शायद आपने अपने शिक्षा पाठ्यक्रम के पाठ में एक लाइन पढ़ी हो कि "आपकी स्वतंत्रता वहीँ समाप्त हो जाती है जहां से दूसरे की स्वतंत्रता शुरू होती है" लेकिन अगर इस आंदोलन की प्रकृति देखें तो उसमे शुरुआत से ही "हिंदुत्व से आजादी" और तमाम प्रकार के नारों की भरमार रही। जिसकी वजह से दूसरा पक्ष इसको लेकर आतंकित होने लगा, हालांकि मैं अपवादों की बात नही करता लेकिन अगर ये दोनों मामले पहले से प्लांट नही है अथवा प्रेरित नहीं है और इन बच्चों ने अपने निजी निर्णय के आधार पर इस फैसले को किया है तो ये बड़े चिंता का विषय है। अगर माहौल इसी तरह का रहा तो स्थिति बेहद विकृत हो सकती है, जिसके लिए दोनो पक्षों को अपनी सीमाएं निर्धारित करनी चाहिए। ताकि किसी के निजी और धार्मिक मामलों पर हमला न हो।

डिस्क्लेमर : लेख में लेखक ने अपने निजी विचार प्रस्तुत किये है

उदय बुलेटिन के साथ फेसबुक और ट्विटर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।