उदय बुलेटिन
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Mamta Banarjee
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देश

जमीन खोती ममता, बिखरता बंगाल !

“राजनीति वैचारिक विषमता का मंच हो सकता है ,लेकिन इसमें कुंठा का कोई स्थान नही है”

Shivjeet Tiwari

Shivjeet Tiwari

बंगाल हमेशा से क्रांति , आजादी का प्रमुख केंद्र रहा है, जिसने देश को एक से बढ़कर एक क्रांतिकारी और वैचारिक महापुरुष दिए है, लेकिन वर्तमान राजनीति में बंगाल न सिर्फ रास्ते बांट रहा है बल्कि एक धर्म के महापुरुष जिसका नाम अक्सर लोग मिलने पर उच्चारण करके स्नेह और कुशल क्षेम पूंछते है ,उसके नाम लेने पर लोगो को जेल में ठूंसा दिया जा रहा है,

राजनेता कहने को तो सहिष्णुता की प्रतिमूर्ति है लेकिन इनका असल काम तुष्टिकरण की राजनीति पर जिंदा रहना है , औऱ बंगाल में पिछले कुछ सालों से यही होता आ रहा है, एक वर्ग और समुदाय विशेष को मानसिक लाभ पहुचाने के चक्कर मे दूसरे धर्म के प्रसिद्ध त्योहार दुर्गा पूजा के पंडालों से स्पीकर उतरवाना, जुलूस का निकलना बंद करा देना,पंडालों पर हमला कराना ,ऐसे आरोप ममता सरकार और उनके तंत्र पर लगते रहे है, अभी हाल में ही एक बड़ा अजीब मामला सामने आया है चुनाव में अच्छी खासी जमीन खोने के बाद ममता का काफिला एक रास्ते से गुजर रहा था, तभी कुछ लोगो ने ममता को देख कर जय श्री राम के नारे लगाने शुरू कर दिए, यह दूसरा वाकया था जब ममता ने श्री राम के नारे पर अपना आपा खो कर उन्हें हिरासत में लेने का हुक्म दिया,

हालांकि मामले को तूल पकड़ते देख कर प्रशासन को उन्हें जल्द ही रिहा करना पड़ा ,लेकिन कही ना कही एक सवाल पैदा हो गया कि क्या श्री राम के नारे लगाने से कोई अप्रिय घटना हो सकती थी, या फिर इस नाम से ममता को कोई शारीरिक या मानसिक हानि पहुच रही थी,

हालांकि बड़ी विचित्र स्थिति है कि जेएनयू में "भारत तेरे टुकड़े होंगे" कहने वाले नौजवानों के इस नारे को अभिव्यक्ति की आजादी करार दे दिया जाता है, औऱ बुद्धिजीवी लोगों की जमात उन्हें डिफेंड करने में लग जाती है, लेकिन यहाँ राम नाम का नारा साम्प्रदायिक हो जाता है,

भारत गंगा जमुनी तहजीब का देश है, यहाँ आपको सहिष्णुता की रगे तलाशनी होंगी, केवल बुराई पर नजर न गड़ाकर समाज के सौहार्द को सब जगह फैलाना होगा, हमे न तो अल्लाह हू अकबर के नारे से परेशानी होनी चाहिए, ना ही जय श्री राम के , आखिर सियासत जनभावनाओं से बड़ी कब और कैसे हो गयी,

वो नजारा याद करिये जब नेता चौखाना रुमाल और टोपी पहने इफ्तार करते हुए नजर आते है, वही नेता जनेऊ पहन कर मंदिर-मंदिर जीत तलाशते है,

कहीं ना कहीं लोग इसे ममता की लोकसभा मे खोती हुई जमीन की खीज मान रहे है, सिर्फ नारे लगाने पर आम जनता पर इस प्रकार भड़कना,  स्वस्थ राजनीति की निशानी नही है

"ये याद रखे नेताओ का सारा ढोंग, आपके वोट पाने और जीतने तक सीमित है, जीत के बाद ये उस मंदिर और मस्जिद को भी ढहा देंगे ,जिसके आगे चुनाव जीतने की मिन्नत करते नही थकते थे"