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Kesarbhai building collapse
Kesarbhai building collapse|Social Media
देश

मुंबई की बिल्डिंग ढही, हादसा या हत्या ?

अचानक गिरी 100 साल पुराणी चार मंजिल बिल्डिंग और 14 लोगों को मौत हो गई  

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

कल सुबह करीब 11: 30 बजे मुंबई में एक बिल्डिंग तेज आवाज के साथ जमींदोज हो गयी, जिसमें करीब आठ से दस परिवार के अधिकांश सदस्य जमींदोज हो गए। लोगों और सरकारी बॉडीज ने इसे हादसा करार देकर पल्ला झाड़ लिया। सरकार ने मुआवजे की रकम तय करके मामला रफा दफा कर लिया , लेकिन यक्ष प्रश्न अभी भी मुँह खोले खड़ा है कि अगला नंबर किसका होगा ?

क्या कोई कीमत, घर के सदस्य की जान की कीमत अदा कर सकती है ?

इस आपदा को लोग भले ही हादसा कह कर टाल दें लेकिन मेरी नजर में यह सीधे-सीधे हत्या की साजिश थी। जिसने साल भर के दुधमुंहे बच्चे से लेकर अपने पैरों से लाचार बुजुर्गों तक को बिना कुछ बोले मरने पर मजबूर कर दिया।

आखिर ये हत्या की किसने ?

कहने के लिए इस हादसे का पूरा दोषी मकान मालिक या फिर बिल्डर को घोषित किया जाएगा। जो काफी हद तक सही भी है ,लेकिन इस नाटक में जो कलाकार पर्दे के बाहर रहते है उसके अलावा पर्दे के पीछे जिन लोगों की कारिस्तानी शामिल रहती है , वो अक्सर लोगों की निगाह के बच निकलते हैं।

निकायों की मटरगस्ती

नगर निगम, नगर पालिका जैसी बॉडी, जिनका काम इस तरह की बिल्डिंगों की पहचान करना, उनमे मरम्मत का निर्देश और आदेश देना शामिल है। उनके द्वारा यह काम कभी नहीं किया जाता। अगर भूलवश कभी कभार यह आदेश या निर्देश दिया भी जाता है तो लोगों के द्वारा यह पालित नहीं किया जाता है। इस प्रकार से इन मामलों में दोषी और लिप्त लोगों को आरोपी बना कर मुकदमे पंजीकृत कराने चाहिए।

अगर आपने कभी भवन निर्माण कराया है तो नगर निगम अथवा विकास प्राधिकरण से नक्शे और गुणवत्ता के सत्यापन के लिए संबंधित विभागों में जाना होता होगा, लेकिन वहाँ का अनुभव लोगों को मजबूर करके रिश्वतखोरी को बढ़ावा देता है, जिस की वजह से भले ही संबंधित इंजीनियर मौके पर पहुंचे या न पहुंचे ,लेकिन सत्यापन जरूरत से जल्दी पहुंच जाता है।

इस तरह के विभागों की जिम्मेदारी सिर्फ नक्शे सत्यापन तक ही सीमित रहती है जबकि जर्जर भवनों की जांच तभी होती है जब कोई मामला बड़े स्तर पर उठ जाता है, अन्यथा समूचे भारत मे रोजाना कोई न कोई बिल्डिंग लोगों को समाकर मौत का दूसरा रूप ले लेती है , लेकिन इस तरह का मामला लोगों के संज्ञान में नहीं आता।

सरकार की नीतियां

भवन निर्माण को लेकर कभी भी सरकार ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया है। यहां तक कि भारत के अधिकांश सरकारी दफ्तर और आवास ऐसे भवनों में बने मिलेंगे जो अपनी आखिरी सांसे गईं रहे होंगे। सरकार जिस तरह मारने वाला को मुआवजा देकर अपना पल्ला झाड़ देती है अगर यही पैसा इस तरह की बिल्डिंगो के निरीक्षण, और पुनर्स्थापना में लगाये तो लोग अपनी जान से हाँथ नहीं धोते।