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प्रसन्नता का अवसर होना न होना यह महत्वपूर्ण नहीं है, प्रसन्नता का अनुभव करना ही महत्त्वपूर्ण है

जो व्यक्ति जितना अधिक प्रसन्नता का अनुभव करता है, उसके आगामी जीवन में उतनी अधिक प्रसन्न्ता आने की संभावना हो जाती है

प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री

प्रो. ज्ञानप्रकाश शास्त्री

प्रसन्नता का अवसर होना न होना यह महत्वपूर्ण नहीं है, प्रसन्नता का अनुभव करना ही महत्त्वपूर्ण है। मन में यह सामर्थ्य है कि वह सुख को भी दुःख में परिणत कर लेता है, जब यह कार्य वह सफलतापूर्वक कर सकता है, तब वह प्रसन्नता का अनुभव क्यों नहीं कर सकता। आवश्यकता इस बात की है कि हम प्रसन्नता का अनुभव करें। अपने स्वभाव में इस प्रकार का परिवर्तन करें कि बिना बात के भी हमें प्रसन्नता का अनुभव हो।

जो व्यक्ति जितना अधिक प्रसन्नता का अनुभव करता है, उसके आगामी जीवन में उतनी अधिक प्रसन्न्ता आने की संभावना हो जाती है। दुख का रोना रोने वाले के जीवन में दुख अधिक आते हैं और सुख का गीत गाने वाले के जीवन में सुख के क्षण दौड़े चले आते हैं। जिसको हम जितना अधिक याद करते हैं, वह हमारे जीवन का उतना अधिक महत्वपूर्ण भाग हो जाता है।

जो व्यक्ति प्रसन्नता का अनुभव नहीं करता, उसकी प्रसन्नता अनुभव करने की सामर्थ्य कुंद हो जाती है, जीवन में उदासी के घटाटोप बादल घिर जाते हैं और फिर उसमें से होकर कभी आनन्द का प्रकाश बाहर नहीं आता है। जो व्यक्ति जीवन में प्रसन्नता का अनुभव नहीं करता, यह समझ लेना चाहिए कि वह उदास रहने का अभ्यास कर रहा है। उदास रहने वाला एक दिन उदासीन हो जाता है और फिर उसके जीवन में रस नहीं रहता।

उदास होने का मतलब है कि जो न स्त्री बनना चाहता है न पुरुष, जो इन दोनों स्थितियों को अस्वीकार कर देता है, उसे तीसरी स्थिति की प्राप्ति होती है। उदास होने की परिणति किन्नर के रूप में सामने आती है। संसार के इतिहास पर दृष्टिपात करने से विदित होता है कि किन्नर ने न कभी चेतना की उच्च स्थिति को प्राप्त किया है और न भौतिक सुखों के शिखर पर ही पहुँचा है।

जो व्यक्ति को बिना किसी काम के शांत होकर अकेला नहीं बैठ सकता, समझ लेना चाहिए कि वह व्यक्ति उदास है। उदासी से बाहर आने का उपाय प्रसन्नता का अनुभव है, जो जितना अधिक प्रसन्नता का अनुभव करता है, वह परमात्मा के उतना अधिक निकट होता है। परमात्मा रसरूप है और उसका आनंद किसी अन्य पर निर्भर नहीं है।

जिससे लोक में गंभीर और व्यक्तित्व कहा जाता है, वह और कुछ नहीं उदासी का ही दूसरा नाम है। समझदार माने जाने वाले लोगों ने उदासी को महिमामंडित करने के लिए उसे गम्भीर नाम दे दिया है।

संसार के रस का निषेध जिस-जिस विधि से होता है, उसे गम्भीर कह दिया गया है और शास्त्र से अनुमोदित इस प्रकार का उपाय ब्रह्मचर्य है। कृत्रिम ब्रह्मचर्य को धारण करने वाला व्यक्ति उदास हो जाता है और उसके जीवन से जीवन्तता का लोप हो जाता है।