sushmita sinha uses teej vrat book as toilet paper
sushmita sinha uses teej vrat book as toilet paper|Social Media
वायरल बुलेटिन

सुष्मिता ने हिंदू देवी-देवताओं को अपमानित किया, कहा तीज व्रत है नारी विरोधी

सुष्मिता सिन्हा नाम की महिला पत्रकार ने हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहार तीज पर पढ़ी जाने वाली पुस्तक को टॉयलेट पेपर की तरह प्रयोग करने का मशविरा दिया है

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

एक न्यूज़ पोर्टल हैं "बोलता हिंदुस्तान" जिसका मालिक हैं मोहम्मद रहमान, इस न्यूज़ पोर्टल में काम करने वाली एक महिला पत्रकार ने हिंदू धर्म को अपमानित किया है। मोहम्मद रहमान का "बोलता हिंदुस्तान" न्यूज़ पोर्टल अपने पत्रकारों को हिंदू देवी देवताओं को अपमानित करने का पैसा देता है शायद।

बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा ने सुष्मिता का वीडियो ट्वीट करके अपनी आपत्ति दर्ज कराई है।

फिर खड़ा हुआ बवाल:

प्रयागराज की हीर खान के बाद अब नया बवाल सुष्मिता सिन्हा के वीडियो से खड़ा हो गया है। दरअसल बीते दिन सुष्मिता ने हरितालिका तीज के व्रत को लेकर अपना मंतव्य जारी किया। वायरल वीडियो में सुष्मिता यह कहती हुई नजर आ रही है कि इस त्योहार को महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए लंबे वक्त से करती चली आ रही है जबकि आज की दुनिया मे इन सभी चीज़ों का कोई औचित्य निकलकर सामने नहीं आता। मुझे लगता है कि अब यह कुछ पैसों की तीज कथा की किताब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती बल्कि मैं इसका कैसे उपयोग करूँ जानना चाहती हूँ, टॉयलेट पेपर के तौर पर या टिशू पेपर की तरह। इसके बाद सुष्मिता के व्हाट्सएप स्टेटस में वही किताब किसी टॉयलेट पेपर के साथ रखी हुई नजर आती है।

अरुण यादव नाम के भाजपा नेता ने भी इस वीडियो को अपने ट्विटर हैंडल से डाला है:

सुष्मिता की सफाई:

जैसे ही यह मामला वायरल हुआ और सोशल मीडिया पर सुष्मिता के खिलाफ कैंपेन चलने शुरू हुआ तो सुष्मिता बगले झांकने लगी और खुद के बचाव की मुद्रा में नारी विरोधी व्रत और कथा का तीर चलाना शुरू किया। वायरल वीडियो के जवाब ने सुष्मिता ने कहा कि मेरे वीडियो के कुछ हिस्से को काटकर पब्लिश किया गया है और मुझ पर निशाना लगाया जा रहा है। जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। दूसरे पोस्टेड वीडियो में सुष्मिता ने बताया कि किताब में किस तरह व्रत न करने वाली महिलाओं को नरक की यातना सहनी पड़ती है इसके बारे में बताया गया है ओर महिलाओं को किस-किस प्रकार के जन्म मिलेंगे जिसके बारे में बड़ी चर्चा की गई है।

इस ट्वीट में सुष्मिता ने अपनी बात कहने की कोशिश की है:

आखिर मिलता क्या है:

भारत मे धर्म हमेशा से संवेदनशील मामला रहा है, बुद्धिजीवी वर्ग को जब भी लगता है अगर किसी पूजा शैली में कोई बात ठीक नहीं है तो उसे बिना छेड़े छोड़ना ही बेहतर है लेकिन कुछ लोग खुद को लाइम लाइट में बनाये रखने के लिए किसी भी स्तर तक गुजर जाते है ऐसा ही कुछ सुष्मिता के साथ हुआ है। जिस मामले में अपनी सहमति नहीं है उसे कहने और बताने से मतलब क्या। व्रत गलत लगता है तो मत कीजिये, पता नही किस प्रकाशन ने यह पुस्तक छापी, किसने कथा लिख दी ये भी पता नहीं लेकिन लोग शिव पार्वती और गणपति के चित्रों से युक्त पुस्तक को टॉयलेट में टांगने को लेकर भड़केंगे यह तय है। उस वक्त आप अपने सेंटिमेंट को लेकर एक्सक्यूज नहीं दे सकते।

अगर हरितालिका तीज की पुस्तक के बारे में कथा का सवाल है तो यह व्रत सबसे ज्यादा कुँवारियों के लिए है दरअसल माता गिरिजा ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर व्रत का संकल्प लिया था और भगवान शिव इसी रात्रि में पार्वती से प्रसन्न होकर प्रकट हुए थे और खुद को उनके पति रूप में लेने के लिए बाध्य हुए थे। इस व्रत में यही मान्यता है कि कन्याएं अपना सुयोग्य पति प्राप्त कर सकती है लेकिन अब यह किताब किसने लिख दी और कथा में इस तरह के दृष्टांतो को किसने लिखा ये अज्ञात है।

वास्तविक कथा यह है जो भक्ति भारत नामक वेबसाइट से ली गयी है :

देवी पार्वती ने अपने पूर्व जन्म में भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए हिमालय पर गंगा के तट पर अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया। इस दौरान उन्होंने अन्न का सेवन नहीं किया। काफी समय सूखे पत्ते चबाकर काटी और फिर कई वर्षों तक उन्होंने केवल हवा पीकर ही जीवन व्यतीत किया। माता पार्वती की यह स्थिति देखकर उनके पिता अत्यंत दुखी थे।

इसी दौरान एक दिन महर्षि नारद भगवान विष्णु की ओर से पार्वती जी के विवाह का प्रस्ताव लेकर माँ पार्वती के पिता के पास पहुंचे जिसे उन्होंने सहर्ष ही स्वीकार कर लिया। पिता ने जब माँ पार्वती को उनके विवाह की बात बतलाई तो वे बहुत दुखी हो गईं और जोर-जोर से विलाप करने लगीं।

फिर एक सखी के पूछने पर माता ने उसे बताया कि वे यह कठोर व्रत भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कर रही हैं, जबकि उनके पिता उनका विवाह विष्णु से कराना चाहते हैं। तब सहेली की सलाह पर माता पार्वती घने वन में चली गईं और वहां एक गुफा में जाकर भगवान शिव की आराधना में लीन हो गईं। माँ पार्वती की इस तपस्विनी रूप को नवरात्रि के दौरान माता शैलपुत्री के नाम से पूजा जाता है।

भाद्रपद तृतीया शुक्ल के दिन हस्त नक्षत्र को माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया और भोलेनाथ की स्तुति में लीन होकर रात्रि जागरण किया। तब माता के इस कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इच्छानुसार उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया।

मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएँ विधि-विधानपूर्वक और पूर्ण निष्ठा से इस व्रत को करती हैं, वे अपने मन के अनुरूप पति को प्राप्त करती हैं। साथ ही यह पर्व दांपत्य जीवन में खुशी बरकरार रखने के उद्देश्य से भी मनाया जाता है।

हमें नहीं लगता कि इस कथा से किसी के सेंटीमेंट खराब होने चाहिए।

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उदय बुलेटिन
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