उदय बुलेटिन
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भारतीय रेल में ‘दुर्घटना’ का मतलब 

रेल मंत्री पियूष गोयल भारतीय रेलवे की काया पलट करने में तत्पर हैं , पर क्या भारतीय रेल भी लोगों के मन में बसे अपनी प्रति विचार को बदलने में तत्पर है ? 

AKANKSHA MISHRA

AKANKSHA MISHRA

भारतीय रेल की स्थापना 16 अप्रैल 1853 में हुए थी , उस दिन से लेकर आज तक भारतीय रेल अपने मूल मंत्र ‘सुरक्षा’, ‘दृढ़ता’ और ‘समयबद्धता’ का पालन करते हुए लोगों की सेवा में अग्रसर है। हमारे देश में 121,407 किमी लम्बी रेललाइन है , और इसे विश्व का चौथा बड़ा रेल नेटवर्क होने का गौरव प्राप्त है ,2.3 करोड़ लोग हर दिन रेलयात्रा करते है ,करीब 1.30 लाख लोग भारतीय रेलवे में कार्यरत हैं। पर क्या भारतीय रेल इतनी बड़ी उपलब्धियों का निर्वाहन करने में सक्षम है ?

सामान उठाता कुली 
सामान उठाता कुली 
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मेरे अनुमान में ‘दुर्घटना’ केवल ‘आपदा’ या ‘विपत्ति’ का नाम नहीं है, लोगों के साथ किये गए अमानवीय व्यवहार को भी ‘दुर्घटना’ कि श्रेणी में रखना चाहिए। ‘आपदा’ या ‘विपत्ति’ में तो कम से कम लोगों के द्वारा सहानुभूति व आर्थिक मदद मिल जाती है, लेकिन अमानवीय व्यवहार ऐसे ‘दुर्घटना’ है जिसमें हमारी अंतरात्मा दुखी होती है और उसे बदले में भी लोगों के द्वारा तिरस्कार ही नसीब में आती है।

भारतीय ट्रेन
भारतीय ट्रेन
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अगर हम बात करें भारतीय रेल के 162 वर्षीय लंबे सफर में हुए भयावह रेल दुर्घटना की तो हमारे पास सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 8 से 10 ऐसी बड़ी ‘दुर्घटना’ दर्ज होगी जिनमें व्यापक जान-माल का नुकसान हुआ हो | भारतीय रेल किसी भी बड़ी या छोटी दुर्घटना से निपटने के लिए दिन प्रतिदिन तैयारी कर रहा है। अपनी टेक्नोलॉजी का विकाश हो या हाई स्पीड रेल का निर्माण, भारतीय रेल आपदाओं से बचने के लिए और आपदा प्रभावित लोगों को राहत देने के क्षेत्र में पुख्ता इंतज़ाम जारी करने में लगा है|

भारतीय ट्रेन
भारतीय ट्रेन
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लेकिन उन दुर्घटनाओं का क्या जो प्रतिदिन हो रही हैं। गरीबों और अमीरों में भेद - भाव, गरीबों के आत्मसम्मान के साथ दोहरा बर्ताव , उन छोटे बच्चों पर क्या बीतती होगी जब कम पैसे के अभाव में उनके माता-पिता को रेल अफसरों द्वारा भला बुरा सुनने को मिलता होगा। उन बच्चों के मन के साथ दुर्घटनायें तो हर दिन हो रही है।

यह घटना उस दिन की है जब मैं पुणे से भोपाल आ रही थी , IRCTC की साइट से मैंने टिकट बुक किया था, किसी कारण वश मेरी टिकट कन्फर्म ना हो सकी , लेकिन मेरा भोपाल जाना बेहद जरुरी था, टिकट कन्फर्म न होनी की स्थिती में मैंने प्लेटफार्म पर उपस्थित टीटी से जानकारी लेकर स्लीपर कोच से यात्रा करने का निश्चय किया। उस यात्रा के दौरान मुझे पता चला की हमारे देश के साथ -साथ हमारे देश की ट्रेनों में भी गरीबों के लिए स्थान नहीं है। ट्रेन तो यात्रियों से भरी थी लेकिन पैसे लेकर लोगों को कन्फर्म सीट दिलाने में अधिकारी मदद कर रहे थे, जिन लोगों के पास पैसे नहीं थे उनके लिए न तो ट्रेन में जगह थी और न ही उन अधिकारीयों के दिलों में जगह थी।एक बार तो लगा उनके हिस्से के पैसे मैं दे दूँ, लेकिन मैं कितने लोगों की मदद कर सकती थी 1 या 2 उससे क्या फर्क पड़ जाता। बदलाव तो तब होता जब लोग पैसे से ज्यादा इंसान को अहमियत देगें। आप सुविधा नहीं दे सकते कोई बात नहीं लेकिन बातें तो अच्छी कर सकते हैं। यात्रियों का समान फेक देना , उन्हें बुरा भला बोलना और अपनी शक्तियों का गलत उपयोग करना भी ‘दुर्घटना’ है।

भारतीय नागरिक होने की हैसियत से मुझे लगता है रेल मंत्रालय को अपने अधिकारीयों की नियुक्ति करते समय मानवता का पाठ भी पढ़ना चाहिए। कभी - कभी दुर्घटनाएं होती नहीं पैदा की जाती हैं।