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सोनम कपूर  
सोनम कपूर  |Twitter
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सोनम का दार्शनिक रूप, लोगों ने सोशल मीडिया पर लताड़ा !

सोनम का दार्शनिक रूप

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

कठुआ रेप हादसे ने देश को हिला कर रख दिया था, तथा समाज के सामने एक ऐसा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया था कि इस प्रकार की घटनाओं से निजात कैसे पायी जाए।

लेकिन मामला रेप से होते हुए हिंदुत्व की ओर बढ़ गया जिसमें देवीस्थान की तरफ निशाना लगाया गया ,यहाँ तक कि समाज के इलीट बुद्धिजीवियों को हिंदुत्व और हिन्दू होने पर शर्म आनी लगी थी।

लापरवाह कौन ?

खैर मामला काफी उलझ गया था लेकिन पुलिस ने अपना काम किया और अभी हाल में ही अलीगढ़ के टप्पल, बाराबंकी के केस ने फिर से देश को सकते में डाल दिया, पहले पुलिस की लापरवाही, फिर समाज मे इस बात को ना फैलने देना, साथ ही मीडिया के द्वारा इस घटना को प्राथमिकता न देना एक सवालिया निशान लगा दिया है।

“हमे मीठे खाने की इस कदर लत पड़ गयी है कि ,हमने नमक से नाता ही तोड़ दिया है, जबकि नमक शरीर के लिए शक्कर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण है” 

समाज में जागरूकता लाना, इन घ्रणित कामों के प्रति घृणा रखना, ऐसे लोगों को समाज से बहिष्कृत करना हर व्यक्ति का कर्तव्य ही नही जिम्मेदारी भी है, किसी भी अपराध पर मुखर होकर बोलना आपकी जरूरत है।

लेकिन असल समस्या यहाँ पैदा होती है कि जब आप किसी अपराध को जाति, लिंग, भाषा, धर्म के आधार पर देखने लगते है। कठुआ केस में बॉलीवुड की तमाम हस्तियों जिनमें सोनम कपूर (वर्तमान में सोनम के अहूजा) ने बाकायदा तख्ती लेकर इस घटना पर रोष व्यक्त किया था। जिसमें हिंदुस्तान के शर्मिंदा होने समेत तमाम रोषपूर्ण बातों का ब्यौरा दिया था जिसमें समूचे देश का उन्हें सहज समर्थन मिला था।

लेकिन आज अलीगढ़ की घटना की बात थोड़ा अलग हो गयी, दोनों मामलों में सोनम के ट्वीट आपके सामने है जिसमें उन्होंने अलीगढ़ केस के बाद जो ट्वीट किया जिसमे किसी धार्मिक एजेंडे को न बनाने की बात कही जो लोगों को नहीं पच रही है , और लोग तार्किक व्यंग्यात्मक भाषा से सोनम को ट्रोल करने लगे।

लोगों ने अपने ट्वीट में सोनम से यह कहा कि आपका ज्ञान सिर्फ कठुआ के समय निकला था, या देविस्थान जैसे शब्दों को पिरोकर धर्म विशेष को निशाने पर लिया , लेकिन आज आप के दिमाग मे ज्ञान की गंगा बह रही है।

जायज सवाल अब भी यह है कि लोगों के दृष्टिकोण अलग-अलग परिस्थितियों में बदल क्यों जाते है।हमें हत्या बलात्कार और अन्य जघन्यतम अपराधों में जातिगत धर्मगत विशेष के अंतर को छोडकर अपराध और सिर्फ अपराध के आईने में देखना होगा। अन्यथा अब सवाल हमारी सत्यनिष्ठा पर होगा , और हम निश्चय रूप से जवाबदेह होंगे।