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मिशाल: युवाओं ने शहीद बीएसएफ जवान की विधवा पत्नी का झोपड़ा घर में तब्दील कर दिया 

“राजनीति का घिनौना पन इसी तश्वीर के सामने बिखर जाता है, क्योंकि इतना सब होने के बावजूद भी नेता अपनी हरकत से बाज नहीं आते”

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

हमने स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना लिया, शहीदों के गीत गाये, लेकिन ये क्या ? एक वीडियो वायरल हुआ और भारतीय राजनीति और उसके ढकोसलेपन की कलई खुल गयी, फिर क्या था जिस काम के लिए नेताओं को खुद की पीठ थपथपाकर अपना जलवा दिखाना था, उसी मुँह से आड़े तिरछे साहित्यिक शब्द निकालकर बेमन से युवाओं की बड़ाई की, और लग गए उसी ढर्रे पर।

मुझे आज एक विषय की चिंता हो रही है,की आखिर एक सिपाही, सैनिक ,फौजी, और भारत की हर सेना का रक्षक जब दुश्मन की आंखों में आंखे डाल कर गोलियों से संवाद कर रहा होगा, तब उसके जेहन में उसके पीछे परिवार को लेकर क्या खयाल होंगे? यही ना कि मेरे परिवास के लिए उसकी सेना , सरकार और देश है, लेकिन असल में हर बार ऐसा होता नहीं है, इस घटना में देश के युवाओं ने वह किया जो सरकार और उस शहीद सिपाही की सेना बीएसएफ(अर्धसैनिक बल) को करना चाहिए था।

मामला मध्यप्रदेश के मिनी मुम्बई इंदौर का है, इसी के पास पड़ता है बेटमा कस्बा, वही है पीर पिपल्या गांव, गांव कुछ ज्यादा खास तो नहीं है लेकिन गांव के हर बुजुर्ग और युवा की जुबान पर एक नाम चढ़ा है शहीद मोहन सिंह।

मोहन सिंह बीएसएफ के जवान थे , और एक दिन देश के लिए ( हम और आप के खातिर) शहीद हो गए और अपने पीछे छोड़ा गर्भवती पत्नी और तीन साल के बच्चे को, सरकार ने वायदे तो तमाम किये थे , लेकिन समय गुजरा , पत्नी ज्यादा पैरवी नहीं कर पाई( पैरवी का मतलब तो समझ ही गए होंगे, मतलब पैसा सुंघाना) तो कुल मिलाकर जीवन डगमगाता हुआ चला, मुफलिसी और गरीबी में बच्चा पैदा हुआ, दोनों बच्चों को शहीद की मजबूर माँ ने किसी तरह पाला-पोसा, और ऐसे ही 25 सालों तक चलता रहा, मकान के नाम पर एक कच्ची चारदीवारी और उस पर सीमेंट की पुरानी चादरें।

अब वक्त ने करवट ली, मध्यप्रदेश में एक पागलों का समूह है ( पागल इस लिए कहा कि उनका काम ही ऐसा है , पागल शहीदों के लिए लोगों से भीख मांगते है, भला ,कोई देश के शहीदों के लिए ऐसा करता है क्या ?)

नाम है शहीद समरसता टोली, और काम है शहीदों के परिजनों की पहचान करना, उनसे मिलना, उन्हें संतावना देना, और जो भी संभव मदद हो लोगों से मिलकर उसे पूरा कराना , इसी के चलते इसी ग्रुप के सदस्य को बेटमा के शहीद के परिवार की जानकारी मिली, जो बारिस ,गर्मी और सर्दी में जी रहा है, सदस्य ने शहीद की पत्नी राजू बाई से मुलाकात की और अपनी टोली में इस बात को विस्तार से बताया और आखिरकार पिछले साल 2018 में रक्षाबंधन में टोली के सदस्य राजूबाई के घर पहुंच कर उसे बहन मान कर राखी बंधवाई और यह वचन दिया कि हम आपके लिए इस टूटे फूटे छप्पर की जगह एक मकान बनाकर देंगे।

टोली के सदस्यों ने जो बीड़ा उठाया उसे पूरा करने का वक्त था, आखिर टोली के लोग , आमलोगों तक पहुंचे और उनसे मदद मांगी, और लोगों ने दिल खोल कर मदद की, लोगों ने यह धनराशि चेक के माध्यम से दी, और इस साल के रक्षाबंधन के पहले ही टोली के पास ग्यारह लाख रुपये जुटा लिए। फैसला हुआ कि इन रुपयों से पहले 10 लाख रुपये अलग करके एक बढ़िया मकान का निर्माण होगा और बचे एक लाख से शहीद की प्रतिमा बनाई जाएगी, मकान का काम रक्षाबंधन के पहले ही पूरा कर लिया गया।

आखिर कर 2019 का रक्षाबंधन आजादी के दिन ही हो गया, मौका भी था और दस्तूर भी , टोली ने जाकर बनवाये गए मकान की चाभी शहीद की पत्नी राजू बाई को सौंपी , और शहीद के प्रति अपनी श्रद्धा दर्शाई।

मामले में आत्मिक मोड़ तब आया जब टोली के सदस्यों ने शहीद की पत्नी को मकान तक पहुंचाने के लिए अपनी हथेलियों को रास्ते का रूप दे दिया, आखिर शहीद के परिवार को संम्मान मिल ही गया भले ही उसे मिलने में 25 साल लगे हो। खैर किसी ने वीडियो शूट करके सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया , और फिर क्या था, जिसकी उम्मीद थी, राजनैतिक गिद्ध भोज होना था, नेतागण अपनी अपनी पूर्वग्रही शस्त्र शैली में प्रहार करते हुए युवाओं की प्रशंसा करने लगे।

भला एक ने हुंकार मारी थी, दूजे कैसे चुप रहते ? उनका भी फर्ज बनता था, सो उन्होंने भी बहती गंगा में हाथ साफ कर लिया।

दरअसल ये राजनैतिक निशानेबाजी थी, दोनों ने एक दूसरे की तरफ साइलेंट तीर मारे ...... लेकिन असल सवाल दोनों से है कि अब तक आप दोनों कर क्या रहे थे ? सरकारे तो दोनों पार्टियों की थी, लेकिन अब तक ध्यान क्यों नहीं गया ? और अगर आपका ध्यान नहीं गया तो आपको युवाओं को शाबाशी देने का कोई हक नहीं बनता।

खैर शहीद का मकान बन चुका है , राजूबाई अब अपने मकान में है, प्रतिमा बन रही है, और निकट भविष्य में बन जाएगी, लेकिन यह सम्मान न तो उसे सरकार ने दिया और ना ही उसकी सेना ने, कही न कही इन घटनाओं को देखकर लगता है कि शहीद की शहादत बेहद मूर्खतापूर्ण थी, उसने इन गूंगों के लिए जान कुर्बान कर दी, मुझे लगता है शहीद की जान निकलने में भी शहीद को उतनी तकलीफ न हुई होगी जितना उसे अपने परिवार की दशा देखकर हुई होगी।