किसान आंदोलन और दिल्ली पुलिस: दिल्ली पुलिस ने दिखाया कि सब्र क्या चीज होती है

26 जनवरी का दिन दिल्ली पुलिस के सब्र की परीक्षा का दिन था
किसान आंदोलन और दिल्ली पुलिस: दिल्ली पुलिस ने दिखाया कि सब्र क्या चीज होती है
दंगाइयों ने लाल किले की इज्जत को तार-तार कियाGoogle Image

गणतंत्र की वर्षगांठ जिसे हर भारतीय एक पर्व की तरह मनाता है। आने वाली पीढ़ी को यह राष्ट्रीय पर्व यह संदेश देता है कि देश को आजाद होने में कितनी समस्याओं से गुजरना पड़ा और कितने जनसमुदायों ने इसे हासिल करने के लिए अपने सीने पर गोलियां खाई। लेकिन किसानों के आंदोलन ने देश की अस्मिता के लिए देने वाले बलिदानों को न सिर्फ बदनाम किया बल्कि उसे शर्मसार भी कर दिया।

ट्रैक्टर परेड और उसके मायने:

अगर आज के हालात देखे तो यह कहीं से नही लगता कि यह महज एक उत्तेजना का परिणाम है, लाठी, तलवारें, डंडे और पेट्रोल जैसे किसी द्रव से लैस किसान पूर्वनिर्धारित बाहरी सड़कों से निकल कर दिल्ली के अंदरूनी इलाके में घुसे और दिल्ली के लगभग हर कोने पर वो तांडव फूटा जिसकी किसी को उम्मीद ही नही थी।

असल में करीब 2 महीने से भी ज्यादा वक्त से पंजाब और हरियाणा के किसानों का जामवडा दिल्ली के बाहरी इलाके में रुककर सरकार के द्वारा लाये गए तीन कृषि बिलो को लेकर आंदोलित था लेकिन गणतंत्र दिवस के दिन आंदोलनकारियों ने गणतंत्र दिवस की परेड की तर्ज पर खुद की परेड निकाली। हालाँकि जमावड़े को सम्भालने के मामले में पहले तो दिल्ली पुलिस ने हाथ समेटे लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और विपक्षी दलों द्वारा चलाये गए प्रोपेगैंडा की वजह से दिल्ली पुलिस ने शर्तों के साथ निर्धारित रुट पर परेड निकालने की अनुमति दी।

लेकिन अनुमति लेना एक महज बहाना साबित हुआ, दरअसल किसानों की वेशभूषा में उपद्रवियों ने दिल्ली की सड़कों पर वो कोहराम मचाया कि देश और दुनिया की नजरें दिल्ली पर हो गयी। ट्रैक्टर पर सवार दंगाइयों ने पुलिसकर्मियों से लेकर मीडियाकर्मियों को रौंदने के लिए ट्रैक्टरों को उनकी अधिकतम स्पीड पर दौड़ाया। एक-एक पुलिसकर्मी पर दर्जन भर हथियारबंद दंगाई लाठी, डंडो, तलवारों के साथ टूट पड़े। सबसे बड़ी बात यह रही कि पुलिसकर्मियों के हथियारबंद होने के बावजूद भी किसी पुलिसकर्मी ने बंदूकों का फायर नही खोला।

लाल किले पर झंडाबरदारी:

लाल किले को दुनिया भर में भारत के प्रतीक की तरह माना जाता है, यही कारण है विदेशों में जब भी भारत को प्रस्तुत करना होता है उसके लिए लाल किले के चित्र को दर्शा दिया जाता है, लेकिन दंगाई किसानों ने देश की अस्मिता के प्रतीक लाल किले में पहुंचकर बलपूर्वक तिरंगे के बगल में संगठन के झंडे को लगाकर तिरंगे की अस्मिता को चोट पहुंचाई गयी, यही नही जब सो काल्ड किसान कथित तौर पर किसान संगठन के झंडे को ऊपर लगा रहे थे तो किसी ने उस व्यक्ति को तिरंगा झंडा पकड़ा दिया, इसपर उस व्यक्ति द्वारा तिरंगे झंडे को फेंक दिया गया, इसे अगर तिरंगा की बेइज्जती न कहा जाए तो क्या कहा जाये

किसान नेताओं ने झाड़ा पल्ला:

इस मामले तो एक देशी कहावत बेहद फिट बैठती है "दूध में साथ साथ मट्ठे में अलग" दरअसल जब दिल्ली पुलिस के साथ किसान नेताओं ने बैठक करके परमीसन की मांग की थी तो तयशुदा रुट पर चलकर प्रोटेस्ट करने की बात कही गयी थी लेकिन सड़क पर आते-आते नेताओं का नियंत्रण दंगाई भीड़ पर से हट गया, और दिल्ली पुलिस ने संयम बरतते हुए दंगाइयों को हटाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही यह खबर नेताओं के पास पहुंची तो बेहद शातिराना तरीके से इस मामले पर अपना बचाव करते हुए कहा कि हमारा इन दंगों से कोई लेना देना नही है।

जो भी हो, यह गणतंत्र दिवस इतिहास के काले अध्याय में जोड़ा जाएगा, जिससे लोगों को हमेशा यह जानकारी रहेगी कि किसानों के भेष में दंगाइयों ने लाल किले की इज्जत को तार-तार किया था।

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उदय बुलेटिन
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