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तालाब पर काई जैसी घास
तालाब पर काई जैसी घास|Uday Bulletin
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भविष्य की संभावना “डकवीड”, “तालाब” पर काई जैसी घास

भविष्य का भारत कैसे होगा   

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

कुपोषण न सिर्फ भारत की बल्कि समूचे विश्व की एक विषम समस्या है। जिसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत सभी प्रमुख स्वास्थ्य ऑर्गनाइजेशन जद्दोजहद कर रहे है। अकेले भारत मे यह एक आम समस्या है। पोषक तत्वों की कमी, प्रोटीन की अल्पता न सिर्फ शिशुओं को समस्या में डालती है बल्कि गर्भवती एवम कामकाजी महिलाओं को इस समस्या से जूझना पड़ता है। हालांकि सरकारों द्वारा कई प्रोग्राम चलाये जाते है जिनका कितना लाभ लोगों को मिल रहा है ये रिसर्च का विषय है।

लेकिन अभी हाल में ही एक रिसर्च में भारत के वैज्ञानिकों के कान खड़े कर दिए है। जर्मनी मूल के एक वैज्ञानिक क्लाउस आपेनरोट ने इस बाबत एक रिसर्च की जानकारी दुनिया के साथ साझा की है जिसमें भारत ,खासकर उत्तर भारत के तालाबो में कचरा, और फालतू का चारा समझी जाने वाली सूक्ष्म घास मानव के लिए बेहद लाभकारी है।

इस घास के बारे में उन्होंने बताया कि यह घास प्लेग की भांति फैलती है और 24 घंटे के अंदर यह अपना आकार दो गुना तक कर सकती है। अगर आपने कभी गौर किया हो तो गांव देहात के पोखरों और तालाबो को हरी कालीन की तरह ढंका हुआ पाया होगा। दरअसल यही है डकवीड घास।

इसकी सभी प्रजातियों को पूरी दुनिया मे कचरे से सामान माना जाता रहा है। अब जबकि मानव के जीवन के लिए क्षणिक संसाधन खत्म हो चले है या फर खत्म होने की कगार पर है। तब दुनिया अनुसंधान पर अनुसंधान किये जा रही है कि भविष्य के विकल्प क्या होंगे। कही आवोकाडो, कही गोजी बेरी, कही नोनी, और तमाम तरह की चीजों को खोजकर निकाला जा रहा है जिनमें संभावनाएं देखी जा रही है।

तालाब पर काई जैसी घास
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वैज्ञानिक क्लाउस ने डकवीड के बारे में यह बताया कि यह प्रोटीन समेत एमिनो एसिड अन्य आवश्यक तत्वों से न सिर्फ भरा है बल्कि इन्हें लेकर भारतीय परिवेश में लंबे समय तक रखा जा सकता है। यह डकवीड न सिर्फ खाद्य पदार्थो में प्रयोग की जा सकती है बल्कि इसे कई पेय पदार्थों में प्रयोग किया जा सकता है। इस घास की और भी विशेषताएं है जो इसे और बेहतर बनाती है। जैसे तालाब की ऊपर सतह पर चादर तानकर उसे गंदगी से बचाये रखना, आस पास के प्रदूषण को सोखने की अद्भुद क्षमता इसमे शामिल है।

क्लाउस ने जर्मनी की प्रयोगशाला में करीब 500 से भी ज्यादा प्रजातियों की डकवीड संभाल रखी है , ओर इन सभी पर खोज जारी है,यह भी बताया कि इनके औषधीय गुणों का बाहर आना बांकी है, जिनपर रिजल्ट आना बांकी है।

तालाब पर काई जैसी घास
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क्लाउज ने बताया कि भारत इसके लिए बेहद मुफीद जगह है। यह का तापमान इसे दिन दूना रात चौगना बढ़ाता है, जबकि जर्मनी में खुले माहौल में यह जलीय घास मात्र 4 माह ही जिंदा रह सकती है। प्रयोग शाला में इसे जिंदा रखने के लिए बेहद ज्यादा मात्रा में पैसा बर्बाद करना पड़ा है।

क्लाउज ने उसे एक दूसरा नाम भी दिया है "सुपर फ़ूड" जिसकी जरूरत भविष्य में मानवता को पड़ेगी, क्लाउज आपेनरोट भारतीय वैज्ञानिकों के साथ मिलकर काम रहे है जिसपर उन्हें सफलता पर सफलता मिल रही है। भविष्य के भोजन में अगर आपको तालाबी काई, घास खाने को मिले तो मुँह मत सिकोड़ियेगा।