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नौकरी मांगते छात्रों की विनती आखिर क्यों नहीं सुन रही मोदी सरकार ?

न जानें ऐसी कितनी परीक्षाएं दिए हुए घूम रहे बेरोजगार छात्र अपने भविष्य के अच्छे दिनों के इंतजार में हैं ताकि वो भी अपने जीवन से इस बेरोजगारी के तमगे को दूर कर सकें।

Puja Kumari

Puja Kumari

आज हम आपसे एक ऐसे मुद्दे पर चर्चा करने जा रहे हैं जो काफी गंभीर है लेकिन शायद सरकार इस विषय को ज्यादा सीरियस नहीं ले रही। दरअसल हम बात कर रहे हैं रोजगार की, सरकारी परीक्षाओं में हुई धांधली की। एक तरफ देश के ज्यादातर युवा इन परीक्षाओं के लिए संघर्ष किये जा रहे हैं तो वहीं दूसरी ओर नौकरी देने वालों की इस लापरवाही से लोग हताश भी हो रहे। अब कर भी क्या सकते हैं! आज के समय मे रोजगार हो, नौकरी हो या फिर काम हो हर किसी के लिए इन सभी शब्दों के अलग-अलग मायने हो गए हैं। जहाँ हमारे देश के पीएम कहते है कि मूर्ति कला से रोजगार उत्पन्न होगा, जब हमारे देश मे टूरिज्म के रास्ते और अधिक खुलेंगे तो रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।

सरकार चाहें कांग्रेस की हो या फिर भाजपा की बेरोजगारी के आँकड़े कभी भी कम नहीं रहे हैं, पर अफसोस तो इस बात का है की जिस न्यू इंडिया की हम कल्पना कर रहे हैं उसमें फिलहाल जो स्थिति है वैसी कभी नहीं देखने को मिली होगी क्योंकि इस समय देश में बेरोजगारी के आँकड़े पिछले 45 साल में सबसे ज्यादा हैं। इतना ही नहीं इनसे भी आगे अगर बढ़ा जाए तो सरकारी नौकरी हो फॉर्म हो या फिर रिजल्ट इनसब में धांधली, लापरवाही, सट्टेबाजी खूब देखने को मिलती है। इसकी वजह से युवाओं को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

उदाहरण के रूप में देखा जाए तो यूपी के 69000 शिक्षकों की भर्ती के लिए जो परीक्षाएं ली गयी थी उसका रिजल्ट आजतक अटका हुआ है। यही नहीं इसकी तरह अन्य कई परीक्षाएं हैं जिसकी नाव अभी भी मझधार में लटकी हुई है और कोई इस बात पर चर्चा भी नहीं करता। कई परीक्षाएं तो ऐसी भी है जिसकी भर्ती 2 साल पहले ही शुरू हो गयी थी लेकिन आजतक उसका परिणाम नहीं आया।

बेरोजगारी
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विशेष रूप से बात करें यूपी के 69000 भर्तियों की तो इसकी कहानी साल 2018 के अंत से ही शुरू हो गई थी। यूपी के सरकारी स्कूलों में सहायक शिक्षकों की भर्ती के लिए दिसंबर में वैकेंसी आई जिसके बाद तय समय के अनुसार जनवरी माह में उसकी परीक्षा भी ली गई तत्पश्चात सरकार द्वारा कटऑफ़ रिलीज किया गया जिसमें जनरल कैटेगरी वालों को 65 और अन्य कैटेगरी वालों को 60 % पासिंग मार्क्स थे, पेपर का कुल अंक 150 नंबर था। अब समस्या यही से शुरू हो गयी, क्योंकि इस कट ऑफ के सामने आते ही कई लोग इससे नाखुश हो गए जिसमें एक पक्ष था बीएड और बीटीसी वालों का तो एक पक्ष था शिक्षामित्रों का।

खास बात तो यह है कि इस परीक्षा से पहले भी एक परीक्षा ली गई थी वह भी शिक्षकों के लिए लेकिन उसमें कट ऑफ मार्क्स 50 से 45% रखा गया था लेकिन इस परीक्षा में अभ्यर्थियों की संख्या को देखते हुए यह कट ऑफ बढ़ा दिया गया जोकि शिक्षामित्रों को रास नहीं आया और फिर इसी मुद्दे को लेकर वो हाई कोर्ट चले गए वहां इस पर सुनवाई हुई और इसके पहले की तरह कर दिए गए लेकिन अब इस फैसले से बीएड और बीटीसी वाले नाराज हो गएं और वह इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट में चले गए इन दो गुटों की लड़ाई में इस भर्ती किया रिजल्ट मझधार में अटक गया जो कि अभी भी क्लियर नहीं हो पाया है।

क्या कर सकती है सरकार?

आप ये सोच रहे होंगे कि आखिर इन 2 गुटों की लड़ाई में सरकार क्या कर सकती है क्योंकि यह रिजल्ट इन दो गुटों की लड़ाई की वजह से ही अटका हुआ है। किंतु इन छात्रों का कहना यह है कि सरकार अब कम से कम एक बार अपना पक्ष प्रस्तुत करें जी हां क्योंकि कुल 17 बार इस मामले पर कोर्ट में सुनवाई हो चुकी है लेकिन अभी तक सरकार की ओर से उनके महाधिवक्ता अपना पक्ष सामने रखने नहीं आये है जिसकी वजह से यह मामला अभी भी अटका हुआ है छात्रों का कहना है कि यूपी में योगी आदित्यनाथ ने रोजगार, शिक्षा को लेकर छात्रों से कई सारे वादे किए हैं लेकिन वह इस मुद्दे पर ध्यान क्यों नहीं दे रहे हैं?, आखिर अपना विचार अपना पक्ष क्यों नहीं रख रहे हैं ?

हालांकि इस मुद्दे पर सरकार के पक्ष ना रखने की कई वजह हो सकती हैं लेकिन कया से कई तरह की लगाई जा रही हैं कई लोगों का कहना है कि मंदी भी इसका कारण हो सकती है वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि सरकार 69,000 लोगों को वेतन नहीं दे सकती है इसलिए इस पर चुप्पी साधे हुए पर जरूरी नही है कि वजह यही होगी। इसके पीछे कुछ और कारण भी हो सकते हैं, पर परिस्थितियों के अनुसार तो यही लगता है कि इस समय सरकार की तरफ से इस पर जवाब मिलना थोड़ा मुश्किल नजर आ रहा है।