दिलीप मंडल ने सोनू सूद के कार्यो पर जताया संदेह

प्रोफेसर होने के बाद भी बेवकूफी भरी बातें करने वाले और जातिबाद का झंडा फहराने वाले सो काल्ड दलितों के मसीहा दिलीप मंडल को अभिनेता सोनू सूद के कार्यो को मीडिया कवरेज मिलने पर आपत्ति है।
दिलीप मंडल ने सोनू सूद के कार्यो पर जताया संदेह
sonu sood helping migrant workersUday Bulletin

मीडिया सोनू की जाति की वजह से तरजीह दी रहा है: मदद की कोई जाति और धर्म नहीं होता, शायद यही कारण है कि सोनू बिना किसी भेदभाव के लोगों को मदद पहुंचा रहे है। हालांकि सोनू भी किसी तरह से मीडिया में अपने अच्छे कामों की लिस्ट नहीं देना चाहते थे लेकिन एक कहावत है की अच्छाई किसी भी तरह से नही छुप सकती और नतीजन उसे जनता के सामने आना पड़ता है। और जब यह बात भारतीय मीडिया में आई कि सोनू बिना किसी बाहरी मदद के मुंबई में फंसे हुए मजदूरों को उनके घरों जिसमे दक्षिण भारत, उत्तर प्रदेश, बिहार पहुँचाया जा रहा तो सोनू को हर तरफ से वाहवाही मिलना शुरू हो गयी। लेकिन अब लोगों की मदद करने से दलित पत्रकारिता करने वाले प्रोफेसर दिलीप मंडल को तकलीफ हो रही है।

दिलीप अपने ट्वीट में लिखते हैं:

"सोनू सूद की मदद को लेकर मेरे कुछ वाजिब डाउट यानी शक है, कि आखिर सोनू के द्वारा किये जाने वाले राहत और मदद कार्यों को उनकी जाति की वजह से जातिवादी मीडिया द्वारा ज्यादा तरजीह दी रही है"

कुलमिलाकर प्रोफेसर मंडल को सोनू की जाति को लेकर टेंशन है, जबकि सोनू ने आम लोगों की मदद के लिए कितनी मेहनत की है ये बताने की जरूरत नहीं है।

आखिर कौन है दिलीप मंडल?

पेशे से पत्रकार है, भारत मे द प्रिंट, बीबीसी के लिए लिखते है इनकी ऑथर प्रोफाइल पर दर्शाया गया है कि पहले इंडिया टुडे समेत अन्य मीडिया हाउस के लिए लिखते रहे हैं।

हालांकि ऐसा नही है कि सोनू की मदद को लेकर सिर्फ विरोध किया जा रहा है बल्कि इनके अलावा कुछ झंडाबरदार लोग इस दुनिया मे है जिनको सोनू की मदद पर भयानक तकलीफ है।

दिलीप मंडल सोनू का विरोध करने पर यहीं तक नहीं रुके बल्कि प्रियंका गांधी की बसों का रिफरेंस लेकर बोलते नजर आए।

हालांकि एक इंटरव्यू में सोनू ने खुद खुलासा किया था कि बस भेजने से पहले सभी कागजी कार्यवाही पूरी की जाती रही हैं।

क्या हो सकता है भविष्य?

देश इस वक्त मुसीबत में है और भविष्य में आपदाएं आती रहेगी अगर जनता के बीच निस्वार्थ भाव से काम करने वाले लोगों को यह पता चलेगा कि समाज का एक वर्ग उनके कार्यो के प्रति यह सोच रखता है तो दिल का दुखना जायज है तो उम्मीद है कि वह व्यक्ति भविष्य में ऐसी मदद से तौबा कर सकता है। रही बात सोनू की मदद की तो सोनू ने मदद करते वक्त न तो किसी मजदूर की जाति पूँछी न ही धर्म बल्कि सोनू का एक ही लक्ष्य था जब तक एक-एक मजदूर को घर नहीं भेजता चैन से नही बैठूंगा।

रही बात सोनू के काम करने के तरीके की तो आप खुद नजर डाल सकते हैं।

एक और नमूना देखिए :

एक और पढ़ लीजिये:

लिस्ट बहुत लंबी है लेकिन इसको पढ़ा जा सकता है:

भारत को मदद की सख्त जरूरत है और इस वक्त जातीय राजनीति करने की कोई जरूरत नहीं है आपके पास खुद का विवेक है, किसी भी सो काल्ड मसीहा की बातों में पड़कर समाजिक ताने-बाने को नष्ट करने का प्रयास न करें। दरअसल इन सो काल्ड पुरोधाओं का आम आदमी कि समस्यायों से कोई लेना देना नही है। अगर इनसे मदद के बारे में चर्चा की जाए तो पता चलेगा कि इन्होंने इस मुसीबत भरे वक्त में किसी मजदूर की एक फूटी कौड़ी वाली मदद नहीं की होगी, तो कुलमिलाकर चाहे कोई प्रोफेसर हो या पत्रकार ऐसे लोगों से कोरोना वाली सोशल डिस्टेंसिंग से भी ज्यादा दूरी बनाइये और इन्हें आइसोलेट कर दीजिए।

डिस्क्लेमर: लेख में लिखे गए शब्द, उदगार और भाव लेखक शिवजीत तिवारी के है उदय बुलेटिन इस लेख के साथ किसी दावे कथन की पुष्टि नहीं करता और सहमति दर्ज नहीं कराता।

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उदय बुलेटिन
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