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देश

कोरोना के बीच बाँदा जेल के हालात बदतर, कैदियों को भूखे सोना पड़ रहा है 

एक ओर जहां देश भर की सरकारे गरीब और वंचितों को खाना मुहैया कराने में जुटी है वहीँ बाँदा जिला मंडल कारागार में हालात बद से बदतर हो चुके है, सूत्रों की माने तो कैदियों को भर पेट खाना नहीं मिल रहा 

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

क्या है खबर :

सूत्रों की माने तो इन दिनों बाँदा में स्थापित मंडल कारागार में निरुद्ध कैदियों के लिए असल मायने की जेल बन चुकी है जहां कैदियों को रोजाना मिलने वाली रोटी से भी मोहताज किया जा रहा है। क्योंकि अगर जेल में बनने वाले भोजन का आंकड़ा उठाया जाए तो मामला बेहद संजीदा बनता नजर आता है, और बंदियों की इस हालत के लिए काफी हद तक कोरोना (कोविड - 19) जिम्मेदार है क्योंकि इस वक्त में सारे सरकारी अमले का ध्यान कोरोना से निबटने में लगा हुआ है लेकिन इन दिनों में जेल के अधिकारियों की अंधेरगर्दी चरम पर है।

आटा दाल का गणित बिगड़ा हुआ है :

अगर जेल में निरुद्ध बंदियों की संख्या करीब 850 के आस-पास है उस हिसाब से जेल में मैनुअल के हिसाब से करीब पौने चार क्विंटल ( ३ किवंटल और 75 किलो ) आटे की खपत होनी चाहिए। लेकिन जेल में अब केवल दो क्विंटल आटा की खर्च किया जा रहा है, इस हिसाब से बाँदा की जेल में कैदियों को पेट भर रोटियां भी नसीब नही हो पा रही। यही बात जेल में बनने वाली दाल सब्जी की मात्रा में भी भयानक बदलाव हुआ है, जिस जेल में बंदियों के खाने के लिए रोजाना करीब 35 किलो दाल की खपत होनी चाहिए वह केवल 20 किलो रोजाना तक ही सीमित हो गयी है। इसका सीधा-साधा मतलब यह है कि बनी हुई दाल में पानी की मात्रा को बढ़ाकर इसे नियोजित किया जा रहा है।

जेल में माफिया हुए सक्रिय :

माफिया शब्द से आप अगर किसी बड़े माफिया के होने की आशंका कर रहे है तो यह बेमानी है क्योंकि जेल में असल माफिया जेल के ही कर्ता धर्ता होते है जेल के अंदर लंबे समय से बाहरी सामानों की कालाबाजारी होती रही है वर्तमान समय मे प्रदेश सरकार के द्वारा गुटके,पान मसाले, और अन्य तम्बाकू उत्पादों पर बंदी कर दी है इसका सीधा-साधा असर जेल में बंद कैदियों पर पड़ा है। इसी का फायदा उठाते हुए जेल के बंदी रक्षकों द्वारा जेल के बड़े अधिकारियों की शह पर बाहरी सामानों पर कालाबाजारी की जा रही है। चूंकि जेल में इन दिनों मुलाकात पर बंदिश होने की वजह से बंदी अपने परिजनों से नहीं मिल पा रहे है इसीलिए उन्हें समान खरीदने के लिए जेल प्रशासन पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इसलिए उन्हें गुटका, पान मसाला, बीड़ी सिगरेट इत्यादि करीब चार गुने मूल्य पर उपलब्ध कराया जा रहा है।

यही नही, रोजमर्रा के उपयोग के समान जैसे प्याज और टमाटर 50 से 100 रुपये किलो के मूल्य पर बंदियों को बेचे जा रहे है, अगर विश्वस्त सूत्रों की माने तो यह सब जेल में वर्तमान कारापाल रंजीत कुमार सिंह और उनके कुछ विश्वासपात्र सिपाहियों द्वारा किया जा रहा है।

जेल में सब कुछ गोलमाल है :

इस वक्त में बाँदा मंडल जेल को भगवान भरोसे कहा जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी, क्योकि बाँदा जेल में जेल अधीक्षक का पद काफी अर्से से खाली पड़ा हुआ है। इस पद की अनुपस्थिति में कारापाल के द्वारा ही जेल का सारा काम कराया जा रहा है। जेल में इन दिनों बंदी रक्षकों के बीच गुटबाजी को लेकर तनाव भी पैदा हो रहा है, मामला सिर्फ कमाई की वजह से है जिसको लेकर तमामंतरीके के मामले खड़े हो रहे है लोगों की मांग है कि बाँदा जेल में उच्चस्तरीय जांच कराई जानी चाहिए ताकि एक समय तक प्रदेश में नम्बर एक पर काबिज रही जेल अपना रिकार्ड कायम रख सके।

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उदय बुलेटिन
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