मास्साब: यह महज फ़िल्म कैटेगरी में सीमित नही है, फ़िल्म के अलावा भी बहुत कुछ है इसमें

मास्साब फिल्म ने देश के सरकारी शिक्षा तंत्र की पोल खोलने का काम किया है यह फिल्म लोगों का मनोरंजन करने के साथ-साथ जागरूक करने का भी काम कर रही है
मास्साब: यह महज फ़िल्म कैटेगरी में सीमित नही है, फ़िल्म के अलावा भी बहुत कुछ है इसमें
मास्साब फिल्म ने देश के सरकारी शिक्षा तंत्र की पोल खोलने का काम किया हैGoogle Image

एक वक्त था जब सिनेमा जगत में ऐसी फिल्मों का बोलबाला था जैसे कि "सत्यकाम" जिसका नायक अपने आदर्शों पर न सिर्फ चलना जानता है बल्कि उसे अपने जीवन मे इस कदर उभारता है कि उसके विरोधी भी उसके कायल हो जाये। खैर मास्साब फ़िल्म भी कुछ इसी तरह की फिल्मों की श्रेणी में है। दरअसल अब मेनस्ट्रीम सिनेमा में नैतिकता जैसा कुछ शायद बचा ही नही लेकिन मास्साब कुछ ऐसा ही करने का प्रयास करती है।

कहानी और मोटिव:

अगर आज के सिनेमा की बाते करें तो सिनेमा मात्र पैसे कमाने का उपक्रम बन चुका है। हालांकि इसमें कोई गलत बात भी नही है चूंकि फिल्में होती भी पैसे कमाने के लिए है लेकिन अगर कोई पैसे कमाते-कमाते समाज को सरकारी शिक्षा तंत्र की सीख दी जाए तो इससे बेहतर क्या होगा? ऐसी ही असल कहानी बुनती हुई फ़िल्म मास्साब आपके दिलो दिमाग पर हावी हो जाती है।

कहानी की शुरुआत होती है, विन्ध्यपर्वत श्रंखला के आखिरी छोर में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा के महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर बसे जिले बाँदा के एक बड़े गांव खुरहंड के स्कूल में (आपको बताते चलें कि शिवा सूर्यवंशी का जन्म असल मे बाँदा जिले के खुरहंड गांव में हुआ है)

जहां पर सरकारी पेंट से रंगे प्राइमरी स्कूल में। वैसे भी सरकारी स्कूल की स्थिति क्या होती है इसके बारे में वही व्यक्ति बेहतर जान सकता है जिसने इन स्कूलों में पाटी बोरके को हाँथ लगाया हो या सुख-सुख पट्टी वाले अनाम काव्य को गाया हो। कुल मिलाकर सरकारी स्कूल है, स्कूल में बहन जी स्वेटर बुनने आती है और गुरुजी अपने मोबाइल के प्रोसेसर की स्पीड टेस्ट करने। खैर जैसे गुरुजी वैसे विद्यार्थी, विद्यार्थी भी सरकार प्रदत्त भोज्य पदार्थों का रसास्वादन करके डायनासोर जैसे विलुप्त हो जाते है और यह सब बेहद लंबे अर्से से चला आ रहा होता है। ऐसे वक्त में अजब सरकारी तंत्र में फिट न होने वाला मास्टर पता नही कहाँ से प्रकट होता है जिसका नाम है आशीष कुमार (सरकारी तंत्र में फिट न होने वाले वाक्य का मतलब ठीक यही है कि आशीष कुमार में वैसे कोई लक्षण नही है जो किसी सरकारी मास्टर साहब में पाए जाते है) तो ये नये मास्टर अपनी अलग परिभाषा के साथ आते है। जिद्दी है जुनूनी है और अपने कर्तव्य निर्वहन में किसी भी हद तक पहुँच जाने के लिए तैयार रहते है।

चरित्र के जिद्दी और जुनूनी होने का प्रमाण तभी मिलता है जब आशीष बच्चों को बताता है कि उसने सिर्फ बच्चों को पढ़ाने के लिए सिविल सर्विसेज जैसी सेवा को ठुकरा दिया है। हालांकि यह बात भले ही हास्यास्पद लगे लेकिन चूंकि इस एक्ट में इतनी सावधानी बरती गई है कि हास्यास्पद बात भी एक हद तक चरित्र के साथ जुड़ती नजर आती है।

आशीष के जीवन के उद्देश्य:

फ़िल्म में चरित्र आशीष कुमार की लड़ाई केवल सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई को लेकर नही है बल्कि जैसे ही आशीष इस स्कूल में आता है वहां अकर्मण्यता, जातिवाद लोगों की विकृत मानसिकता और पुराने ढर्रे पर चल रहे सिस्टम के खिलाफ भी चलती है। चूँकि चरित्र आशीष कुमार खुद एक दलित वर्ग से है और आशीष अपने नाम के आगे सरनेम जैसी चीज लगाने से गुरेज करता है और वह छात्रों से भी केवल उनके नाम की पड़ताल करता है।

मुख्य चरित्र, पात्र और निर्माता निर्देशक:

मुख्य चरित्रों और पात्रों में शिवा सूर्यवंशी अपने चरित्र के साथ बेहद मजबूती से न्याय करते नजर आते है। शीतल सिंह ने ग्राम प्रधान के रूप में बेहतर न्याय किया है, साथ मे मनवीर चौधरी और चंद्रभूषण सिंह ने फ़िल्म में अभिनय की छटा बिखेरी है।

फ़िल्म का निर्देशन किया है आदित्य ओम ने, इस फ़िल्म के पटकथा लेखक खुद निर्देशक और मुख्य कलाकार शिवा सूर्यवंशी है। साथ ही इस फ़िल्म की मूल कहानी को शिवा सूर्यवंशी ने लोगों के सामने पेश किया है। फ़िल्म अपनी दमदार कहानी सजीव अभिनय, उम्दा निर्देशन के चलते देश दुनिया के तमाम फ़िल्म फेस्टिवल में झंडे गाड़ चुकी है।

अगर फ़िल्म के स्ट्रांग पॉइंट की बात करे तो रियल लोकेशन पर की गई शूटिंग जिसमें धान के लहलहाते हुए खेत, बच्चों के साथ खेलते मास्साब की तस्वीर न सिर्फ असली लगती है बल्कि अपने माध्यम से ग्रामीण खेलो के बारे में लोगों को अवगत कराती है। सरकारी शिक्षा पद्यति, लिंगभेद, जातिभेद के साथ यह फ़िल्म अपने उन सभी आयामों पर खरी उतरती है।

और अगर फ़िल्म के निगेटिव पॉइंट की बाते करे तो कभी-कभार जल्दबाजी में बोले गए डायलॉग टीस पहुंचाते है। हालाँकि फ़िल्म की समय सीमा को देखते हुए यह भी जायज लगने लगता है, हालांकि फिल्म में अन्य निगेटिव पॉइंट्स भी हो सकते है लेकिन जब फ़िल्म के लक्ष्य और उद्देश्य की बात आती है तो फ़िल्म की सारी कमियां अपने आप दम तोड़ देती है।

वैसे अब फिल्मी सिनेमा में रियल सिनेमा का दौर एक बार फिर अपने रास्ते पर चल पड़ा है, यही कारण है कि मास्साब की देखा देखी अन्य फिल्मों के बनने की उम्मीद है।

मास्साब बीते माह 29 जनवरी से सिनेमाघरों में पहुँच चुकी है, अगर आप असल सिनेमा की परख रखते है और शिक्षा के बाजारीकरण जैसे मुद्दे पर मुखर है तब आपको मामूली से कीमत अदा करके इस विषय पर बनी हुई फ़िल्म को देखने के लिए थियेटरों में पहुँचना चाहिए। उदय बुलेटिन अपने अनुभव के आधार पर इस फ़िल्म को पांच सितारों में से साढ़े तीन स्टार प्रदान करता है।

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उदय बुलेटिन
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