उदय बुलेटिन
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 यमुना एक्सप्रेसवे
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आइए जानें, यमुना एक्सप्रेसवे कैसे बना ‘मौत का हाइवे’, डराते हैं आंकड़े

नोएडा से आगरा के बीच बना यमुना एक्सप्रेसवे एक दिन मौत का हाइवे बन जाएगा ये किसी ने सोचा भी नहीं होगा। 

Puja Kumari

Puja Kumari

बीते दिन यानि की सोमवार की सुबह एक ऐसा हादसा सुनने को मिला जिसे जानकर हर कोई मानो सहम सा गया। हम बात कर रहे हैं यमुना एक्सप्रेसवे (Yamuna Expressway) पर हुई बस दुर्घटना की जिसमें 29 मासूम लोगों की मौत हो गई व अन्य कई घायल भी हुए। ये हादसा जब हुआ उस दौरान लोग सो रहे थें उन्हे पता भी नहीं था कि ये उनकी आखिरी नींद होगी। जानकारी के लिए बता दें कि आलमबाग बस टर्मिनल से चलकर यह बस दिल्ली जा रही थी लेकिन वो अपने मंजिल पर पहुंचने से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गई। अक्सर इस तरह की दुर्घटना में लोग ड्राइवर का ही दोष मानते हैं लेकिन हर बार ऐसा नहीं होता कई बार इसका जिम्मेदार बस की कंडीशन, खराब सड़के व सरकार भी होती है। मृत लोगों के परिवार को मुआवजा देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकती।

 यमुना एक्सप्रेसवे
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वैसे यमुना एक्सप्रेसवे (Yamuna Expressway) पर ये पहली घटना नहीं है बल्कि आए दिन यहां इस तरह की दुर्घटना सुनने को मिलती रहती है। इसलिए सरकार को इस विषय को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है क्योंकि मुआवजा इसका परमानेंट उपाय नहीं है। भारत में सड़कों का निर्माण बेहद तेजी से हो रहा है, इसी दौरान लोगों की सहूलियत के लिए देश का पहला एक्सप्रेसवे (यमुना एक्सप्रेसवे) का निर्माण किया गया था लेकिन ये कौन जानता था कि उनकी सुविधा के लिए बनाया गया ये मार्ग ही उनकी मौत का कारण बन जाएगा। यह बात हम ऐसे ही नहीं कह रहे हैं बल्कि आप अगर यहां हो रही घटनाओं पर विस्तार से नजर डालेंगे तो आपको खुद समझ आ जाएगा।

मौत का हाइवे बना 'यमुना एक्सप्रेसवे'

सबसे पहले तो ये जान लें कि दिल्ली से आगरा तक के लिए बने 165 Km लंबे यमुना एक्सप्रेसवे (Yamuna Expressway) पर हर रोज तकरीबन 60 हजार से भी ज्यादा गाड़ियां गुजरती हैं। 9 अगस्त 2012 में बने इस एक्सप्रेसवे ने अब तक कई लोगों को अपने आगोश में ले लिया। अगर आंकड़ो पर गौर करें तो साल 2012 से लेकर अब तक यानि की 2019 तक यहां 5 हजार से भी ज्यादा दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और इनमें कुल 750 लोगों की जान चली गई व 8 हजार घायल भी हुए।

नियम के अनुसार इस एक्सप्रेसवे पर बड़ी गाडि़यों की स्पीड की मानक सीमा तय की गई है जो कि 100 किलोमीटर प्रति घंटा है, वहीं छोटी गाड़ियों के लिए ये सीमा 60 किलोमीटर प्रति घंटा है। लेकिन किसी को भी कानून का डर नहीं है और कोई भी इस नियम को फॉलोव नहीं करता है। कई बार ड्राइवर की गति ज्यादा होने के कारण ये घटना घटती है तो कई बार गाड़ी के बीचों बीच पशुओं के आ जाने के कारण। वजह जो भी हो लेकिन सवाल तो ये उठता है कि उन मासूम लोगों का क्या कसूर होता है जो बिना मौत के मारे जाते हैं? इसके पीछे प्रशासन की लापरवाही के साथ-साथ लोग खुद भी इन घटनाओं के जिम्मेदार हैं।

 यमुना एक्सप्रेसवे
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प्रशासन की लापरवाही

आंकड़ों की बात करें तो 2019 जनवरी माह तक करीब 1 लाख से भी ज्यादा लोगों ने इस एक्सप्रेसवे (Expressway) के कानून तोड़े हैं लेकिन प्रशासन ने महज 5,700 लोगों पर ही कार्रवाई की है। इतना ही नहीं कुछ ऐसी गाड़ियां भी इन हाइवे पर दौड़ रही हैं जो सड़कों पर चलने के कंडीशन में भी नहीं है लेकिन अब प्रशासन को जब एक्शन लेने में इतनी तकलीफ हो रही है तो लोगों के मन में कानून का डर कम होना लाजमी है। ऐसे में यहां होने वाली घटनाएं कम होने की कोई आशा नहीं है।