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जनहित याचिका
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क्या है जनहित याचिका, इसे दायर करने की क्या है प्रक्रिया, लगता है इतना शुल्क

क्या होती है जनहित याचिका, इसे दाखिल करने की ये है सही प्रक्रिया

Puja Kumari

Puja Kumari

भारतीय कानून में सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए भी प्रावधान बनाया गया है जिसका प्रयोग कर कोई भी मानवीय व मौलिक अधिकारों का हनन होने से रोक सकता है। हम बात कर रहे हैं जनहित याचिका की जिसके बारे में कई लोग जानते तो हैं लेकिन इसकी विस्तृत जानकारी काफी कम लोगों के पास होती है। बताते चलें कि निजी हित के बजाय सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए किया गया कोई भी मुकदमा जनहित याचिका है।

यह एक ऐसा माध्यम है जिसमें कानूनी कार्यवाही के जरिए अल्पसंख्यक या वंचित समूह या फिर व्यक्ति समूह को लगता है कि उसके आसपास होने वाली कोई भी घटना या बात उनके मौलिक या मानवीय अधिकारों का उलंघन कर रही है तो वे जनहित याचिका यानि पीआईएल दाखिल कर सकता है। जनहित याचिकाओं का समाज में सबसे बड़ा योगदान यह रहा कि इसने कई तरह के नवीन अधिकारों को जन्म दिया।

जनहित याचिका
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जनहित याचिका दायर करने की सही प्रक्रिया

सबसे पहले ये जानना जरूरी है कि यह उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय में ही दाखिल किया जा सकता है। इसके अलावा उस मुद्दे से संबंधित सारी जानकारी व डॉक्यूमेंट आपके पास होना जरूरी है।

अगर आप उच्च न्यायालय पीआईएल दाखिल करते हैं तो मसले से संबंधित सारे डॉक्यूमेंट की कम से कम दो प्रतियां वहां जमा करना आवश्यक होता है, और इसके साथ ही साथ पीआईएल की एक कॉपी सभी प्रतिवादी को भी भेजनी होती है।

वहीं अगर आप उच्चतम न्यायालय में पीआईएल दाखिल करते हैं तो वहां की कोर्ट में याचिका की पांच प्रतियां जमा करनी पड़ती है, लेकिन यहां ध्यान रहे कि किसी भी प्रतिवादी को पीआईएल की कॉपी तभी भेजी जाती है जब अदालत द्वारा इसके लिए नोटिस जारी किया जाता है।

इसके लिए उच्च न्यायालय में आपको संविधान में निहित अनुच्छेद-32 के तहत याचिका दायर करनी होगी तो वहीं उच्चतम न्यायाल में अनुच्छेद-226 के तहत।

जनहित याचिका दायर करने में इतना लगता है शुल्क

बाकी अन्य अदालती मसलों के मुकाबले अगर बात करें पीआईएल की तो यह काफी सस्ता है, इसे दायर करने के लिए महज 50 रूपए लगते हैं जिसका वहन कोई भी आसानी से कर सकता है और इसका उल्लेख याचिका में करना पड़ता है। अगर आप अलग से वकील करते हैं तो उसका खर्च अलग होता है।

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जनहित याचिका के उदाहरण व प्रभाव

पीआईएल का एक अच्छा उदाहरण आपको सबरीवाला मंदिर से मिल सकता है जहां महिलाओं के प्रवेश को वर्जित किया गया था, इसके लिए काफी घमासान हो रहा था। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के लिए इजाजत दे दी, पर इसके बाद केरल की जनता नाखुश हो गई क्योंकि उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से उनकी 250 साल पुरानी परंपरा का हनन हो गया इसलिए उनलोगों ने फिर से पीआईएल दाखिल किया जिसके जरिए वो इसपर प्रतिबंध लगा सके। यानि की सार्वजनिक हित के लिए पीआईएल दाखिल किया जाता है जिसमें एक विशेष व्यक्ति नहीं बल्कि सार्वजनिक समूह का हित हो।

इसके अलावा दूसरा उदाहरण आपको उच्चतम न्यायालय में समलैंगिगता को लेकर पीआईएल दाखिल करने से मिल सकता है, जो कि काफी चर्चा में भी रहा था। समलैंगिक लोगों के लिए आवाज उठाने वाली संस्था नाज फाउंडेशन की ओर से उच्चतम न्यायालय में साल 2001 में पीआईएल दाखिल किया गया। जिसके बाद साल 2009 में न्यायालय ने समलैंगिकता को अपराध के दायरे से हटा दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने दुबारा से इसे अपराध की श्रेणी में रख दिया लेकिन वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार सेक्सुअलिटी को निजता का अधिकार मान ही लिया। कोर्ट ने कहा कि किसी भी व्यक्ति का सेक्स के प्रति झुकाव उसके राइट टू प्राइवेसी का मूलभूत अंग है और ऐसे में समलैंगिग लोगों को उनका अधिकार मिलना चाहिए और अंतत: भारत भी उन देशों की सूची में जुड़ गया जहां इन लोगों को कानूनी मान्यता मिल चुकी है।