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अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में कोई कुछ भी बोल सकता है

"संसद में हिंदी को थोपे जाने से हिंदी का स्तर गिर रहा है"

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

भारत में कुछ भी बोलने में एक टर्म प्रयोग किया जाता है "अभिव्यक्ति की आजादी" जिसकी आड़ लेकर कोई कुछ भी बोल सकता है। आप अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर भारत के लोगों, खुद भारत देश को गाली दे सकते हैं। किसी को संसद को खुलकर गरिया सकते हैं।

यही वाकया आज एमडीएमके के राज्यसभा सांसद वायकू ने देश के सामने कहा। वायको यही नहीं रुके उन्होंने अपनी चिरपरिचित भाषा अंग्रेजी में आगे बोलना जारी रखा, वायको ने आगे कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक देश के दक्षिणी हिस्से के लोगों से अंग्रेजी के माध्यम से संवाद करते रहे है, वायको के अनुसार हिंदी का अपना खुद का साहित्य नहीं है। वह निचले स्तर भाषा है ,संसद में यह भाषा शोरशराबे का कारण बनती है। भले ही लोग कानों में इयरफोन लगाकर बाते सुने लेकिन इस शोर शराबे में समझ मे नहीं आता। यहाँ तक कहा कि संस्कृत एक मरी हुई भाषा है।

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वायको वैसे भी दया सीट (राज्य सभा) के माध्यम से सांसद बन कर पहुंचे हैं। ये अपनी भाषा के माध्यम से जनता के बीच कितना पहुंच पाते है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। वैसे वायको तमिल भाषी क्षेत्र से आते हैं अगर उनकी वकालत तमिल भाषा के लिए होती तो सुनकर बेहद अच्छा लगता। लेकिन यह मामला केवल एक भाषा के अपमान करने से था। जिसका अधिकार किसी भी नेता और जबरजस्ती थोपे गए नेता को नहीं है।

हिंदी सिर्फ एक भाषा ही नहीं है बल्कि भारत के प्राण के समान है। यह ही एक मात्र भाषा है जिस में किसी भी भाषा के शब्द को समाहित करने की क्षमता है। यह अनेक क्षेत्रों में थोड़े मोड़े बदलाव के साथ अनेक रूप धारण कर लेती है। उदाहरण के तौर पर, ब्रज, अवधी, मैथली, बुंदेली, राजस्थानी और अनेकानेक रूपों में देखने को मिल जाती है।

लगता है राज्यसभा के सांसद वायको अपने कार्यकाल में यह कभी भी यह नहीं जानपाये की संसद में बहस के दौरान और अपनी बात रखने के लिए किसी भाषा को बोलने की मनाही नहीं है।