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किसान छोटेलाल ने की आत्महत्या 
किसान छोटेलाल ने की आत्महत्या |Uday Bulletin
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बुंदेलखंड में बैंक का कर्ज फिर बना किसान का काल, फांसी के फंदे पर लटका किसान

मजबूर किसान, मस्त प्रशासन

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

एक ओर जहां बुंदलेखंड पिछले एक दशक से मौसम के कुचक्र को झेल रहा है वहीं दूसरी तरफ सरकार की नीतियां और बैंकों का रवैया उन्हें मौत के मुंह में धकेलने का काम कर रहा है। आज फिर बाँदा जिले के कमासिन क्षेत्र में बैंक का एक कर्जदार किसान समूचे परिवार को अकेला छोड़कर फांसी के फंदे पर झूल गया। मामला कमासिन थाना क्षेत्र के मुसीवा गांव का है। जहां किसान ने आर्थिक तंगी और बैंक के दबाव में आ कर सूने घर में फांसी लगा ली।

किसान छोटेलाल का घर 
किसान छोटेलाल का घर 
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मुसीवा के किसान छोटेलाल पुत्र गंगाराम के ऊपर इलाहाबाद यूपी ग्रामीण बैंक (बैंक मर्जर के बाद आर्यावर्त बैंक) का 50000 का कर्ज है। एक तो पिछले कई सालों से मौसम की वजह से फसल न होने पर कुछ भी लाभ नहीं हो पा रहा था सो आर्थिक तंगी भी थी। बैंक का कर्ज चुकाना तो दूर घर का छप्पर रखाना और खाने के लाले पड़े थे। परिवार की दुर्गति और बैंक की धमकी से बेहतर छोटेलाल को मौत लगी और सूना घर पाकर किसान ने फांसी लगा ली।

आस-पास के लोगों ने बताया कि किसान कुछ दिनों से बैंकों के नोटिस और धमकियों से परेशान था, उसे कर्ज के तौर पर भी कोई पैसे देने को तैयार नहीं था।

किसान छोटेलाल का घर 
किसान छोटेलाल का घर 
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अधिकारियों ने कहा जांच कराएंगे

इस घटना की जानकारी जब अपर जिलाधिकारी बाँदा संतोष कुमार को लगी तो उन्होंने बड़े ही बेमन से हमें इसके बारे में बताया , अपर जिलाधिकारी ने बताया " हा हमें जानकारी मिली है कि कमसिन थाना क्षेत्र के गांव मुसींवा में एक किसान ने आत्महत्या की है। जब पत्रकारों द्वारा यह पूंछा गया कि उसके ऊपर बैंक के कर्ज का भीषण दबाव था, यह भी आत्महत्या का कारण है तब अधिकारी महोदय जांच कराने की बात कहकर टाल गए।

अपर जिलाधिकारी बाँदा संतोष कुमार
अपर जिलाधिकारी बाँदा संतोष कुमार
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बैंकों का बेहद गैरजिम्मेदाराना रवैया

बाँदा जिले में बैंकों की तानाशाही अपने चरम स्तर पर है। सरकार के निर्देश पर जब समाधान योजना के तहत किसानों और बैंक के बीच समझौता कराया गया है। जिसमें किसानों को डरा-धमका कर या बहला कर पैसे जमा करा लिया गया है। लेकिन आठ-दस माह बीत जाने के बाद भी न तो उन्हें मुक्ति प्रमाणपत्र दिए गए हैं और ना ही उनका पैसा वापस किया जा रहा है। किसान बैंकों के दरवाजे पर बस चक्कर काट रहे हैं।