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Shafiqur Rahman Barq 
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देश

बड़ा सवाल: बार-बार वंदे मातरम का अपमान करने वाले इन नेताओं को क्यों मिलती है संसद में जगह?

संसद के पहले सत्र में ही समाजवादी पार्टी के नेता शफीकुर्रहमान बर्क ने शपथ लेने के बाद ही अपनी शपथ को तोड़ दी। अपने बयान से इन्होने संविधान के प्रति सच्ची निष्ठा व गरिमा का अपमान कर दिया। 

Puja Kumari

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लोकसभा चुनाव (17th Lok sabha) के बाद कल से संसद का पहला सत्र (Parliament session) शुरू किया गया, वहीं इस पहले दिन ही संसद में काफी रोचक नजारा देखने को मिला। एक तरफ जहां कई नए चेहरों को नए स्थान प्राप्त हुए वहीं दूसरी ओर चुनाव के बाद कई अटकलों पर पूर्णविराम लग गया। कल सदन का माहौल काफी गंभीर भी रहा क्योंकि सभी सांसद देश की एकता, अखंडता को सुरक्षित रखने के साथ, अपने पद को निष्पक्षता से निभाने के लिए शपथ ले रहे थें। ये वही सांसद हैं जिन्हें आपने और हमने चुनाव में विजयी बनाकर वहां तक पहुंचाया है।

लेकिन सबसे ज्यादा हैरानी वाली बात तो ये थी कि सदन के पहले सत्र में ही एक सांसद ने शपथ लेने के तुरंत कुछ ही सेकेंड के बाद संसद की परंपरा को तोड़ दिया। हम बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क की जिन्होने शपथ लेने के दौरान 'वंदे मातरम' कहने से इनकार कर दिया, और कहा कि ये उनके 'इस्लाम के खिलाफ' (Against Islam) है इसलिए वो वंदे मातरम की जगह ‘संविधान जिंदाबाद’ कहेंगे। उनके ऐसा कहते ही सदन में मौजूद बाकी नेताओं ने 'वंदे मातरम' (Vande Mataram) और 'जय श्रीराम' के नारे लगाने शुरू कर दिए। इस बयान से बर्क ने देश की एकता व अखंडता का अपमान कर दिया।

संविधान जिंदाबाद के नारे का क्या था मकसद

सवाल यहां ये उठता है कि ‘शफीकुर्रहमान बर्क(Shafiqur Rahman Barq) को न ही किसी ने वंदे मातरम कहने को कहा था और न ही इस तरह की कोई परंपरा थी कि शपथ लेने के बाद वंदे मातरम कहना अनिवार्य है। फिर आखिर शपथ लेने के तुरंत उन्होने ऐसा क्यों कहा ? राजनीतिक परिप्रेक्षय से इसपर विचार किया जाए तो इसका मकसद साफ था कि शफीकुर्रहमान बर्क जानते थें कि आज उनको पूरा देश लाइव देख रहा है और इस बात का फायदा उठाकर वो ये संदेश देना चाहते थें कि हम 'वंदे मातरम' (Vande Mataram)को नहीं मानते। हम बिल्कुल अलग हैं।

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शफीकुर्रहमान बर्क ने इससे पहले भी संबल से विजयी होकर साल 2013 में जब संसद पहुंचे थें तो उस दौरान वहां 'वंदे मातरम' का गान हो रहा था पर उस समय भी बर्क बीच में उठकर बाहर चले गए थे। इतना ज्यादा अपमान करने के बावजूद देश की जनता ने उनको फिर से विजयी बनाकर इस जगह आसीन कराया।

संबल में 40 प्रतिशत से भी ज्यादा मुस्लिम वोटर है और बर्क इसी बात का फायदा इस्लाम पर भाषण देकर उठाते हैं और इसलिए आज दोबारा संसद में अपने इस बयान से उन्होने संविधान के नियम की शपथ तो ली लेकिन अगले पल ही संविधान की गरिमा को तोड़कर रख दिया और ये साबित करने में कामयाब रहे कि हम अलग हैं। हम कहीं भी जाए हम अपनी ही चलाएंगे। इन वोटरों को ये कब समझ आएगा कि जिन नेताओं को ये वोट दे रहे हैं वो इन्हें कोई सुविधा नहीं मुहैय्या कराएगा बल्कि धर्म व जाति के नाम पर उनसे वोट लेकर अपनी राजनीतिक धौंस दिखाएंगे।

बार-बार क्यों होता है अपमान

वैसे ये पहली घटना नहीं है बल्कि इससे पहले भी कई बार हमारे देश में वंदे मातरम का अपमान होता आया है। काफी बवाल हुआ है, जिस तरह से वंदे मातरम के नारे का विस्तार होता गया उसी तरह इसके प्रति विरोध भी बढ़ना शुरू हो गया। वंदे मातरम को मुस्लिम समुदाय मूर्ति पूजा से जोड़ती है जिसकी वजह से वो इसका समर्थन नहीं करते हैं।

Vande Mataram
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इतिहास उठाकर देखें तो सन 1905 के बंग भंग आंदोलन में वंदे मातरम के नारे को राष्ट्रीय नारा घोषित किया गया था। इसके अलावा दिसंबर 1905 में कांग्रेस कार्यकारिणी द्वारा वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा भी प्राप्त हो गया लेकिन मुस्लिम लीग ने वंदे मातरम का इस बात से विरोध किया कि इसमें मुर्ति पूजा का भाव है। लेकिन अगर जानकारों की मानें तो कोई भी व्यक्ति इस बात को स्वीकार नहीं करता है कि वंदे मातरम में मूर्ति पूजा का भाव छिपा है।