बाँदा जिला चिकित्सालय बन चुका है रेफर मशीन।

जिला चिकित्सालय कहने के लिए तो बड़ा चिकित्सा हब होते है लेकिन असलियत में यहाँ के हालात बेहद खराब नजर आते है जो कभी कभार मंत्रियों के दौरे पर अचानक से विश्वस्तरीय हो जाते है लेकिन बाद में हालात जस के तस
बाँदा जिला चिकित्सालय बन चुका है रेफर मशीन।
District hospital bandaUday Bulletin

जिला अस्पताल बाँदा के हालात इस कदर खराब है कि अगर किसी भी व्यक्ति के साथ हल्की फुल्की दुर्घटना होती है तो उसे आत्मसंतुष्टि देने के लिए पहले सरकारी एक्स रे कराके बहलाया जाता है बाद में परिजनों से यह कहा जाता है कि सही तस्वीर देखने के लिए उन्हें बाहरी डिजिटल एक्सरे की जरूरत है। आप इस प्रकार का एक्स रे बाहर से करा सकते है, वहीँ मजे की बात यह है कि अस्पताल में डिजिटल एक्सरे मौजूद है लेकिन उसे लेने के लिए आपके पास जुगाड़ तंत्र का होना जरूरी है नहीं तो सुविधा शुल्क पर यह सुविधा मिलती है। इसके बाद भी जब मरीज का परीक्षण कर लिया जाता है तो उपकरणों के आभाव और चिकित्सकों के आभाव का बहाना बनाकर तथा मरीज को जल्द आराम दिलाने का भरोसा दिलाकर उन्हें कानपुर, झांसी या प्रयागराज जैसी जगहों पर भेजने की सलाह हितैषी बनकर दी जाती है।

जो मरीज आया है वो बाहर जाएगा:

अगर हादसों की बात करें तो बुंदेलखंड में बाँदा जिला हादसों के मामले में अपना अहम स्थान रखता है फिर चाहे सड़क दुर्घटना का मामला हो या मारपीट का। सौ कारणों के लिहाज से यहां के जिला अस्पताल में मरीज़ों की आवक भी ज्यादा रहती है लेकिन मजे की बात यह है कि यहां पर अस्पताल के बाहर खड़ी हुई एम्बूलेंस हमेशा जाने के लिए उतावली नजर आती है। खुद एम्बूलेंस वाले घायल मरीज की अवस्था देखकर यह बताने में सक्षम है कि घायल व्यक्ति का इलाज अस्पताल में होगा कि नही।

फिर शुरू होता है शातिरानापन:

दरअसल असल खेल की शुरुआत यहीं से होती है। अधिकतर मरीज जो थोड़ी बहुत अवस्था मे घायल होते है उन्हें खतरे का डर बता कर निजी अस्पतालों में भेजने की कोशिश की जाती है जिससे मोटा कमीशन उपलब्ध हो सके। यही नहीं अगर आंकड़ों की माने तो इमरजेंसी में लाये गए करीब 60% मरीज़ों को जिला अस्पताल से रेफर करके अपना पल्ला झाड़ लिया जाता है ताकि मरीज़ों का बोझ जिला अस्पताल पर न पड़े। चूंकि जिला मुख्यालय में स्थापित मेडिकल कालेज इन दिनों कोविड हॉस्पिटल के तौर पर चलाया जा रहा है इसलिए अब वहां जाने के भी चांस खत्म हो जाते है और बचते है नजदीकी महानगरों के लूट खसोट करने वाले अस्पताल। यही सिस्टम लंबे वक्त से चला आ रहा है जिस पर न तो जिला प्रशासन अपनी नजर कर पा रहा है ना ही स्वास्थय विभाग।

अगर रेफर ही करना है तो अस्पताल ही क्यों:

तिंदवारी से आये हुए एक घायल व्यक्ति के परिजन ने उदय बुलेटिन को तश्वीर न लेने की शर्त पर बताया कि उसका बेटा बाइक से गिरकर घायल हुआ था जिस पर उन्होंने जिला अस्पताल के इमरजेंसी डिपार्टमेंट (ट्रामा सेंटर) में भर्ती कराया। उसके बाद ड्यूटी पर तैनात डाक्टर ने दूर से देखकर गंभीर मरीज होने की बात बताई। बाद में हमने उसे शहर के ही एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया है अब उसकी हालत ठीक है।

जानकारों की माने तो सरकारी अस्पतालों के यह रवैया केवल अपने बोझ को कम करके मरीजो को निजी अस्पतालों में पहुँचाने के लिए है ताकि मरीजों से पैसो को निचोड़ा जा सके, देखना यह है सरकारे इस तरह की लूट खसोट को कब तक बंद कराती है।

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