फ्रांस में हुए कार्टून कांड को लेकर भारत मे आंदोलन हो रहे है और बल्लभगढ़ मामले में एक आवाज तक नहीं

ये सोचने की बात है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है, कौन है इसके पीछे?
फ्रांस में हुए कार्टून कांड को लेकर भारत मे आंदोलन हो रहे है और बल्लभगढ़ मामले में एक आवाज तक नहीं
islamic terror in franceGoogle

अब इसे धार्मिक निर्भरता का अंधा नमूना कहा जाए या कुछ और फ्रांस में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मुस्लिम धर्म के पैगम्बर के कार्टून के बाद उनका सर काट दिया गया इस पर लोगों ने गला रेतने वाले का विरोध न कर के धर्म पर टिप्पणी के मामले का विरोध करना शुरू कर दिया है, भारत से हज़ारों किलोमीटर की दूरी होने के बाद भी इस मामले का असर भारत मे देखा जा सकता है, लेकिन महज 500 से 1000 किलोमीटर की दूरी पर जहां एक स्कूल से आती हुई बच्ची को जाहिल युवक ने अपनी इच्छा पूरी करने में बाधा बनने पर गोली से उड़ा दिया उसपर किसी धर्मावलंबियों द्वारा चूं की आवाज तक नही निकाली गई

आखिर फ्रांस की इतनी चिंता क्यों?

दुनिया भर में खासकर जहाँ मुस्लिम बहुलता है वहाँ पर फ्रांस के मुस्लिम कट्टर आतंकवाद विरोधी बयान को लेकर विरोध जताया जा रहा है जिसमें खुद को मुस्लिमों का खलीफा देश बनने का ख्वाब देखने वाला देश तुर्की और दुनिया का सबसे ताकतवर देश मानने वाला देश पाकिस्तान देश दुनिया से फ्रांस के बहिष्कार करने की मुहिम चला रहे है, दरअसल इस विवाद की शुरुआत कुछ वर्ष पहले एक पत्रिका शॉर्ली एब्दो के एक विवादित कार्टून से हुई, दरअसल किसी बात को लेकर पत्रिका में इस्लाम धर्म के पैगम्बर साहब का कार्टून छाप दिया, इस पर धार्मिक कट्टरपंथी लोगों ने शॉर्ली एब्दो के ऑफिस में घुसकर हमले को अंजाम दिया जिसमें कई लोग मारे गए।

अभी हाल में भी फ्रांस में एक बार फिर से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर एक बार फिर यह कार्टून चर्चा में आया, दरअसल अभिव्यक्ति की आजादी का उदाहरण देते हुए एक स्कूल के शिक्षक ने इसी कार्टून को दिखाते हुए छात्रों को जानकारी दी, इसपर एक कम उम्र के कट्टरपंथी ने शिक्षक का सर कलम कर दिया, इस पर फ्रांस में एक बार फिर से कट्टरपंथ को लेकर बहस शुरू हो गयी और फ्रांस ने इस विचारधारा को कड़े शब्दों में जवाब दिया, फ्रांस ने बिना किसी अगर मगर के सीधे-सीधे कट्टर इस्लाम पर करारी चोट की। इस पर सबसे पहले तुर्की जैसे मुस्लिम देश के द्वारा प्रतिक्रिया सामने आयी और इसकी देखा देखी अन्य मुस्लिम देशों में इसको लेकर आंदोलन होना शुरू हो गया।

पाकिस्तान ने भी फ्रांस को नसीहतें देना शुरू कर दिया, हालांकि वो बात अलग है कि पाकिस्तान के विरोध करने पर फ्रांस को कोई फर्क नहीं पड़ता, इस मामले पर भारत ने फ्रांस के कदम की सराहना करते हुए अपने सहयोग की प्रतिबद्धता दर्ज कराई, सनद रहे कि भारत एशिया में फ्रांस के सहयोग की बात करने वाला पहला देश साबित हुआ, देर सबेर यूरोपियन यूनियन के तमाम देशों द्वारा फ्रांस के बयान को सहयोग देते हुए कट्टरपंथी आतंकवाद की निन्दा करने को सामने आया है।

भारत के मुद्दे क्या कम है:

अगर भारत के सो काल्ड विचारकों की बाते माने तो भारत मे ही खुद इतने मुद्दे पनिहा साँपो की तरह बिलबिला रहे है कि उन्हें दूसरे देशों में चल रहे मुद्दों से कोई लेना देना नही, लेकिन अगर विचारकों के अनुसार उन्हें वैश्विक मुद्दे हिलाते है या फर्क डालते है तो क्या सिर्फ सिलेक्टिव मुद्दे ही परेशान करते है, आप राणा मुनव्वर को ले लीजिए, उन्हें एक तो हरियाणा के गोलीकांड के मामले पर पहले तो बोलने का मौका नहीं मिला और बोलने का मौका मिला तो फ्रांस में सरे आम गर्दन कलम करने वाले कि तरफदारी कर गए, हालाँकि जब उन्हें अपनी कही हुई बात खुद हल्की फुल्की गलत समझ मे आयी तो उन्होंने हरियाणा वल्लभगढ़ मामले के दोषी को सरेआम गोली मारने की बात की, लेकिन मजे की बात यह कि ये वही शायर है जिन्होंने गौरक्षक मामले पर अवार्ड वापस करते नजर आए थे, लेकिन बल्लभगढ़ मामले पर इन्होंने न कोई तख्ती उठायी, कुर्ते की बांह पर न ही कोई काला पट्टा बांधा, न ही ट्विटर पर कोई धमाल मचाया, जो इन्होंने CAA के मौके पर तेजी दिखाई थी।

हमे सिलेक्टिव होने की तड़प है, हम उसमे अव्वल है:

अगर हमारे नजरिये से भारत और इसके बाशिंदों की पड़ताल करे तो भारत मे गजब का सिलेक्टिवनेस नजर आता है, वो मुद्दों को अपने निजी फायदे नुकसान के हिसाब से उठाते है तख्तियां बैनर, जाति, धर्म समुदाय के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के मद्देनजर उठायी जाती है, भला निकिता के लिए इतना बवाल क्यों, क्योंकि वह ऊंची जाति से संबंधित है, हम सच मे बेहद अव्वल स्थान पर है, हमारा इतिहास हमसे सदैव सवाल करता रहेगा, जिसका कोई जवाब हमारी पीढ़ियों तक के पास नही रहेगा।

डिस्क्लेमर: लेख में लिखे गए सभी विचार लेखक में मौलिक विचार है, उदय बुलेटिन का इनसे सहमत होना आवश्यक नही है

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उदय बुलेटिन
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