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खप्टिहा में जनसभा का चित्र 
खप्टिहा में जनसभा का चित्र |Social Media
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सुषमा स्वराज की मृत्यु से बांदा जिले के जसईपुर में मातम पसरा, पूरा गांव शोक की लहर में समाया

सुषमा स्वराज ने बांदा के 28 मछुआरों को पाक जेल से कराया था रिहा ।  

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

सुषमा स्वराज जी देहावसान को लगभग दो दिन से ज्यादा का समय बीत चुका है, और उनके समर्थक समेत अन्य विरोधी व्यक्ति भी उनके असामयिक निधन को लेकर बेहद आहत नजर आए। लेकिन देश की राजधानी से करीब साढ़े छह सौ किलोमीटर दूर बसे गांव में सुषमा जी को लेकर बेहद कष्ट व्याप्त है। सुषमा जी की मृत्यु के बारे में जसईपुर माटा गांव में जिसने भी सुना वह शोकाकुल नजर आया, आलम यह है कुछ घरों में आज तक भी चूल्हा नहीं जलाया गया, सुषमा जी के जाने की बात को ग्रामीण स्वीकार ही नहीं कर पा रहे है।

नेताओं के प्रति भावनात्मक लगाव अक्सर दक्षिण भारत के लोगों में आम बात है लेकिन उत्तर प्रदेश के बाँदा में किसी नेता और पूर्व विदेश मंत्री को लेकर ऐसा जज्बा कई जायज सवाल पैदा करता है।

वक्त था सन 1978 का, बाँदा जिले का तिंदवारी क्षेत्र जो उस समय फतेहपुर -तिंदवारी लोकसभा में शामिल था "एक वक्त पर इसी लोकसभा सीट से भारत के प्रधानमंत्री वीपी सिंह भी चुनाव लड़े थे, और प्रधानमंत्री बनते समय वो यही से सांसद थे।" 1978 में सुषमा स्वराज जी खप्टिहा कला में चुनावी जनसभा को संबोधित करने आई थीं, इस सभा के बाद सुषमा जी का वहां के लोगों से ऐसे आत्मिक संबंध जुड़ा की दशकों तक लोगों से पत्राचार और स्नेह बना रहा।

जनसभा को संबोधित करते समय सुषमा जी का दुर्लभ चित्र

सुषमा जी का इन ग्रामीण लोगों से जुड़ाव केवल चुनाव तक ही सीमित नहीं रहा, 20 मार्च 2014 को गुजरात के मछ्ली पकड़ने वाले नाविक पोरबंदर जिले में आने वाली समुद्री सीमा भूलवश लांघ गए और पाकिस्तानी नौसेना ने उन्हें बंदी बना लिया, इस बार करीब 11 मछुआरे पाकिस्तान की जेलों में ठूंस दिए गए। यह पहली बार नहीं था, बल्कि इस गांव के काफी मात्रा में पेशेवर मछली शिकारी, गुजरात में ठेके मजदूरी करते है, और अक्सर गलती से सीमा का से विमुख हो जाते थे।

लेकिन ग्रामीणों की पुकार सुनकर सुषमा जी ने अथक प्रयास करके 11 मछुआरों समेत अन्य पुराने मछुआरों को जिनकी संख्या 28 थी उन्हें पाकिस्तान की जेलों से मुक्त कराया, वो ग्यारह शिकारी इसी गांव के थे।

इस मामले की जानकारी जब सुषमा जी को हुई तो उन्होंने सब से पहले पीड़ित परिवार को सांत्वना दी और अपने प्रतिनिधि के रूप पर साध्वी निरंजन ज्योति को पीड़ितों के गांव रवाना किया। फौरी तौर पर राहत देने के लिए परिजनों को आर्थिक मदद भी उपलब्ध कराई गई, और परिजनों को भरोसा दिलाया गया कि जल्द से जल्द मछुआरों को रिहा कराकर स्वदेश वापस लाया जाएगा। और हुआ भी यही।

विदेश मंत्री की तत्परता और कर्मठता ने पाकिस्तान को भारतीय मछुआरों को छोड़ने पर विवश कर दिया। कुछ ही दिनों बाद बाँदा जिले के पकड़े गए मछुआरों में से अधिकतर लोग पाकिस्तान की कैद से छूट कर वापस अपने स्वदेश वापस आये हालांकि अभी भी कुछ बाँदा के मछुआरे पाकिस्तान की जेलों में बंद हैं। जिनकी रिहाई की प्रतीक्षा में गांव वालों की आंखे टकटकी लगाए बैठी है।