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चहल पहल

चंद्रमा की जमीन पर आखिर विक्रम को ही क्यों भेजा गया है?

” विक्रम जीवटता का सुबूत है, जब कानपुर की गड्ढा युक्त सड़के इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती तो चांद क्या चीज है जी “

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

भारत ने चंद्रयान द्वितीय को लांच कर दिया है और लगभग 49वें दिन विक्रम नाम का यंत्र चांद की जमीन पर अटखेलियां करते हुए उतर जाएगा ,लेकिन इस खबर से सबसे ज्यादा आश्चर्य कानपुर के वासियों को है कि आखिर ISRO को कानपुर की याद अचानक कैसे आयी।

कनपुरिया स्टाइल किसको पसन्द नहीं आता , कमलापसंद और साथ में कनपुरिया टोन, हज़ारों की भीड़ में भी आसानी से पहचानी जा सकती है।

एक बार तो एक कनपुरिया ने भगवान को भी टहला दिया था "मुआमला यह था कि एक किसी सज्जन ने भगवान भूतभावन 'भोलेनाथ' की अपार तपस्या की और जब उसे लगा कि अब शायद भगवान आएंगे ही नहीं, तो सुअवसर पाकर बगल की गुमटी के लिए निकल गए , पांच रुपये वाला कमलापसंद मुँह में रखकर लार के साथ घोला ही था कि भोलेनाथ अपनी निजी वाहन नंदी के साथ उपस्थित हो गए, बोले वत्स वर मांगो।

लेकिन भक्त ने विचित्र प्रकार की गो-गो वाली आवाज के साथ शब्द मिश्रित करके प्रभु को बताया कि प्रभु कुछ मांग नहीं सकते ! काहे की अभी कमला खाये है" खैर ये तो हुआ खुल्ला मजाक।

अब थोड़ा तार्किक मजाक पर आते है। आखिर ISRO ने अपने रोवर के लैंडिंग वाहन का नाम विक्रम ही क्यों रखा ? इसमें भी बड़ा भारी मनोविज्ञान छुपा हुआ है। आप कभी कानपुर की सड़कों पर गए है? नहीं गए तभी आपकी शंकाएं बड़ी उमड़ उमड़ कर सामने आ रही है।

आप अगर पैदल ही कानपुर की सड़कों पर टहलने निकले है तो आपको सलाह है कि आप वाकिंग इंश्योरेंस कही से खरीद ले ( अब जब यात्रा के लिए बीमा हो सकता है तो टहलने के लिए भी होना चाहिए) मैं तो कहता हूँ, टहलने भर के लिए क्यों नाचने गाने, खाने, और खासकर पीने के लिए बीमा होना जरूरी है। क्या पता कब पैमाना हद से ज्यादा बढ़ जाये और पीने वाले कि जिंदगी का पैरामीटर फेल हो जाये।

कानपुर की इन्ही सड़कों पर अगर किसी का एकछत्र राज है तो वो किसी फॉक्सवैगन या पजेरो का नहीं है, यहाँ ये सभी मठाधीश अपनी औकात में रहकर निकलते है। यह पर अगर किसी की बादशाहत लगभग डेढ़ दशक से कायम है तो केवल "विक्रम " टेम्पो की है। सड़कों पर तो ऐसे चलता है, जैसे मृत सागर में कोई परम उस्ताद, तैराक अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा हो।

भरी सवारियों की स्थिति देखे तो अगर उत्तर प्रदेश पुलिस के डंडा वाले अंकल , बोनट पर डंडा न ठोंके तो करीब एक सैकड़ा लोग इसी विक्रम में ऐसे ठूंस दिए जाते है जैसे मधुमक्खी के छत्ते में शहद की मक्खियां ,और मजाल क्या की किसी को कोई आराम नसीब हो।

लैंडिंग कर्म में इतना माहिर की 5-5 फुट के विकट गड्ढे महाराज विक्रम को देखकर ही अपना सीना ऊंचा कर देते है। विक्रम साहब बिना किसी मेहनत के शहर के हर गड्ढे को मनोरंजक तरीके से पार कर लोगों को गैस , अपच, और मंदाग्नि की बीमारी रिटर्न गिफ्ट के तौर पर देकर गंतव्य पर उतार देते है।

ISRO के वैज्ञानिक भी अपने रोवर के साथ ऐसा ही कुछ चाहते है, सॉफ्ट लैंडिंग, और कानपुर का विक्रम इस मामले में येले विश्वविद्यालय से बिना यूजीसी मान्यता के डिग्री लिए बैठा है।

भले ही शेक्सपियर "नाम में क्या रखा है" की कोट लिखकर उसके नीचे अपना नाम लिखकर अपने लिखे को ही गलत साबित करने में जुटे हो, वही चीज विक्रम के साथ है, जीवटता के मामले में विक्रम , आपे, छोटा हांथी, बड़ा हांथी के सामने सवा सेर नजर आता है।

यही स्थिति और भविष्य का पूर्वानुमान विक्रम के साथ चांद पर गया है, उम्मीदें काफी ज्यादा है , क्योंकि जो विक्रम कानपुर की सड़कों पर मनमर्जी हिसाब से चल सकता है, वह चांद पर भी अपने ही झंडे गाड़ेगा।

नोट: पोस्ट हल्के फुल्के मजाक को लक्षित करती है, हम चन्द्रयान 2 मिशन के 100% सफल होने की कामना ही नहीं करते बल्कि यह विश्वास है कि हमारे मेहनतकश वैज्ञानिकों का काम कभी जाया नहीं जा सकता। जय हिंद ,जय भारत !