बॉलीवुड में नशे को लेकर इतना ज्यादा हो हल्ला क्यों है? आइये इसकी परते उधेड़ें

गांजा, चरस, कोकीन पीकर पब्लिक का मनोरंजन करने वाले बॉलीवुड के सितारे अब पब्लिक को क्या मुंह दिखाएंगे?
बॉलीवुड में नशे को लेकर इतना ज्यादा हो हल्ला क्यों है? आइये इसकी परते उधेड़ें
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अगर नशे के सेवन की बात करे तो तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा यह दलील दी जा रही है कि एनसीबी और केंद्र सरकार को हरिद्वार भेजना चाहिए जहां पर क्विंटलों के भाव मे गांजा चरस मिल जाएगा। आखिर सिनेमा जगत में नशेबाजी को लेकर इतना बवाल क्यों है? आइये जानने की कोशिश करते हैं।

आखिर भारतीय सिनेमा क्या है?

आपको क्या लगता है कि तेरे नाम फ़िल्म में सलमान खान वाली हेयरस्टाइल कोई अन्तरिक्ष यात्री चंद्रमा से लेकर आया था? या फिर पद्मावती जैसा लहंगा भारतीय युवतियों ने किसी दूसरे ग्रह की महिला से देखकर खरीदा और सिलवाया था ? या फिर जॉन अब्राहम की तरह बाइक चलाना माइकल शूमाकर से सीखा था?

सवाल बेहद सीधे और साफ है, कपड़े पहनने के ढंग से लेकर जीवन जीने की शैली भारतीय समाज मे काफी हद तक फिल्मों से आती है। लोग फिल्मों और टीवी जगत के कलाकारों से देखकर सीखते हैं। पचास अपराधियों में खुले तौर पर यह कुबूल किया है कि उन्होंने अपराध करने का यह ढंग फिल्मों से सीखा। खैर यहां यह कहना जायज नहीं होगा कि समाज मे सारी बुराइयां फिल्मों से ही आई है, लेकिन आप इसे नकार नहीं सकते कि फिल्मी दुनिया एक बहुत बड़ी मात्रा में लोगों को प्रभावित करती है फिर चाहे वह अच्छाई हो या बुराई, दोनो के अनुपात लगभग बराबर-बराबर निकल कर सामने आते है।

एक वक्त कहा भी गया कि फिल्में समाज का आईना होती है या इसका उल्टा भी, जैसा समाज वैसी फ़िल्में लोग देखते है या फिर यह कहा जाए कि जैसी फिल्में लोग देखते है वैसा समाज अनुसरण करता है। हालांकि शत-प्रतिशत नहीं लेकिन एक हद तक तो जरूर यह बात पक्की है कि फिल्में आम आदमी या खासकर युवा के जीवन को प्रभावित करती हैं।

खलनायक के संजय दत्त की नकल करता हुआ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नामी गुंडा बिल्लू सांडा:

कलाकारों की अपनी मर्जी वो क्या करें क्या न करें:

फ़िल्म जगत से जुड़े हुए लोग बहुत बड़ी अहमियत रखते है अगर पिछले कुछ वक्त का राजनीतिक विश्लेषण करें तो फिल्मी सितारों ने तथाकथित भारत निर्माण में अपनी पूरी ताकत लगा दी फिर चाहे वही सीएए, एनआरसी का विरोध हो या भाजपा सरकार की आलोचना, लेकिन बात जैसे ही समाज के चरित्र निर्माण की आयी तो इन्हीं सितारों के सुर बदलने शुरू हो गए।

राम मंदिर निर्माण के मामले से लेकर सुशांत की संदिग्ध हत्या और ड्रग्स मामले तक अगर हम देखे तो बॉलीवुड का भारत की आम जनता से बेहद सीधा संवाद नजर आता है। लेकिन जैसे ही मामला जांच पड़ताल का आता है उसके पहले ही विक्टिम कार्ड और अन्य तमाम हथियारों का प्रयोग होना शुरू हो जाता है।

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दीपिका पादुकोण, सारा अली खान, श्रद्धा कपूर एनसीबी की रडार पर कभी भी हो सकती हैं पूछताछ।

फिल्मी दुनिया और साधु संत की तुलना कितनी जायज है?

एक पत्रकार है अजित अंजुम जो एक वक्त तक टीवी में आते थे लेकिन अब नहीं आते, टीवी से निकलने के बाद अपनी इस दशा के लिए वर्तमान सरकार को दोषी मानते है और शिकायत करते नहीं थकते। उन्हें एनसीबी की छापेमारी और जांच पड़ताल से बहुत ज्यादा दिक्कत हो गयी है और खासकर अभिनेत्रियों के पकड़े जाने की वजह से उन्हें बॉलीवुड के भविष्य का खतरा नजर आर हा है। हालाँकि इसे केवल कुतर्क के तरीके से देखा जा रहा है एजेंसियां अपनी नजर हर मामले पर बराबर से गड़ाए रखती है फिर चाहे वह फिल्मी दुनिया हो या आम धार्मिक स्थल लेकिन साहब को इन्हीं स्थानों पर रेड चाहिए। मजे की बात तो यह है कि जिन स्थानों का उन्होंने जिक्र किया उनमे रहने वाले संत किसी के निजी जीवन को कोई खास प्रभावित नहीं करते।

देश के सो काल्ड बड़े पत्रकार गांजे की खोज के लिए एनसीबी को इनपुट देते नजर आए:

अजित अंजुम को नशेड़ियों में भी राजनीतिक एंगल नजर आने लगा:

सिनेमा भारत की हर प्रकार की स्थिति को दुनियाभर में दिखाता है अगर उसमे नशे का दंश अपना अपना जहर फैला रहा है तो उसे कुचल देना ही बेहतर है भले ही कितना बड़ा कलाकार हो, कोई भी व्यक्ति समाज, संविधान और कानून से बड़ा नहीं हो सकता। आखिर जो कलाकार समाज मे इतना ज्यादा दखल रखते है उसके ऊपर समाज का दखल होना बेहद आवश्यक है।

डिस्क्लेमर: लेख में लिखे गए सभी विचार लेखक के है, उदय बुलेटिन का इनसे सहमत होना आवश्यक नही है

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