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बाँदा के कालिंजर में ईको फ्रेंडली ब्याह !

ये विवाह 15 जून को हुआ है , और 16 जून को विदाई हुई है

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

हो गए न दंग.......

आज के परिवेश में ईको फ्रेंडली घर, भोजन , और काफी सारी क्रियाएं लेकिन ईको फ्रेंडली शादी व्याह ?जी हां बुंदेलखंड ने आज फिर एक कीर्तमान रचा है , अभी चार दिन पहले की ही तो बात है जब बाँदा का तापमान 50 डिग्री तक पहुँच गया था, और समूचे विश्व के छठवें सबसे गर्म जगह पर कायम हुआ !

लेकिन अब यहां के बाशिंदों ने एक नई पहल शुरू की है, और शुरू भी की तो यहां के सबसे पिछड़े समुदाय के व्यक्ति ने।

बाँदा के कालिंजर में ईको फ्रेंडली ब्याह !

बाँदा जिले के नरैनी ब्लाक में एक जगह है कालिंजर "ये वही कालिंजर है जहां के किले को जीतने के चक्कर मे शेरशाह सूरी जी इस कदर घायल हुए कि बिहार के सासाराम में जाकर अंतिम सांस ली यह शेरशाह सूरी का अंतिम विजय अभियान था, दरअसल ये किला आज भी भौगोलिक दृष्टि से अजेय है" किले की बात बात किसी और दिन करेंगे

यहीं के बाल्मीकि( महादलित) समुदाय की बेटी का बिल्कुल पुरातन पद्यति से हुआ विवाह ( आपको नदिया के पार फ़िल्म का कौन दिशा से लेके चला रे बटोहिया) वाला गीत याद है ना , बिल्कुल वही थीम ,या फिर  ये कहे कि नदिया के पार उत्तर भारत के इस प्रकार के विवाहों से प्रेरित था।

बाँदा के कालिंजर में ईको फ्रेंडली ब्याह !

कालिंजर के बाबू समुद्रे ने बाँदा की पर्यावरण समिति के निर्देश पर अपनी बिटिया रेखा समुद्रे का विवाह गढ़ा गंगा पुरवा निवासी किशन पुत्र कारे लाल मतेल के साथ तय किया, और यह शर्त भी रखी कि यह विवाह पूर्णतया प्रकृति के सानिध्य में ही होगा,

इस समिति के सदस्य महिला प्रधान सुमनलता पटेल और उनके अध्यापक पति ने इस कन्या का कन्या दान किया और विवाह को पूर्णतया प्रकृति को समर्पित किया , बारात आयी तो बैल गाड़ियों में , प्रथम जलपान में मिर्चवान (जिसे आम भाषा मे ठंढाई कहते है जिसके अंदर कालीमिर्च, खरबूजे के बीज, धनिया ,सौफ, कच्ची ऑर्गेनिक शक्कर या गुड़ का मिश्रण होता है, गर्मी में रामबाण है, पुराने विवाहों में हमने भी इसको भयानक तरीके से छका है)

बाँदा के कालिंजर में ईको फ्रेंडली ब्याह !

हांथी द्वार ( स्वागत द्वार) आम ,पीपल, जामुन, ढाक के पत्तो से बनाया गया था, जिसपर देसी तिरपालों ने चार चांद लगाए , बिजली के नाम पर कोई बल्ब भी नही, मंडप को देशी फूलों, गेंदा कनेर से सजाया गया , सारी वैवाहिक रश्में प्रकृति अनुसार की गई, हर्ष फायरिंग जो यहाँ की आन बान और शान है इसको पूरी तरह मना किया गया था, जनवासे पर केवल पेड़, पौधों के पत्तो से सजावट की गई थी, बारातियों के भोजन की व्यवस्था के लिए थर्माकोल के पत्तलों की जगह पुरैनी( कमल के पत्ते/ दोनो के लिए छिउल (ढाक के पत्तो) को प्रयोग किया गया।

बाँदा के कालिंजर में ईको फ्रेंडली ब्याह !

इस कार्यक्रम में सभी ग्रामीणों चाहे वह किसी जाति व धर्म के हो सबने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया, और समाज को प्रकृति के साथ ले जाने का कार्य किया , विदा हुई देशी बैलगाड़ी में और उसके पहले नवविवाहित वरवधू ने एक ऐसी जिम्मेदारी निभाई जिसको सदियो तक याद रखा जाएगा, दोनो ने घराती और बारातियों समेत किला कालिंजर के नीचे पीपल और बरगद के पेड़ रोपे, जो लंबे समय तक मानवता को जीवन देंगे।

बाँदा के कालिंजर में ईको फ्रेंडली ब्याह !

बाल्मीकि समाज के इस घर ने समाज के सभी जाति वर्गों को ऐसा संदेश दिया है जो न सिर्फ खर्च से बचाता है बल्कि भविष्य को भी सुरक्षित करेगा,वर्तमान समाज मे जहाँ आज पैसे की बर्बादी जैसे डीजे, आतिशबाजी, और अनापशनाप खर्चो को स्टेटस सिंबल माना जाता है वही इस जोड़े ने नया मापदंड स्थापित किया है ! इस विवाह में स्थानीय थाना के सभी पुलिस कर्मियों ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया ।

उदय बुलेटिन इस तरह के प्रकृति पूर्ण कार्यक्रम को पूरी तरह से सराहता है!