चुनाव 2019: पेड न्यूज़ की परतंत्रता में लोकतंत्र कब तक जीवित रहेगा ?

भारतीय जनता पार्टी से प्रचार पार्टी बनी बीजेपी पर पेड न्यूज़ के कई आरोप लगे हैं। 
चुनाव 2019: पेड न्यूज़ की परतंत्रता में लोकतंत्र कब तक जीवित रहेगा ?
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देश में चुनाव की हवा बह रही है। हर तरफ चुनावी माहौल है। लोग खाते -पीते, घूमते-फिरते चुनाव की बातें कर रहे हैं। फेसबुक,ट्विटर, व्हाट्सअप, इंस्टाग्राम और हमारे मीडिया तंत्र में चुनावी खबरों की बयार सी बह रही ही। आये दिन हर दूसरे बड़े अख़बार में समाचार की शक्ल में राजनेताओं के विज्ञापन छापे जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीरों और सरकारी योजनाओं से पूरा देश पटा है। लेकिन हमारी मीडिया दावा करती है कि हम पेड न्यूज़ नहीं छापते।

भारत में पेड न्यूज़ का चलन कितना पुराना है, इसके बारे में तो कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन पेड न्यूज़ का कांसेप्ट संस्थागत तौर पर मात्र तीन दशक पुराना है। 1998-99 के दौर में समाचार पत्रों को तेजी से उभरने के लिए पेड न्यूज़ का सहारा लेना पड़ा था। उस समय अख़बारों के पेड न्यूज़ पैकेज में केवल उम्मीदवारों ने किन-किन इलाकों का दौरा किया ये शामिल हुआ करता था। और अख़बारों को बस तस्वीर सहित दौरे की जानकारी छापनी होती थी। तब से लेकर वर्तमान समय में पेड न्यूज़ का दखल लगातार बढ़ता जा रहा है।

पेड न्यूज़ - छूत की बीमारी

देश के तीन बड़े अख़बारों यानी कि दैनिक भास्कर, नई दुनिया और दैनिक जागरण ने अपने पाठकों से दावा किया कि हम उनके अख़बार में कोई पेड न्यूज़ नहीं छापेगे।

जिसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में मध्य प्रदेश के एक अख़बार ने अपने पहले पन्ने पर विज्ञापन छापा था जिसमें कांग्रेस नेता और केंद्र के मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और केंद्रीय मंत्री कमलनाथ के बारे में लिखा गया था - माफ़ करो महाराज, हमारा नेता तो शिवराज।

अगले दिन मध्य प्रदेश के दूसरे बड़े अख़बार ने एक दूसरा विज्ञापन छापा, जिसमें कांग्रेस सरकार के बड़े वादे के साथ लिखा था, वक्त है बदलाव का।

इन विज्ञापनों को पढ़ कर पाठकों ने हँसते हुए कहा - हाँ भाई आजकल प्री-पेड का जमाना है। चुनाव से पहले ही अच्छा खासा विज्ञापन सरकारों और पार्टियों से ले लिया है। क्या जरुरत है पेड न्यूज़ की।

आप चाहे जिस भी स्तर के मीडिया तंत्र से जुड़े हो, अख़बार या चैनल चला रहे हो, राजस्व जुटाने की चिंता सबको होती है और मीडिया के विस्तार के लिए पेड न्यूज़ का चलन बढ़ता जा रहा है।

पेड न्यूज़ का मकसद होता है पैसे लेकर कवरेज छापना। बड़े मीडिया तंत्र में पैसे लेकर नेताओं के प्रचार का कवरेज छपने की ये बुराई लंबे समय से चलती आ रही है मगर चुनाव आयोग और प्रेस परिषद के चलते इस पर रोक लगाने के लिए कई बड़े नियम बनाये गए हैं। अख़बारों में छपने वाले विज्ञापनों पर तो पेड न्यूज़ की सख्ती का असर तो नहीं देखता है लेकिन उम्मीदवारों के प्रचार का कवरेज कम हो गया है। कुछ मीडिया तंत्र पेड न्यूज़ के आरोपों से बचने के लिए दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों को सामान तरीके से कवरेज देना शुरू कर दिया, जो देखने और पढ़ने में अजीब सा लगता है।

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चार सालों में पेड न्यूज़ की 1400 से ज़्यादा शिकायतें

अब एक बार नज़र डालते हैं 2014, 2015, 2016 और 2017 में हुए विधानसभा चुनावों पर-

बीते चार सालों में 17 राज्यों के विधानसभा चुनाव में पेड न्यूज़ की 1400 से ज़्यादा शिकायतें सामने आई हैं।

वर्ष 2014 में हरियाणा (212), महाराष्ट्र (73), झारखण्ड (7) और जम्मू कश्मीर (21) के विधानसभा चुनाव में पेड न्यूज़ के 313 मामले सामने आये थे। जिसमें सबसे अधिक पेड न्यूज़ 212 मामले हरियाना से आये जो देश में सबसे ज़्याफ़ा थे।

वर्ष 2015 में दिल्ली (59) और बिहार (7) के विधानसभा चुनाव में में चुनाव हुए। जिसमें पेड न्यूज़ के 66 मामले सामने आये थे। जिसमें सबसे अधिक पेड न्यूज़ 59 मामले दिल्ली से आये थे।

पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान पेड न्यूज़ की 523, गुजरात विधानसभा चुनाव में 414 और हिमाचल चुनाव में 104 शिकायतें सामने आईं थीं।

कर्नाटक में हुए विधानसभा चुनाव में पेड न्यूज़ की 93 शिकायतें दर्ज की गईं।

मीडिया पर दबाव

पेड न्यूज़ पर बात करते हुए एक वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि "पेड न्यूज़ का दबाव तो होता है, और कई बार मुश्किल स्थिति भी होती है, नेशनल चैनल की शुरूआत में स्थिति समान्य होती लेकिन लोकल चैनल को लेकर ये स्थिति आ गई है कि अगर पेड स्लॉट नहीं करेंगे तो चलेगा कैसे। इसलिए हमारे चैनल ने फैसला किया कि अगर पैसा लेकर कार्यक्रम करना हुआ तो उसका डिस्क्लेमर भी दिखाई देना चाहिए।"

एक पत्रकार ने बताय कि "चुनाव के वक्त हमारे पास मौका होता है कि हम एक तरह से अख़बार समूह के लिए रेवेन्यू बढ़ा सकते हैं। तो वे इस तरह की रणनीति अपनाते हैं जिससे नेताओं से कमाई हो सके।"

  • अख़बार प्रबंधन हर चुनाव से पहले रेट कार्ड के हिसाब से पेड न्यूज़ के ऑफ़र उम्मीदवारों के सामने रखता रहा है।
  • मेट्रो शहर में चलने वाले टीवी चैनल ने अपने यहां की प्रोग्रामिंग चौबीस घंटे में ऐसे बना ली कि पहले आधे घंटे में एक सीट से एक उम्मीदवार जीत रहा होता है
  • पेड न्यूज़ की संख्या बढ़ने पर अख़बार के पहले दो पन्नों का 'जैकेट विज्ञापन' जारी कर दिया जाता है।

चुनाव आयोग की कोशिश

2019 के लोकसभा चुनाव से पहले संचार माध्यमों की मदद से होने वाले प्रचार पर इस बार चुनाव आयोग की सख्त निगरानी का असर देखने को मिलेगा।

चुनाव आयोग ने पेड न्यूज़ की बुराई रोकने के लिए मीडिया सर्टिफिकेशन एंड मोनिटरिंग कमिटी बनेगी जो हर राज्यों अखबारों में छपने वाली खबर पर नज़र रखेगी।

राज्यों के बड़े अख़बारों में छपने वाली ख़बरों पर नज़रों रखने के लिए जनसंपर्क अधिकारीयों पर सौंपा गया है।

उम्मीदवारों के फेसबुक,ट्विटर पे भी इस बार चुनाव आयोग की नज़र होगी। यहां तक की इंटरनेट पर टेक्स्ट पर भी नज़र रखे जाएगी और चुनाव आयोग को रिपोर्ट करनी होगी।

2014 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर एक अधिकारी ने बताया कि 40 ऐसे तरीके हैं जिनके ज़रिए उम्मीदवार धन का दुरुपयोग करते हैं। उनमें गली-मोहल्ले में शराब बांटने से लेकर गाड़ियां बांटने और पेड न्यूज़ तक के मामले शामिल हैं।

चुनाव आयोग सख्ती से मीडिया रिपोर्टिंग कुछ सयंत और संतुलित हुई है। आने वाले लोकसभा चुनाव में पेड न्यूज़ की इस सख्ती के अचे परिणाम देखने को मिलेंगे। बशर्ते पेड न्यूज़ से बचने के लिए मीडिया तंत्र कोई नई तरकीब न निकल ले।

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उदय बुलेटिन
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