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बाँदा समेत समूचे बुंदेलखंड में पानी की भीषण समस्या जिम्मेदार मौन है ?

बुन्देलखंड में सूखे की मार 

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

साफ पेयलज की समस्या आज वैश्विक हो गयी है। कहा तो ये भी जा रहा है कि अगला विश्वयुद्ध केवल पानी के लिए होगा और सही भी है। आज पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है। चेन्नई जैसा महानगर पानी की कमी की वजह से घुटने टेक चुका है। कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की छुट्टी कर दी है और कहा है कि वो घर पर रहकर काम करें। जिस से पानी की आवश्यकता घर से ही पूरी की जाए।

मुंबई भले ही पानी से लबालब भरी हुई हो लेकिन पीने का पानी यहां भी सोने के भाव बिक रहा है।

बुंदेलखंड में ये हालात आज के नहीं है। पाठा का विषम क्षेत्र सदियों से प्यासा है। जिसे सरकारों द्वारा सिर्फ वादे मात्र से बुझाया गया है, पाठा की प्रसिद्ध कहावत है -

“गगरी न फूटे ,खसम मर जाये”
भावार्थ यह है कि पनिहारिन यह कहती है कि मेरी गगरी न फूटे भले ही पति की मौत हो जाये, ये कहावत क्षेत्र की विभीषिका को परिभाषित कर देती है।

यही हालात अब बाँदा के ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में खुलकर सामने आने लगा है। शहरों में पानी की मारामारी ने जनजीवन को अस्त व्यस्त कर दिया है। मटौन्ध थाना अंतर्गत ग्राम लोहरा की ही समस्या को अगर उठा ले तो यहां के सारे नल पानी देने से मना कर चुके हैं। इसके बाद एक मात्र सहारा सप्लाई पानी ही बचता है। लेकिन वह भी विभागीय उदासीनता के कारण करीब 10 दिनों से बंद है। नलकूप ऑपरेटर के मुताबिक ये सरकारी काम है जो कब होगा ये कहा नहीं जा सकता।

ग्रामीणों के अनुसार पाइन के पानी की समस्या इतनी विकट है कि लोग बूंद बूंद पानी को मोहताज है, लेकिन इतने दिनों की समस्या के बाद भी कोई सरकारी अधिकारी ने जनता की सुध नहीं ली। लोगों के हालात इतनी बुरे हैं कि एक डिब्बे पानी के लिए 4-4 घंटे इंतजार करना पड़ रहा है। जबकि अगर सप्लाई नलकूप को सुधार कर चालू करा दिया जाए तो समस्या दूर हो सकती है, लेकिन मामला सरकारी है तो अटका हुआ है।