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अध्यात्म

कितने राम और कितने रावण, सबके अपने-अपने संदर्भ ,और सब उतने ही सत्य हैं

राम रावण से याचक, और रावण राम से “

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

"रामायण सत कोटि अपारा"

गोस्वामी तुलसीदास जी ने  अपने कालजयी ग्रन्थ रचते समय पहले ही डिस्क्लेमर डाल दिया कि सिर्फ मेरा ग्रन्थ ही सही और प्रामाणिक नही है, राम के चरित्र सौ करोड़ से भी ज्यादा हैं, मतलब ,जितने लोग, उतनी आस्था और उतने ही राम, सब के अनुसार सबकी मान्यता सही और प्रमाणिक है, अतः आप किसी के राम के ऊपर उंगली उठाने के अधिकारी नही हैं, आप रावण को किस नजरिये से देखते हैं वो व्यक्ति का बेहद निजी निर्णय है,

वैसे भी राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, मर्यादाओं के अलावा जीवन मे कुछ नहीं, यहाँ तक कि मर्यादा के लिए चक्रवर्ती सम्राट का सिंघासन, राज्य सब तिनके के समान छोड़ दिया, हालकि राम के बारे में उनका चरित्र चित्रण करना कोई बड़ी मेहनत का कार्य नही, क्योकि श्री राम हर मानस में पक्के तौर पर बसे हुए हैं, आज हमारा विषय मूल रूप से रावण है, वही रावण वो विश्रवा और कैकसी का पुत्र था और महर्षि पुलत्स्य का पौत्र अर्थात पोता, मतलब लड़के का लड़का, बड़ा ताकतवर राजा जिसके साम्राज्य के सामने दिग्गज, दिग्पाल, देव, असुर, किन्नर, नाग, ग्रह, सभी करबद्ध स्थिति में आदेश अनुपालन को खड़े रहते, बहिन के साथ हुए अन्याय (रावण की दृष्टि से सूर्पनखा के साथ अन्याय हुआ था) का बदला लेने के लिए जगतजननी सीता का बलपूर्वक अपहरण किया और नारायण के अवतार श्री राम ने रावण को वंश सहित युद्ध में संघार करके समाज के लिए नए मापदंड स्थापित किये, समाज को नई चेतना, प्रत्येक व्यक्ति के लिए विशेष धर्म का निर्धारण करके  एक ऐसा आदर्श स्थापित किया जो युगों-युगों तक लोगों के मानस पटल पर छाया रहेगा,

एक दृष्टांत जो आपको थोड़ा परेशान कर सकता है:

दक्षिण भारत के महान ऋषि और कवि महर्षि कम्बन, या कम्ब, उन्होंने अपने सत्य के अनुसार एक रामचरित  ग्रंथ  की रचना की  जिसका नाम "इरामावतारम्" बेहद रोचक तरीके से क्षेपक कथाओं को वर्णित किया है, इसमे  दशानन रावण की विचित्र मांग का अद्भुत वर्णन किया गया है, जो तर्कों के आधार पर बेहद प्रासंगिक भी लगता है।

वर्णन कुछ इस प्रकार है, इसमे सार तत्व के साथ हल्की-फुल्की व्याख्या भी समम्मलित है:

"रावण वीर और अहंकारी होने के साथ-साथ कुछेक पल के लिए मानवता वादी भी दृष्टिगोचर होता है, रावण ने जब यह सुना कि दशरथ नंदन श्री राम ने अथाह समुद्र पार सेतुबंध की रचना करके लंका तक आने की सबसे बड़ी रुकावट पार कर ली है तब वह बेहद बैचैन हो उठता है, गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी कृति रामचरित मानस में इसे कुछ इस प्रकार वर्णित किया है कि रावण ने जब यह सुना कि वनवासी राम ने समुद्र की बाधा को पुल बनाकर पार कर लिया तो वह अपने दशों सिरों से बोल उठता है।

‘बांध्‍यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस। सत्‍य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस।। ‘’

इस घटना के बाद रावण ने भावी युद्ध की योजना पर और तीव्र गति से कार्य करना शुरू किया , लेकिन इसके पहले एक रोचक घटना रावण के विचित्र जीवन को दर्शाती है, रावण की लंका में महाबली ऋक्षराज जामवंत का आगमन होता है, यहाँ जामवंत को महाबली कहने का आशय निरर्थक नही बल्कि बिल्कुल सीधा है एक तो जामवंत आकर और बल में बिल्कुल कुम्भकर्ण के आस पास के लगते है, बल के बारे में जामवंत सभी वानर टोली को अपनी युवावस्था के बारे में बताते है "

जरठ भयउँ अब कहइ रिछेसा। नहिं तन रहा प्रथम बल लेसा।। जबहिं त्रिबिक्रम भए खरारी। तब मैं तरुन रहेउँ बल भारी।।
बलि बाँधत प्रभु बाढेउ सो तनु बरनि न जाई। उभय धरी महँ दीन्ही सात प्रदच्छिन धाइ।।

भाव के अनुसार :

जब मैं अपनी युवावस्था में था तब अत्यधिक बलशाली रहा, अब जरावस्था में उतना बल नही है, जब भगवान नारायण ने राजा बलि के साम्राज्य को तीन पगो में मापने हेतु वामन अवतार लिया तब मैं तरुणावस्था में था, और जब भगवान वामन पूरे ब्रम्हांड को अपने कदमो से नाप रहे थे, तो उभय घड़ी ( दो समय मानकों के बीच मे आने वाला अंतराल समय) मे ही भगवान वामन की सात परिक्रमा दौड़ कर पूरी कर चुका था।

वही जामवंत राम रावण युद्ध से पहले लंका पहुचे, हालांकि सभी लंका वासी हनुमानजी का कारनामा पहले ही देख चुके थे, सो उसका सीधा-सीधा लाभ जामवंत जी को हुआ, लंका के निवासियों ने अकारण बुलाई आपदा से बचने के लिए  जामवंत जी को रावण की सभा का बिना पूछे ही रास्ता बताया, जामवंत जी सहज भाव से सभा मे पहुंचे और रावण को अपना संदेश देने से पहले ही रावण ने उन्हें आसन लेने का आग्रह किया, हालांकि जामवंत जी रावण के द्वारा हनुमानजी के प्रति किये गए व्यवहार से परिचित थे, सो उन्होंने ऐसी कोई अपेक्षा ही नही की और रावण के आग्रह करने पर भी उचित आसान स्वीकार नही किया, तब रावण ने उचित राजनीति का उदाहरण दिया और जामवंत से कहा कि" आप हमारे पितामह पुलस्त्य के मित्र और मानसिक भाई है, अतः आप को आसन स्वीकार करना होगा, तभी मैं आपकी उस बात पर विचार करूँगा जिसके लिए आप आये है,

जामवंत ने भी एक निवेदन कर्ता  के कर्तव्य को समझते हुए आसन स्वीकार किया , तब जामवंत ने रावण से एक विषय सुनाया की "हे दशानन , दशरथ नंदन श्री राम ने सागर तट पर भगवान शिव की पूजा अर्चना का प्रण लिया है, और पूजा हेतु योग्य आचार्य की आवश्यकता है, चूंकि यजमान के अनुसार आचार्य भी उसी श्रेणी का होना चाहिए और मुझ पर आचार्य खोजने की जिम्मेदारी है, मुझे वर्तमान समय मे केवल आप ही योग्य कर्मकांडी आचार्य श्रेष्ठ नजर आते है, अतः आप इस आचार्यत्व को ग्रहण करे, और पूजन को सफल बनायें।

रावण ने जामवंत से सरल सा प्रश्न किया कि भूतभावन की इस आराधना का अभिप्राय कही लंका विजय तो नही, जामवंत ने भी सजह भाव से उत्तर दिया बिल्कुल लंकेश, ऐसा ही है, श्रीराम को भोलेनाथ अत्यंत प्रिय है, और लंका सेतुबंध पूर्ण होने तथा, लंका पर विजय प्राप्ति हेतु इस अर्चन का आयोजन हो रहा है, जिसमे आपको यह पद सुशोभित करना है।

रावण ने मन मे विचार किया कि राम मेरे यजमान होने की सारी पात्रताओं पर खरे उतरते है, फिर साक्षात ईश्वर का आचार्य होना कही न कही, खुद की श्रेष्ठता सिद्ध करेगा, रावण ने मनन किया कि महर्षि वशिष्ठ ने स्वयं इस शर्त पर रघुकुल का पुरोहित होना स्वीकार किया जब ब्रम्हा जी ने यह आश्वासन दिया कि इसी कुल में स्वंय नारायण अवतरित होंगे, अतः रावण ने बिना कोई देरी लगाए , इस आमंत्रण को स्वीकार किया और आगे की प्रक्रिया के बारे में प्रबंध कराए, चूँकि रावण ने जामवंत को सभी आवश्यक सामग्री और विषय वस्तु को जुटाने का आग्रह तो कर दिया था, लेकिन फिर भी यह प्रथा है कि अगर यजमान सभी कार्य करने में सक्षम न हो तो  पुरोहित का यह कर्तव्य है कि वह यजमान के निमित्त तैयारी करें, सो रावण इसी कार्यसिद्धि के लिए अशोक वाटिका पहुच कर प्रयास में लग गया।

शिव आराधना का दिन था और लंकाधिपति रावण समयानुसार पुष्पक विमान से सागर पार पहुचा, वहां भाई विभीषण और वानरराज सुग्रीव की उपेक्षा होने के बाद भी श्री राम और सभी वानरों ने रावण को सम्मान देकर आचार्य की भांति सत्कार और प्रणाम किया , रावण ने भी आचार्यत्व को ग्रहण करके लक्ष्यपूर्ति हेतु आशीर्वचन कहे "दीर्घायु भव:, लंका विजयी भव:"

इस वचन को सुनने के बाद सभी भौचक्के थे, और रावण के अगले शब्द को सुनने के लिए आतुर थे, रावण ने श्री राम से कहा कि "हे राम , विवाहित व्यक्ति के धर्मानुसार , कोई धार्मिक कार्य करते हुए अर्धांगिनी अथवा अर्ध यजमान का होना अति आवश्यक है, तो आपकी पत्नी पूजा स्थल पर होनी चाहिए, श्री राम ने  विनम्र भाव से कहा  आचार्य , अगर यजमान यह  प्रबंध न कर सके, तो क्या इसका कोई विकल्प  है, रावण ने वेदांगों का उदाहरण देकर समझाया कि राम ऐसा तभी संभव है जब पत्नी जीवित न हो ,या कोई अविवाहित हो, या सन्यास ले लिया हो,श्री राम ने जब इस पर असमर्थता जताई, तब रावण ने पुष्पक विमान में बैठी जगतजननी सीता को आदेश दिया कि आप आकर राम के वामांग में बैठे,  चूंकि रावण इस बात के लिए आश्वस्त था कि यह समस्या आएगी।

खैर लिंग थापकर श्री राम ने विधिवत पूजा की और जब दक्षिणा देने का समय आया तब श्री राम ने रावण से दक्षिणा के बारे में पूंछा, रावण ने कहा " हे राम, क्या सुवर्ण मंडित लंका के अधिपति के लिए दक्षिणा कोई मुद्रा या संपत्ति हो सकती है ?

फिर भी श्री राम ने कहा आचार्य  मैं दशरथ नंदन राम यह वचन देता हूँ कि आप जो भी दक्षिणास्वरूप मांगेंगे, मैं उसे संभव करूंगा !

रावण ने तब याचक और आचार्य की मिश्रित भावना से कहा कि " जब मैं इस संसार से प्रयाण करूँ तब आप मेरे सामने रहे" और ऐसा हुआ भी,श्री राम ने रावण का वध करने के उपरांत अपने भाई लक्ष्मण को राजनीति, वेद, और तत्वज्ञान की शिक्षा दिलाई, और महा अहंकारी दशाशन रावण इस प्रकार से सद्गति को प्राप्त हुआ, रावण के लंका जाते समय सीता पुनः उसी विमान में बैठकर लंका पहुच गयी और अशोक वाटिका में रही।

हालांकि इस प्रसंग को सुनाने का आशय यह कभी नहीं है कि हमारे द्वारा रावण का महिमामंडन करने का प्रयास किया जा रहा है, बल्कि इस कथा का एक सकारात्मक पक्ष दिखाने की कोशिश की जा रही है कि अगर आपमे योग्यता है, और आप पर दायित्व को निभाने की बारी आती है तो उसे बिना किसी पूर्वाग्रह से पूरा करे, हालांकि यह भी सत्य है कि रावण कितना बड़ा भी ज्ञानी रहा हो, उसके कलुषित कार्यो ने उसके पूरे जीवन को मिट्टी में मिला दिया, और समूल नाश हुआ, लेकिन फिर भी एक गौर करने वाली बात है कि रावण आततायी, अहंकारी, और आतंक का पर्याय होने के बावजूद कुछ गुणों का अधिकारी था, जिसके बारे में स्वयं श्री राम ने उल्लेखित किया है।