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मिलिए चित्रकूट के दशरथ मांझी से

रियल वाले दशरथ मांझी के हूबहू हैं भैयाराम यादव

AKANKSHA MISHRA

AKANKSHA MISHRA

दशरथ मांझी का नाम सुनते ही आपके जेहन में पत्नी वियोग से पहाड़ को तोड़ने वाले शख्स की याद आती होगी। ठीक ऐसी ही कुछ कहानी चित्रकूट के भरतकूप क्षेत्र में पड़ने वाले गांव भारतपुर निवासी भैयाराम यादव की है। लेकिन यहाँ कहानी थोड़ा अलग है, मोटिव वही है जो दशरथ मांझी का था, लेकिन क्षेत्र अलग हैं।

दशरथ मांझी की पत्नी इलाज के आभाव में सर्फ इस लिए काल-कवलित हुई थी कि उन्हें पहाड़ की वजह से इलाज मुहैया नहीं हो सका। और यहां चित्रकूट के भैयाराम यादव की पत्नी बच्चा जन्मते समय 2001 में मौत के मुंह मे समा गई, लेकिन बच्चा बच गया। इस घटना के बाद नवजात बच्चे की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी भैयाराम पर आ गयी। जिसमें पालन पोषण इत्यादि शामिल था। निकट के लोगों ने भैयाराम को दोबारा विवाह करने की सलाह दी जिस से जीवन चलता रहेगा। लेकिन भैया राम ने इस सलाह को अस्वीकार कर दिया।

बेटे की मौत ने उजाड़ दी ज़िंदगी

लेकिन उनका जीवन ज्यादा दिन सामान्य नहीं रह सका। 2007 में लंबी बीमारी के बाद लगभग 6 वर्षीय बेटा भी मौत के आगोश में समा गया। बस यही से भैया राम का घर संसार उजड़ गया। भैया राम पागलों की तरह दरबदर घूमने गले। लोग अगर खाना दे देते तो खाना खा लिया करता नहीं तो हफ़्तों बिना भोजन के जीता रहा।

इसी दौरान भैयाराम यादव ने किसी सरकारी बृक्षारोपण कार्यक्रम को देखा। इस घटना ने भैयाराम के जीवन को एक उद्देश्य दिया जिस से भैया राम ने समाज को एक ऐसा उदाहरण दिया जो चित्रकूट के क्षेत्रवासी सदियों तक नहीं भुला सकेंगे।

500 पौधों से की शुरुआत

भैया राम ने पौध रोपण कार्यक्रम को देखकर यह निश्चय किया कि वह भी यह पुण्य कार्य करेगा। मृत पत्नी के बचे खुचे जेवरों को गिरवी रख कर 500 पौधे खरीद लिए और बृक्षारोपण का कार्य शुरू किया। मेहनत रंग लाई और सारे पौधे देखते ही देखते लहलहाने लगे। ये देखकर भैयाराम का मनोबल बढ़ गया, बढ़ते हुए पेड़ों को देख घर छोड़कर जंगल मे झोपड़ी बनाकर रहने लगे। वहीं से नई पौध उगाना , उसे लगाना, देखभाल, सिंचाई, खाद पानी देना ये दिनचर्या का काम हो गया।

12 साल में 40000 से भी ज्यादा पेड़

पत्नी और बच्चों की याद में 12 साल के अंदर भैया राम लगभग 40000 पेड़ लगा चुके हैं। पूंछने पर भैयाराम कहते है कि " गिनती पूरी संख्या में सही तरीके से याद तो नहीं है। लेकिन औसतन 40000 से ज्यादा पेंड़ हो गए होंगे, लेकिन गिनती कौन करे, भला प्रेम में भी गिनती होती है क्या।"

50 हेक्टेयर से ज्यादा बंजर और पथरीली जमीन को बना दिया उपजाऊ जंगल

एक बड़ी जमीन का हिस्सा 50 हेक्टेयर , जिसमें कभी इतना भी पैदा नहीं हुआ जो कि चिड़ियों का पेट भर सके। पथरीली बंजर जमीन को भैया राम ने अपनी अथक मेहनत से हरा भरा कर दिया। अब यहां आम नीम शीशम, सागौन, अमरूद आंवला बेर, इत्यादि पेढ़ बढ़कर छायादार और फल देने वाले बन चुके है, और समाज की जरूरतों को पूरा कर रहे है।

विभाग कर चुका है मिन्नते, लेकिन एक कौड़ी नहीं ली

फारेस्ट रेज के अंदर जंगल में ही एक झोपड़ी बना कर निवास बना रखा है। वन विभाग के उच्चाधिकारियों ने कई मर्तबा भैया राम से मिन्नते कर के गुजारिश की है कि आप अपना बिल लगाए। क्योंकि आप को हम अपने निर्णय से नौकरी तो नहीं दे सकते लेकिन इतने सालों में आपने जो काम किया है उसकी मजदूरी आपको एक दिन में निर्गत कर देंगे। उनके अनुसार अगर मनरेगा की मजदूरी भी जोड़ी जाएगी तो भी कुशल श्रमिक की मासिक मजदूरी 9875 के हिसाब से जोड़कर देखे तो साल में 118500 रुपये मिलेंगे, और 12 साल के हिसाब से ये जाकर 1422000 होते है, लेकिन भैया राम ने यह कहकर नकार दिया कि "भला प्रेम की भी कोई कीमत होती है"

भैया राम के अनुसार अगर उसने पैसे ले लिए तो उसका प्रेम पौधों और पेड़ों के लिए मजदूरों जैसा हो जाएगा, जबकि उसका प्रेम परिवार जैसा है।

अधिकारियों से शिकायत

भैया राम अपने पैसों से ही नए पौधों की सिंचाई कराते आ रहे है। 55 वर्षीय भैयाराम के अनुसार अब उम्र ढल रही है। हो सकता है निकट भविष्य में शायद उतनी मेहनत न कर पाँउ। इस लिए कई बार अधिकारियों से एक अदद हैंडपंप की मांग की है जो अभी तक पूरी नहीं हुई।

फारेस्ट रेंज के अधिकारियों के अनुसार जब बुंदेलखंड सूखे और अकाल से जूझ रहा है। वहीं भैया राम जैसे लोग एक मसीहा की तरह उभरे हैं। अगर पूरे बुंदेलखंड में दो चार भैयाराम जैसे लोग हो जाये तो समूचा क्षेत्र हरा भरा हो जाएगा।