colonel purohit released
colonel purohit released|Social Media
टॉप न्यूज़

क्या कर्नल पुरोहित का नाम आतंकी गतिविधियों में घसीटना एक साजिस थी? या भारतीय राजनीति का काला सच

देश के सैनिक को राजनीती का शिकार बनाकर 9 साल तक जेल में यातनाएं दी गयी। देश के लिए जान की बाजी लगा देने वाले एक सैनिक को बिना गुनाह के इतनी बड़ी सजा क्यों ?

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

बात जो भी हो लेकिन भारतीय न्यायपालिका और भारतीय पुलिसिंग पर एक सवालिया निशान लगता है कि कैसे देश की सेना के एक बड़े ओहदेदार अधिकारी (कर्नल) को मालेगांव बम ब्लास्ट में नामित कर सकती है। आखिरकार कर्नल पुरोहित अब फिर से वर्दी में सज गए हैं लेकिन इस तरह की घटना को अलग नजरिये से देखा जाए तो कुछ वाजिब सवाल नजर आते है, जिनका जवाब न तो सेना के पास है न ही उस वक्त की सरकार के पास।

आखिरकार कर्नल पुरोहित रिहा हुए:

कर्नल पुरोहित की गिरफ्तारी की स्क्रिप्ट काफी पहले लिखी जा चुकी थी उस वक्त तक पुरोहित भारतीय सेना की मिलिट्री इंटेलिजेंस में अपनी सेवाएं दे रहे थे और खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ भारतीय सेना की रणनीति भारत के अंदर रह कर विकसित कर रहे थे। लेकिन 29 सितंबर 2008 का साल जब मालेगांव (महाराष्ट्र) में ब्लास्ट हुआ और करीब 9 लोग काल कवलित हुए। इसके बाद इस मामले में एक संगठन का नाम आया अभिनव भारत और एक अलग किस्म की पड़ताल में अन्य लोगों के साथ साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के साथ कर्नल पुरोहित का नाम उछाला गया और जांच में यह साबित करने का प्रयास किया गया कि कर्नल ने इस ब्लास्ट की इबारत लिखी थी। याद रहे इस मामले में साल दर साल जांच एजेंसियों ने सुबूत खंगाले, पेशी हुई, सुप्रीम कोर्ट समेत एनआईए जैसी संस्थाओं की अदालतों ने परत दर परत केस को खोला। प्रज्ञा ठाकुर पहले ही रिहा हो चुकी है और पिछले हफ्ते ही कर्नल पुरोहित जेल से रिहा होकर बाहर आये है। लेकिन जैसा कि पहले बताया गया है कि 9 साल का लंबा वक्त कर्नल के जीवन में भी आया जिसका हिसाब किसी एजेंसी, किसी सरकार के पास नहीं है।

हिन्दू आतंकवाद की गढन और भारी यातना:

ऐसा नही कि सिर्फ आरोप मढ़कर कर्नल पुरोहित को जेल में रखा गया एक सिपाही जो सेना में भर्ती होते हुए अपने देश की सेवा का वचन लेता है। जिसके लिए देश सेवा में मर जाना ही फक्र की बात होती है उसी कर्नल के साथ जेल में भयानक यातनाएं आजमाई गयी। भारतीय राजनीति में समीकरण बनाने के लिए शब्दकोश में हिन्दू आतंकवाद उस वक्त लिखा गया जब किसी दूसरे मजहब को आतंकवाद के साथ जोड़ना आपको असहिष्णुता का परिचायक माना जायेगा। इस मामले में कर्नल पुरोहित ही नहीं बल्कि साध्वी प्रज्ञा के साथ अमानवीय यातनाओं को आजमाया जाए ताकि ब्लास्ट की जिम्मेदारी सर पर मढ़ी जाए। लेकिन देर सबेर ही सही आखिरकार एनआईए की अदालत ने उन पर लगे मकोका के चार्जेस हटाये और सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बंदिशों (जैसे अदालत की मंजूरी के बिना देश नहीं छोड़ सकते, पासपोर्ट को अदालत के पास जमा करके, गवाहों को बिना छेड़े ) जमानत दे दी।

सेना ने किलियर किया सब ठीक है:

दरअसल उस वक्त कर्नल पुरोहित मिलिट्री इंटेलिजेंस के लिए फील्ड में रहकर काम रहे थे और जांच एजेंसी ने उनपर बम मुहैया कराने के आरोप लगाये थे इस पर सेना ने अदालत में अपना पक्ष बताकर मामला काफी हद तक साफ कर दिया। साथ ही सेना की कोर्ट ऑफ इन्क्वारी में यह बताया कि कर्नल पुरोहित उस वक्त तक देश के अंदर आंतरिक आतंकवाद पर लगातार मीटिंग्स कर रहे थे जिसमें फरीदाबाद और भोपाल प्रमुख है। सेना ने साफ किया कि कर्नल का जिम्मा केवल सूचना जुटाना और सेना को इन्फॉर्मेशन प्रदान करना था जो वो लगातार कर रहे थे। उन्हें इस तरह (ब्लास्ट) जैसे मामले में कहीं से भी नहीं पाया गया है।

आखिर कफील ही क्यों कर्नल क्यों नही?

भारत बहुल धर्मिता वाला देश है यहां पर आप हर मुहल्ले में गर धर्मो के लोगों को देख मिल सकते है, बीते दिन गोरखपुर के डाक्टर कफील कोर्ट के आदेश पर रिहा किय्ये गए है, उन्होंने पुलिस और जेल प्रशासन पर आरोप लगाए की उन्हें जबरन मारा पीटा गया, भूखा रखा गया, देश की मीडिया, जनता उनके साथ सहानुभूति के साथ खड़ी है लेकिन कर्नल पुरोहित का क्या , लोगो के अनुसार अगर डाक्टर कफील राजनीतिक भवर में जबरजस्ती डाले गए तो कर्नल पुरोहित के साथ जो हुआ वह क्या था? क्या इसे राजनीतिक साजिश नहीं माना जाए ?

दरअसल इस मामले को देखने से पहले आपको अपना धार्मिक चश्मा खोलना पड़ेगा, उसे पहनना पड़ेगा क्योंकि यहां बात की शुरुआत और अंत दोनो धर्म के नाम और काम से होगी। सहानुभूति का असल मकसद इमेज सुधार से जुड़ा हुआ है। जो सबके सामने है, किसी को यह अधिकार नही है कि वह डाक्टर कफील पर देश के अंदर अशांति फैलाने के आरोप लगाए उसके लिए अदालतें है, जांच एजेंसियां है। लेकिन कर्नल के मामले में ये सब कहाँ गायब हो जाता है, इस मामले में सोचने की जरूरत है क्योंकि हिन्दू आतंकवाद की अवधारणा खुले मंच से ऐसे ही नहीं दी जाती।

डिस्क्लेमर: इस लेख में लिखे गए तथ्य सभी जगह पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है और यह लेख लेखक का निजी विचार है, उदय बुलेटिन लेख के हर तथ्य से सहमति नहीं रखता।

उदय बुलेटिन के साथ फेसबुक और ट्विटर जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

उदय बुलेटिन
www.udaybulletin.com