नवरात्र स्पेशल: माँ काली और परमहंस-भक्त और माँ के बीच की अद्भुत कहानी

मां काली के भक्त रामकृष्ण परमहंस ने अपना पूरा जीवन एक परम भक्त की तरह बिताया। वह मां काली के परम भक्त थे।
नवरात्र स्पेशल: माँ काली और परमहंस-भक्त और माँ के बीच की अद्भुत कहानी
मां काली के भक्त रामकृष्ण परमहंसउदय बुलेटिन

कहते है अगर गुरु की प्रतिष्ठा देखनी है तो उसके शिष्यों पर सरसरी नजर डाल लीजिये और अगर आप रामकृष्ण परमहंस जी पर जानकारी लेना चाहते है तो आपको उनके परम शिष्य विवेकानंद को देखना पड़ेगा, एक बार तो खुद विवेकानंद जी ने कहा था कि मैं गुरुदेव रामकृष्ण परमहँस जी को सिर्फ उतना ही जान पाया हूँ जितना वो बताना चाह रहे थे, उनके और माँ काली के बीच मे क्या माता-पुत्रवत स्नेह है उसको समझने के लिए मेरी क्षमता अल्प मालूम होती है।

रामकृष्ण और माँ काली:

परमहंस जी को जानने वाले हमेशा से यह कहते आये है कि उनके और माँ काली के बीच अद्भुत रिश्ता था, भले ही आधुनिक विज्ञान अपने लाखों तर्क दे लेकिन कुछ चीजें विज्ञान के परे हैं, शायद जिनको समझने के लिए विज्ञान को और मेहनत करनी पड़े, क्योंकि कुछ तर्क ऐसे है जिनको आस्था पर ही छोड़ना ठीक है।

भोग लगाने का किस्सा:

जितने भी लोग स्वामी परमहंस जी को जानते थे वह उनकी एक आदत से बड़े परिचित थे, परमहंस हमेशा एक थाली में भोजन प्रसाद लगाकर जाते तो गर्भगृह से निकलकर आने का वक्त कोई निश्चित नहीं होता, काली मां की प्रतिमा से घंटो बतियाते, सवाल जवाब एकतरफा होते रहते, कई बार बुद्धिजीवियों द्वारा उन्हें मानसिक रोगी या पागल करार दे दिया जाता लेकिन बिना किसी आलोचना की परवाह किये हुए स्वामी जी अपनी धुन में रमे रहते। स्वामी जी की पत्नी शारदा जी भी इससे व्यथित रहती, याद रहे कि यह ऐसा वक्त था जब दुनिया मे आध्यात्म और एकेश्वरवाद का मुद्दा बेहद चरम पर था, लोग आध्यात्म और एकेश्वरवाद पर तो भरोसा करने के लिए राजी थे लेकिन मूर्ति पूजा और भक्ति आडंबरों में गिना जा रहा था।

एक बार का वाकया है स्वामी जी की पत्नी शारदा जी ने भोजन ग्रह में भोजन प्रसाद पकाया और स्वामी जी एक थाली लगाकर गर्भ गृह की ओर निकल गए, चूंकि सनातन से भोजन ग्रहण करने की क्रिया को एकांत में करने की सलाह दी जाती रही है सो स्वामी जी ने पर्दा लगा लिया, जब ज्यादा वक्त गुजरता रहा तो शारदा जी खीज उठी और सोचा कि आखिर देवी जी को भोग लगा रहे है या देवी जी को कहीं से आने में देर हो रही है, शारदा जी चुपके से गर्भ गृह की तरफ बढ़ी और पर्दे का एक कोना उठाया, दृश्य देखकर शारदा जी घिग्घी बंध गयी, चूंकि दृश्य ही ऐसा था।

"शारदा जी ने देखा कि देवी के रौद्र रूपों में से एक माँ काली खुद सजीव होकर स्वामी रामकृष्ण जी के हाथों से भोजन कर रही थी"

ये दृश्य भले ही बेहद स्नेह का था लेकिन शारदा जी इस चमत्कार को देखकर डर गई, जानकारी होने पर स्वामी जी ने शारदा जी को ऐसा कभी न करने की हिदायत दी और माता पुत्र के इस प्रेम पर चर्चा नहीं करने की सलाह दी, इसके बाद से किसी ने उनकी इस भक्ति पर सवाल नहीं उठाये।

टीबी:

विवेकानंद जी और रामकृष्ण परमहंस-स्वामी रामकृष्ण अपने जीवन के अंतिम समय मे थे शरीर व्याधियों और जरावस्था की वजह से क्षीण हो चला था, उसी दौरान स्वामी जी को तपेदिक (टीबी) की बीमारी हो गयी, स्वामी जी ने कोई इलाज नहीं कराया, वक्त से साथ बीमारी बढ़ती गयी, एक वक्त ऐसा आया जब स्वामी जी दिनभर खून की उल्टियां करते रहते, उनके शिष्य उनकी उल्टियां सावधानी पूर्वक उठाकर बाहर फेंकते जाते, एक दिन सेवा का अवसर विवेकानंद जी को मिला, चूंकि विवेकानंद जी स्वामी जी के ज्यादा प्रिय थे, विवेकानंद जी स्वामी जी से खुलकर बोल लेते थे, विवेकानंद जी ने साफ लहजे में कहा

गुरुदेव आप तो माँ काली के प्रिय बेटे है, आपसे बात होती है, वो आपकी बीमारी को दूर क्यों नहीं कर देती, ये एक माँ का बेटे से कैसा प्रेम?

स्वामी विवेकानंद

परमहंस जी ने बेहद सरलता से जवाब दिया "विवेक" ये कर्म भोग है जिसे मुझे ही भोगना है, अभी भोगूं या किसी अगले जन्म में, लेकिन मुझे ही भोगना है, माँ चाहती है कि मेरे बेटे के सारे कष्ट इसी जीवन मे समाप्त हो जाये, लेकिन एक बिंदु है ये मेरी बीमारी मुझ तक ही सीमित है, यह बीमारी संक्रामक है, लेकिन यह बीमारी अन्य किसी को परेशान नही करेगी"

यह भी सत्य है कि स्वामी जी की सेवा करने वाले किसी शिष्य को इस बीमारी ने छुआ तक नहीं। अंत मे स्वामी जी का देहावसान इसी बीमारी के कारण हो गया। माँ और पुत्र के बीच इस अद्भुत रिश्ते की कहानियां भारत भर के घरों में की जाती है

शारदीय नवरात्र के अवसर पर उदय बुलेटिन सभी पाठकों को शुभकामनाएं देता है।

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