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प्रतीकात्मतक तस्वीर 
प्रतीकात्मतक तस्वीर |Social Media
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एशिया की सबसे बड़ी पत्थर मंडी पूरी तरह ठप, आर्थिक नुकसान के साथ-साथ दूसरे सवाल भी जिंदा हैं ?

तालाबंदी के कारण 10 करोड़ रूपये की लागत वाले स्टोन क्रेशर्स की नीलामी की नौबत आ गई है।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

कबरई ,बुंदेलखंड के महोबा जिले का एक छोटा सा कस्बा लेकिन राजस्व और आय का इतना बड़ा स्थान की अकेले पूरे बुंदेलखंड के चार साल का बजट तैयार कर सकता है। यह मामला खनिज का है और खनिज की नजर से बुंदेलखंड पूरे देश की निगाहों पर रहता है, यहां पर दक्षिण भारत से लेकर कोरिया तक के संयुक्त उपक्रम वाली कंपनियां पैसा कूट रही है। अकेले कबरई और उसके आस-पास के क्षेत्र में कुछ दिन पहले तक पत्थर क्रशिंग की मशीनों की संख्या करीब 2.5 हजार थी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से एशिया की सबसे बड़ी पत्थर मंडी में बंदी का आलम है। स्थानीय खनिज यूनियन ने आस-पास की सभी क्रेशर को पूरी तरह बंद कर रखा है ,जिसकी वजह से न सिर्फ उत्तर प्रदेश सरकार को रोजाना करोड़ों के राजस्व से वंचित रहना पड़ रहा है ,बल्कि इस के साथसाथ लाखों कामगारों को रोटी के लाले पड़ रहे है। बिहार, राजस्थान और स्थानीय मजदूरों को बेगारी की स्थिति में पलायन करना पड़ रहा है, करीब 20 हजार की संख्या में ट्रकों और डम्फरों को सड़क किनारे जाम कर के रख दिया गया है।

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इस हड़ताल से न सिर्फ राजस्व का नुकसान हो रहा है बल्कि अब उद्योगपतियों ने उत्तर प्रदेश की नीतियों से खफा होकर मध्य प्रदेश का रुख किया है, और उसका फायदा मध्यप्रदेश की सरकार को सीधा-सीधा मिलने के आसार हैं।

पत्थर व्यापारियों ने इस मामले को लेकर कुछ सवाल उठाए है ?

रॉयल्टी - व्यापारियों के अनुसार बाहर से आने वाले ट्रक कबरई से सिर्फ इस लिए माल नहीं उठाते क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार ने अपनी राजस्व नीति सबसे अलग कर रखी है, जबकि पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश में बिल्कुल इतनी ही मात्रा का पत्थर आधे से कम सरकारी राजस्व में उपलब्ध होता है।

पुलिस की अवैध उगाही - व्यापारियों के अनुसार कबरई थाना पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे महंगा थाना है , थाना महंगे होने की बात पर व्यापारी कुछ भी बताने से बचते नजर आए, और इसी थाने द्वारा ट्रकों से जबरन वसूली की बाते कही, जिसकी वजह से ट्रक मालिक कबरई आने से बचते है।

व्यापारियों की मानें तो और भी अनेक कारण है जिसकी वजह से सरकार की नीतियों का विरोध किया जा रहा है ,लेकिन अगर स्थानीय निवासियों और मजदूरों के नजरिये से इन व्यापारियों का भी दामन साफ नहीं है।

पत्थर नगरी कबरई में शाम के पांच बजते ही अंधेरा छा जाता है , इसका मुख्य कारण है हवा में घुलती हुई महीन पत्थर की डस्ट, जो तमाम रोगों का कारण है, अकेले कबरई में ही हजारों की संख्या में टीबी और दमे के मरीज मिल जाएंगे , जबकि पथरी और अन्य श्वास जनित बीमारियों के लाखों मरीज तिल-तिल कर यहां जीने को मजबूर है।

सरकार ने स्टोन क्रशिंग मालिकों को इस बाबत में हजारों नियम कानून जारी किए लेकिन नतीजा सिफर मजदूरों के लिए कुछ नहीं हुआ। इतने बड़े उद्योग में सुरक्षा मानकों के न होने से दुर्घटनाओं का होना आम बात है, आये दिन कोई वाहन चालक मशीन में गिर कर जान दे देता है , या फिर कोई ऑपरेटर अपनी जान खो देता है जिसका हिसाब न तो सरकार के पास है ना ही इन मालिकों के पास, और थाने के चढ़ावे के कारण भुक्तभोगीयों को चुप करा दिया जाता है, देखना यह है कि योगी सरकार इस विवाद में किस तरह से बीच का रास्ता निकालती है।