उदय बुलेटिन
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Finance Minister Nirmala Sitaraman 
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सबसे बड़ा सवाल: सरकार मंदी का क्या इलाज करेगी ?

आखिर सरकार कब समझेगी कि अगर अमीर और अमीर हो गए और गरीब और गरीब हो गए तो वित्त मंत्रालय के होने का क्या फायदा ?

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

देश अभी देशभक्ति के माहौल से गुजर रहा था , हाल में ही हुई घटनाओं ने इसको चरम पर ला दिया था, जिसमें आजादी का पर्व समेत तमाम कारक थे। लेकिन आहिस्ते-आहिस्ते देश में आर्थिक मंदी ने अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। जिसके देर सबेर परिणाम आने भी शुरू हो चुके है, कहीं ऑटो सेक्टर से हज़ारों युवाओं का रोजगार छीनकर उन्हें बाहर का रास्ता पकड़ाया जा रहा है, तो कभी पारले जी का बिस्किट बिना चाय के ही टूट कर गिर रहा है, और जो कंपनियां कभी अखबार में विज्ञापन देकर युवाओं को रोजगार देती थी, आज उसे नौकरी से बाहर निकालने के पहले विज्ञापन देना पड़ रहा है।

टाटा, मारुति जैसे दिग्गज कंपनियों के घुटने कमजोर हो रहे है, इसके साथ ही जुड़ी हुई तमाम कंपनियों में कोहराम मचा हुआ है , लेकिन अभी तक सरकार की ओर से ऐसा कोई शब्द नहीं फूटा जिससे देश को यह तसल्ली हो कि सरकार कुछ कदम उठा भी रही है या देश के युवाओं को कश्मीर में बसाकर अपना पल्ला झाड़ लेगी।

मामला देश के युवाओं के अस्तित्व से जुड़ा है, देश के तमाम सेक्टर जद्दोजहद के बाद भी इसका हल नहीं निकाल पा रहे है। बुद्धिजीवी वर्ग कभी इसे अफवाह बताकर टालने की बात कह रहा है तो कभी दूसरा वर्ग इसे सरकार की गलत नीतियों के तहत की गई अंधाधुंध कार्यवाहियों का नतीजा बता रहा है, लेकिन असल समस्या क्या हो सकती है इसके बारे में कोई नहीं जानता।

ऑटो सेक्टर को महत्वाकांक्षाओं ने ढेर किया

कहते है परिवर्तन संसार का नियम है, पहले सब जगह डीजल से चलने वाली गाड़ियां थी, फिर लग्जरी वाहन अधिकतर पेट्रोल पर आए उसके बाद सीएनजी, इन सब के आने के बीच एक दौर था जब इस उद्योग को लोगों की चाहत ने ठप से कराया था, लेकिन इतना बड़ा दौर कभी नहीं था। पिछले कुछ दिनों से ऑटो सेक्टर में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स को लेकर एक बहस छिड़ी हुई है, और साथ में ही भारत में नई विदेशी और उन्नत तकनीकी की कारो का आगमन हुआ है ,कुछ लोगों के अनुसार (जो ऑटो इंडस्ट्री में जुड़े हुए है) ये भी एक कारण हो सकता है। हालांकि इस बारे में संबंधित मंत्री (भारत सरकार ) ने कुछ जानकारी पब्लिक डोमेन में डाली है।

चलो ऑटो नहीं लेकिन बिस्किट का क्या ?

लेकिन एक तर्क यह भी आता है कि भले ही ऑटो क्षेत्र को यह कारक प्रभावित कर रहे है, लेकिन पारले जी कौन गीला कर के तोड़ रहा है? कुकीज या कोई और विदेशी बिस्किट, शायद जी नहीं।

पारले ग्रुप के जिम्मेदार अधिकारी ने प्रेस कांफ्रेंस में इसका खुलासा किया कि हमारे बिस्किट सबसे ज्यादा ( कुल उत्पादन का आधे से ज्यादा ) ग्रामीण क्षेत्रों में खपता है, उस बिस्किट ( पारले -जी) 5 रुपये के पैकेट पर ज्यादा जीएसटी की मार पड़ी, सो हमने उसमें बिस्कुटों की संख्या कम करके उसे बाजार तक पहुंचाया, अब इसकी मांग तेजी रफ्तार से कम हो रही है, और हम इसका उत्पादन घाटे पर नहीं कर सकते, मजबूर होकर हमे इसका उत्पादन बंद करना पड़ सकता है, अगर सरकार ने कारगर कदम नहीं उठाये तो, 10,000 से भी ज्यादा उत्पादन कर्माचारी अपने घरों में बैठे नजर आएंगे।

सबसे बड़ा सवाल: सरकार मंदी का क्या इलाज करेगी ?

चलो बिस्किट डूबा सो डूबा लेकिन टेक्सटाइल भी खतरे में है

एक बार देश बिना पारले जी और कार के रह सकता है लेकिन फैशन और कपड़े के बिना रहना असंभव सी बात है। लेकिन हकीकत कुछ और बयां कर रही है, नार्दन इंडिया टेक्सटाइल मिल्स कॉर्पोरेशन के अनुसार वह बेहद भयानक मंदी का सामना कर रही है और लाखों युवाओं का रोजगार खतरे में है। इस बारे में इस समूह ( NITMA) ने एक अंग्रेजी के नामी अखबार में एक बड़ा सा विज्ञापन छपवाया है जो आकार में करीब आधे पेज का है, जिसमें एक चित्र छपवाया गया है और उस चित्र में कंपनी के बंद होने के बाद बाहर आते लोगों का सांकेतिक चित्रण किया गया है, जो वाकई चिंता जनक है।

बैंकिंग भी खतरे में

बैंकों की स्थिति और लोगों के बयान के अनुसार स्थिति तो यही लग रही है कि बैंक भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं है, वो ज्यादा कर्ज देने की स्थिति में नहीं है, और मोटर लोन ,हाउसिंग लोन इत्यादि में तकनीकी बाधाएं उत्पन्न कर रहे है, इस पर सरकार ने अपना एक कदम उठाया है, रेपो दर में कटौती के संकेत दिए है और बैंकों को धन मुहैया कराने के संकेत जारी किए है, और इस बारे में अनुराग ठाकुर ने ट्विटर पर कुछ जानकारी उपलब्ध कराई है, जो कितनी कारगर होगी अनुराग जाने।

कहने का तात्पर्य यह है कि भले ही कुछ अफावह हो या फिर असलियत में आर्थिक मंदी अपना पैर पसार रही हो, सरकार को अपने विचार जनता के साथ साझा करने चाहिए।