Bhagwan Parshuram janmotsav
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अध्यात्म

आज अक्षय तृतीया है, भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव। 

गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने रूपों का बखान करते हुए बताते है कि योद्धाओं में परशुराम मैं ही हूँ।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

जमदग्नि नंदन कैसे बने प्रतिशोधी :

भारतीय पुराणों में परशुराम को बड़ा ही क्रोधी और युद्धकौशल का धनी माना जाता है। वह वैदिक सनातनी सभ्यता के उन सप्त चिरंजीवी लोगों मे से है जिन्हें सदैव जीवित रहने का वरदान प्राप्त है। परशुराम जी का उल्लेख त्रेता से लेकर द्वापर तक बराबर के प्रभाव वाला उल्लेख मिलता है। फिर चाहे वह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का समय हो या श्री कृष्ण के समय का महाभारत, परशुराम वैसे के वैसे ही बताये जाते है। फिर एक तपस्वी ऋषि का पुत्र कैसे बना खतरनाक योद्धा जिसके सामने बड़े-बड़े योद्धा कट कर गिर जाते थे।

इसकी कहानी अतीत से जुड़ी हुई है, दरअसल माहिष्मती का राजा सहस्रबाहु अपने समय का बहुत बड़ा योद्धा और बड़ा पराक्रमी था लेकिन उसकी एक आदत थी कि उसे जो वस्तु पसंद आ जाती तो वह राजा होने के नाते उस पर अधिकार समझता था।

इसीलिए जब सहस्त्र बाहु को यह पता चला कि महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु की पुत्री नंदनी ( गाय) है जो सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती है तो राजा ने पहले तो साम दाम और भेद के बल पर यह मनवांछित फल देने वाली गाय को पाने की कोशिश की लेकिन सफल न होने पर राजा ने इसे राजाज्ञा का उल्लघंन मानते हुए जमदग्नि को दंड देते हुए गाय हथिया ली और उनकी छल पूर्वक हत्या कर दी। इस पर माता जमदग्नि की पत्नी रेणुका ने अपने पुत्र परशुराम से 21 प्रकार से विलाप करके पति की हत्या का बदला लेने के लिए कहा।

चूंकि परशुराम ने सभी युद्ध विद्याएं और ज्ञान भगवान भूत भावन भोलेनाथ से प्राप्त की थी तो माता का वचन पूरा करने के लिए अकेले ही महिष्मति की तरफ निकल गए और सहस्रबाहु की सेना को गाजर मूली की तरह भगवान शिव द्वारा प्रदत्त फरसे से काट डाला। इतना ही नहीं पुराणों में वर्णित है कि आक्रोश में आकर परशुराम ने सहस्रबाहु की हजार भुजाओं को 21 प्रकार से ठीक वैसे ही काटा जैसे कोई लकड़हारा किसी भारी विशाल वट पेड़ को काटता है। यही नही परशुराम ने इतना भीषण युद्ध किया कि युद्धस्थल पर रक्त के कुंड भर दिए जिन्हें कालांतर में रक्त तीर्थ कहा गया। और इस पर भी जब परशुराम का क्रोध नहीं थमा तो सहस्रबाहु के वंशजों ( हैहै वंश) को कालांतर में भी नष्ट करते रहे।

महर्षि कश्यप को पृथ्वी दान कर शांत हुए :

इसके बाद जब भगवान परशुराम ने संसार मे आततायी राजाओं का मान भंग करने के उद्देश्य से अश्वमेध यज्ञ किया तो जनकल्याण हितार्थ महर्षि कश्यप ने उनसे पृथ्वी दान में माग ली और संसार को निर्भय करने का आदेश दिया, भगवान परशुराम ने अपना फरसा समुद्र में फेंका तो फरसा समुद्र में से महेंद्र पर्वत को निकाल लाया और उसके बाद से अपने धनुष और तुरिण को देवराज इंद्र को सौप कर महेंद्र पर्वत पर चले गए।

युद्ध के पुरोधा और अन्याय के विरोधी :

भगवान परशुराम को अन्याय के प्रति तीव्रता से विरोध करने वाला जाना जाता है। उन्होंने हर अन्याय का जमकर विरोध करना ही सिखाया है यही कारण है कि उन्होंने आत्मरक्षा के लिए भारतीय केरल मार्शल आर्ट कलरिपट्टू और उत्तर की शैली वडक्कन कलरी जैसी महान युद्ध कलाओं को जन्मा। इन्ही कलाओं के बल पर परशुराम बिना सेना के भी सभी सेनाओं के लिए काल का मुँह बन जाते थे ।

शिष्य भी हुए महारथी :

ऐसा नहीं कि केवल भगवान परशुराम ही संसार मे प्रशिद्ध हुए है बल्कि उनके शिष्यों ने भी अपना नाम कमाया है। महान योद्धा पितामह भीष्म, महान गुरु द्रोण और महारथी कर्ण भगवान परशु के ही शिष्य थे। लंकाधिपति रावण और सीता जी के पिता महाराज जनक भगवान परशुराम के गुरु भाई थे। यही नहीं विश्वामित्र भी परशुराम के ननिहाल पक्ष के संबंधी थे भगवान परशुराम के पिता जी के नाना जी विश्वामित्र के पिता गाधि ही थे।

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उदय बुलेटिन
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