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कांट्रेक्ट बेस नौकरी मतलब कांट्रेक्टर की बल्ले बल्ले, कर्मचारियों का शोषण, सालाना है अरबों रुपये का कालाबाजार

“बाँदा मेडिकल कालेज इस तरह के करप्शन में पूरी तरह लिप्त है”

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

Summary

सरकार भले ही सरकारी निकायों और उपक्रमों को निजीकरण का हवाला देकर नौकरी बढ़ाने का हल्ला मचाये लेकिन असलियत बेहद घिनौनी समझ मे आती है”क्या आप अनुमान लगा सकते है कि एक कॉन्ट्रैक्ट कर्मी की नौकरी में कितनी जद्दोजहद है, सरकार तमाम प्रकार के विभागों में अधिकांश क्रियाओं के कार्यान्वित करने के लिए निविदा निकाल कर सालाना लाखो हज़ारों कर्मियों की नौकरी निकालती है जिस पर भर्ती होने की जद्दोजहद में युवा अपना सब कुछ लगाकर किसी तरह भर्ती हो जाते है, फिर होता है असल खेल।

Press Note
Contract Employees Strike

सारा खेल कॉन्ट्रैक्ट बेस कर्मी के चयन का:

सैलरी 20000, खाते में आती भी है लेकिन सैलरी आने के बाद होता है नोच खसोट का कार्यक्रम, स्थानीय मेडिकल कालेज बाँदा के मामले को ही उठा लीजिये , यहाँ लगभग तीन सैकड़ा के आस-पास कॉन्ट्रेक्ट बेस पैरामेडिक और अन्य युवा कार्यरत है कहने को तो यहाँ इन कर्मियों को लगभग 20,000 से लेकर 30000 रुपये तक वेतन खाते में दिया जाता है, लेकिन कर्मियों ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि उन्हें मिली सैलरी का एक बड़ा हिस्सा कांट्रेक्टर को परोक्ष तरीके से देना पड़ता है, कुलमिलाकर शरीरिक और मानसिक शोषण के साथ इन कर्मियों के साथ आर्थिक शोषण बदस्तूर जारी रहता है।

हर दो साल के कांट्रेक्ट में करोड़ो के वारे न्यारे :

बाँदा मेडिकल कालेज में हर दो साल में इन कांट्रेक्ट बेस कर्मियों की सेवाएं समाप्त कर के बेरोजगार कर दिया जाता है, और फिर वही कंपनी या कोई दूसरी कंपनियों द्वारा उन्हें तभी काम पर रखा जाता है जब कम से कम 2,00,000 प्रति व्यक्ति कम्पनी को रिश्वत उपलब्ध कराई जाती है।

सुप्रीमकोर्ट के निर्देशों को ठेंगा :

सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति जस्टिस जे एस खेहर, और एस ए वोहड़े की संयुक्त पीठ ने कांट्रेक्ट बेस कर्मियों की वेतन विसंगतियों को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था जिसमे उन्होंने बाकायदा इस बात का उल्लेख करते हुए कहा था कि जब एक संविदा कर्मी और कांट्रेक्ट बेस कर्मी अपनी जिम्मेदारी और कार्यो का निर्वहन अन्य सरकारी कर्मचारियों के बराबर करता है तो उन्हें कम वेतन देना पूरी तरह से न सिर्फ गैरकानूनी है और यह संविधान में वर्णित इक्वल पे फ़ॉर इक्वल वर्क (समान कार्य के लिए समान वेतनमान) के बिल्कुल उलट है।

कुलमिलाकर बाँदा मेडिकल कॉलेज समेत देश के अन्य स्थानों जहां पर सरकारी उपक्रमों और निकायों में हर मिनिट इस तरह का शोषण अपने शबाब पर होता है ,और सरकारों के कुछ ओहदेदार अपना कमीशन लेकर नींद में मस्त है।