उदय बुलेटिन
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Indian Medicare System 
Indian Medicare System |Uday Bulletin
लाइफस्टाइल

भारत मे इलाज कराना बेहद जोखिम भरा काम है ! 

आम जनता के लिए सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं, और प्राइवेट के लिए पैसे नहीं।

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

कभी-कभी मरीज के गले मे अटकी हुई जान सरकारी अस्पतालों की व्यवस्था और प्राइवेट अस्पतालों के बिल को देखकर निकल जाती है,सरकारी अस्पताल सिर्फ वो जगह है जहाँ से बड़े और मोटे कमीशन के वास्ते मरीजो को प्राइवेट अस्पतालों के दर्शन जबरजस्ती कराए जाते है, जबकि प्राइवेट अस्पतालों का सिर्फ एक मोटो है, किसी भी हालत में पैसा लूटना है।

इंसान का जीवन बेहद मुश्किलों से भरा हुआ है, इसमें ज्यादा कसर आजकल की होने वाली बीमारियों ने पूरी कर रखी है, बरसात के आते और जाते मौसमी बीमारियां अपने चरम पर होती है, जिस से समाज का एक बड़ा वर्ग, जानकारी और सुविधाओं के आभाव में इन बीमारियों के शिकंजे में होता है।

बाकी का काम अस्पतालों के हांथो में होता है जहाँ कुछ बीमारियों में केवल मुख्य जीवन रक्षक दवाएं जैसे कि पैरासिटामोल (जो 5 रुपये से कम मूल्य में भी उपलब्ध है) उसी टेबलेट के लिए 200-400 रुपये वसूल कर मरीज को तब तक निचोड़ा जाता है, जब तक वह दिवालिया होने की स्थिति तक न पहुंच जाए।

सरकारी अस्पताल अपने बेहद पुराने ढर्रे पर चलने को आमादा है,सरकार भले ही अस्पतालों को तमाम दवाएं मुहैया कराने के बात का डंका पीटे लेकिन डॉ प्रिस्क्रिप्शन में केवल पैरासिटामोल और अन्य बेटनिसोल जैसे सर्वप्रचलित दवाओं के अलावा कुछ नही लिख पाते, अन्य दवाएं जो लिखी जाती है वो मूलतः बाहर से लेने के लिए लिखी होती है, जो केवल और केवल चिकित्सक की जेब को ऊंचा करने में सहायक होती है।

पैथालॉजी का जिन्न, एक बार जो कब्जे में ले ले, तो आपका खून चूस लेगा :

एक सबसे ज्यादा होने वाला टेस्ट है सीबीसी , जिसमे खून में सम्मिलित रक्त कणिकाओं की संख्या की जानकारी ली जाती है, बेहद सिंपल से टेस्ट होता है, जिसकी जांच लागत समेत सभी खर्च मिलाकर प्रति जांच 40रुपये ( मुनाफा समेत) होती है , लेकिन देशभर में यह जांच 150 रुपये से लेकर 500 तक जाती है, और यहीं से शुरू होता है बेहद घिनौना खेल, दरअसल इसी पैसो में एक सोचा समझा सिंडिकेट इस पैसे को घुमाफिरा कर डॉक्टर तक पहुंचाता रहता है, इसी तरह हजार तरह की जांचे है जिसके द्वारा लोगो को तगड़े तरीके से लूटा जाता है, और मजेदार बात तो यह है कि कुछ ऐसे टेस्ट भी चिकित्सकों द्वारा कराए जाते है जिनका मेडिकल की दुनिया मे कोई वजूद ही नही है।

दवाएं और मेडिकल स्टोर :

आप परीक्षण कीजिये एक जेनरिक अमोक्सीसीलिन टेबलेट/कैप्सूल जिसकी कीमत 35 रुपये ( 10 संख्या) है और उसकी दवा बिल्कुल वही कंपोजिशन को किसी ब्रांडेड निर्माता की दवा से तुलना कीजिये, आप को शायद सदमा लग सकता है क्योंकि आपको मूल्य पर 10 गुने से लेकर 20 गुने तक अंतर देखने को मिल सकता है, अब असल सवाल यह होता है कि जब दवाएं बिल्कुल एक जैसी है असर एक जैसा है तो इनमें इतना अंतर क्यो ?
अंतर है , और बेहद सीधा अंतर है , क्योंकि ब्रांडेड कंपनी की दवाओं का एक बड़ा हिस्सा इन्ही चिकित्सकों, प्रमोटरों, सेल्स के महानुभावों के कमीशन और ऐशोआराम में खर्च किया  जाता है, कभी थाईलैंड ,बैंकाक के टूर सिर्फ आम आदमी के पैसों पर बनाये जाते है।

सरकारी नीतियां बिल्कुल सफेद हांथी है :

कहने को तो सरकार के पास नियम कानूनों का ढेर  है लेकिन क्या ये कारगर है ? एक सरकारी चिकित्सक प्राइवेट प्रेक्टिस कैसे  कर सकता है, लेकिन उसका भी तोड़ है, एक एमबीबीएस डॉक्टर अपने आगे एक कामचलाऊ बीएएमएस डॉ को बैठा कर अपनी दुकान बिना किसी हिचक के चलाता है, जिसका परिणाम है कि बड़े-बड़े मेडिकल कालेजों में पदस्थ डॉ घर पर अपनी दुकान को धड़ल्ले से चलाते मिल जाएंगे, इसका एक फायदा और है कि उन्हें अपने मरीजो को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराने की सुविधा भी मिल जाती है, मरीज यह सोचकर खुश हो जाता है कि थोड़ा राहत तो मिली, लेकिन सरकारी नियमों का असल पोस्टमार्टम यहीं होता है।

कैसे होगा सुधार ? :

कोई निश्चित तारीख किसी के द्वारा नही बताई जा सकती, हम किस गियर में आते है, जब आजादी के इतने सालों बाद यह पवित्र करप्शन आजतक जिंदा है तो एकाध सदी बाद इसके ठीक होने की उम्मीद की जा सकती है ,लेकिन इसके लिए कड़ी इच्छाशक्ति की जरूरत होगी, धरनों, और प्रोटेस्ट से  डरना नही होगा, कड़े नियम बनाये ,जो सरकारी डॉक्टर महोदय निजी प्राइवेट प्रेक्टिस करते हुए नजर आए , सेवा समाप्त और जेल यही विकल्प होने चाहिए, बाकी सरकार तो है ही।

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